हादसा
कथा साहित्य | कहानी महेश कुमार केशरी1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
दो सौ रुपये डब्बे में यूँ ही पड़े थे। स्कूल आते-जाते समय दिनेश की नज़र उस डब्बे पर पड़ती तो वो अपनी मम्मी से पूछता, “मम्मी ये रुपये आपने डब्बे में क्यों रखे हैं?” दिनेश की मम्मी इस बात को हँसकर टाल देती। कोई जवाब नहीं देती। लेकिन जब-जब उस पैसे की तरफ़ देखती तो अंदर से बस भीगकर रह जाती। तब उसको मंजू याद आती। ये डब्बे में रखे पैसे मंजू के थे। जो मंजू को देने थे।
रूना अतीत के गहरे सुरंग में समाती चली गई।
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रूना और उसका पूरा परिवार दिल्ली से हिमाचल शिफ़्ट हो गया था। रूना ने कामकाज के लिए एक मेड रख ली थी। उसका नाम मंजू था। रूना और उसके परिवार को हिमाचल आए कुछ महीने ही हुए थे। एक दिन वो आँगन में बैठी धूप सेंक रही थी। तभी एक पतली-दुबली मरियल सी लड़की अहाते में आ गई। औसत क़द-काठी, बाल बिखरे, कपड़ों में सलवार क़मीज़ पहने हुए थी। वो अहाते के बाहर ग्रिल पर आकर खड़ी थी।
रूना ने पूछा, “कौन है री तू इधर क्यों घूम रही है।”
लेकिन मंजू कुछ ना बोली।
रूना ने फिर पूछा, “कौन है री मरी तू बोलती क्यों नहीं।”
लेकिन वो कुछ नहीं बोली दरवाज़े पर खड़ी ही रही।
रूना भीतर चली गई दो-घंटे बाद लौटी तो देखा वो लड़की वहीं गेट पर ही खड़ी है।
इस बार रूना का सब्र चूक गया। रूना आश्चर्य से देखती हुई बोली, “अरे मरी तू अब तक यहाँ ही खड़ी है। क्या चाहिए कुछ बोलेगी भी या यूँ ही यहाँ खड़ी रहेगी मूरत बनकर। क्या चाहिए तुझे?”
इस बार भी वो खड़ी रही। मुँह से कोई आवाज़ ना फूटी।
रूना अंदर गई और थोड़ा सा चावल खोंईंचा में लेकर आई।
इस बार मंजू ग़ायब थी।
रूना को अजीब लगा। मरी कैसी लड़की है! देने के लिए चावल लाई। लेकिन देखो ग़ायब हो गई।
दूसरे दिन भी यही हाल था। ग्यारह-साढ़े-ग्यारह बजे जब रूना अपना किचन का काम निपटाकर आती तो मंजू वहीं गेट पर खड़ी मिलती। लगातार दूसरे-तीसरे दिन भी वो गेट पर आकर खड़ी हो जाती। रूना को कौतूहल होता। आश्चर्य भी। रूना सोचती लगता है कोई पगली-वगली है। घर से भागी-भटकी हो सकती है। या शायद घरवालों ने घर से निकाल दिया होगा। बहुत सारी सम्भावनाएँ थीं। रूना को लगता कि उसे हर सम्भावना पर विचार करना चाहिए। फिर लगता कि वो क्यों उसके लिए मरी जा रही है। जब उसको ख़ुद की चिंता नहीं है। लेकिन जब रात होती और रूना अपने बिछावन पर लेटी होती तो मंजू की याद हो आती। तब वो और सम्भावनाओं पर विचार करती। वो अख़बारों में अक्सर पढ़ती। टीवी और न्यूज़ चैनलों पर देखती रहती कि कैसे बुज़ुर्ग दंपती की हथौड़े से मारकर उनके ही घर में उनकी हत्या की गई। वो ये भी सुनती कि अकेले रह रहे दंपती की किसी ने चाकुओं से गोदकर हत्या कर दी। किसी अनजान पर भरोसा ना करें। किसी भी संदिग्ध आदमी को अपने घर के आसपास देखें। या अपने मुहल्ले में देखें तो आवश्यक पूछताछ ज़रूर करें। या अपने निकटवर्ती थाने में इसकी सूचना अवश्य दें। रूना के दिमाग़ में यही सब बातें चलती रहीं। रूना बेकार में ही अपने दिमाग़ को तकलीफ़ दे रही थी। वो भी किसी अनजान व्यक्ति के लिए। ख़ैर रूना को आधी रात के बाद सोच विचार करते-करते नींद भी आ जाती। ये रोज़ का सिलसला सा चल पड़ा था? अब रूना को मंजू को रोज़ गेट पर खड़े रहते देखने की आदत पड़ गयी थी।
अब वो मंजू को देखती तो उसको मुस्कुरा कर देखती। बदले में मंजू के चेहरे पर भी हँसी के दो टुकड़े दिखाई देते। अब ये रोज़ का एक सिलसिला-सा चल पड़ा था।
मंजू का एक निश्चित दायरा था। इस मामले में वो बड़ा अनुशासित थी। महीना लगने को था। लेकिन वो गेट के अन्दर ना आती थी। जैसे मंजू के लिए वो गेट एक लक्ष्मण रेखा थी। और मंजू गेट के बाहर ही रहती थी। एक तय दायरे में। रूना और उसके घर में अनुशासन का बहुत महत्त्व था। रूना ख़ुद भी बहुत अनुशासित जीवन को जीती थी। अहाते में गैरज भी था। उसके कार की सर्विसिंग घर पर ही हुई थी। रूना को जो क्वार्टर मिला था। वो माचिस की डिबिया की तरह था। यहाँ तक कि उसका जो किचन था वो भी अहाते में था। सर्दियों का मौसम था। लिहाज़ा वो रात का खाना दिन में ही पकाकर रख लेती थी। ताकि ठंड में बचा जा सके। उसके पति अभिनव फ़ॉरेस्ट विभाग में काम करते थे। दिनेश, रूना का लड़का पाँचवीं क्लास में पढ़ता था। रूना के पति सप्ताह भर की फल-सब्ज़ियाँ ख़रीदकर ले आते थे। कभी-कभी तो पंद्रह-बीस दिन का राशन-पानी भी। वो ज़्यादातर जंगलों में ही काम करते थे। बाज़ार भी बहुत दूर था। वे लोग जीप से बीस-पच्चीस किलामीटर दूर नीचे जाते और साप्ताहिक हाट में खाने-पीने का सामान एक ही बार में उठाकर ले आते। इस तरह अहाते में कार के खुले पार्ट्स-पुर्जे पड़े थे। खाने-पीने का सामान यहाँ तक कि फ़्रिज भी खुले में यानी अहाते में पड़ा रहता था। जिन पन्नियों में जो चीज़ें जैसे लाई गई होतीं। वो वैसे ही पड़ी रहतीं। जब तक रूना खोलकर ना निकालती। तब तक पन्नी जस-की-तस बँधी ही रहती थी।
मंजू पर विश्वास का एक कारण ये भी था कि चीज़ें जहाँ की थीं, वहाँ वैसे ही पड़ी रहतीं थीं।
एक दिन रूना ने देखा कि वो सुबह-सुबह क़रीब छह-सात बजे अहाते के गेट पर मंजू पड़ी है। रूना को बहुत ग़ुस्सा आया। ग़ुस्साते हुए बोली, “क्यों री मरी। इतनी ठंड में यहाँ क्यों पड़ी है। कहींं मर-मुरा गई तो तेरी मौत मेरे सिर पर लगेगी। आख़िर क्यों ये पाप मेरे सिर पर मढ़ती है। काहे यहाँ आती है रोज़? जब तेरे से मेरा कोई लेना देना नहीं है। चावल देती हूँ तो लेती नहींं। भात देती हूँ तो खाती नहीं। क्या मेरी जान लेकर मानेगी?”
अपनी ताक़त भर रूना ने मंजू को ख़ूब डाँटा फटकारा। जितने कु-बोल बोलने थे, बोल दिए। बोलकर अन्दर चली गई। रूना को लगा कि कहीं मर-मरा गई तो लेने-के-देने पड़ जाएँगें। आख़िर एक बात को दूसरी बात से लोगों को जोड़ने में समय भी तो नहीं लगता। ईश्वर बस पाप करवाने से बचाएँ। अपने इस तरह से कुबोल बोलने से रूना को पछतावा भी हो रहा था। रात में जो कंबल ख़ुद ओढ़ती थी, हाथ में लेकर आ गई मंजू को देने लिए। लेकिन मरी ग़ायब थी। रूना का ग़ुस्सा धधक गया। मरी काम की ना काज की बेवजह का टेंशन दिए रहती है।
बात आई गई हो गई। सुबह से फिर दोपहर हो गई। फिर रात हो गई। रूना को बस मंजू याद आती रही। पता नहीं पगली कहाँ होगी? किस हाल में होगी? कहीं ठंड तो नहीं लग गयी होगी? भारी शीतलहर चल रही है। हवा नश्तर की तरह चुभती है। और रूना की आँख लग गई।
सुबह रूना का आँख खुली। झाड़ू-बुहारू किया। चौका-बरतन साफ़ किया। नाश्ता बनाया।
व्यग्रता इतनी बढ़ी कि वो क्वार्टर के आज़ू-बाज़ू के घरों में, क्वार्टर के पीछे, पहाड़ के नीचे। नदी के आसपास सब जगह जहाँ-जहाँ मंजू के होने की सम्भावना होती उसको तलाश चुकी थी। लेकिन वो कहीं नहीं मिली। रूना थककर बैठ गई। ना मिलती हो ना मिले मेरी बला से।
फिर कपड़े धोने चली गई। समय जैसे काटे नहीं कट रहा था। बार-बार नज़र घड़ी पर ही रहती। मुई सूई भी धीरे-धीरे रेंग रही थी। जैसे आगे ना बढ़ने की क़सम खा रखी हो। सात, साढ़े सात, आठ, साढ़े आठ। नाश्ता बनाया। अभिनव और दिनेश को नाश्ता बनाकर दिया। अभिनव दफ़्तर और दिनेश स्कूल चला गया। लेकिन रूना की नज़र घड़ी पर से हट ही नहीं रही थी। समय जैसे रेंग रहा था। फिर नौ, साढ़े नौ, दस, साढ़े-दस बज गए। फिर बहुत मुश्किल से ग्यारह बजा। कभी रूना ने ग्यारह बजने का इंतज़ार इस तरह ना किया होगा। जितना उस दिन किया। रूना मन-ही-मन ग़ुस्साते हुए बोली ‘मरी कल सुबह यहीं पड़ी मर रही थी, दरवाज़े पर। आज जब राह ताक रही हूँ, तो दिखाई नहीं दे रही है। कम-से-कम कंबल तो आकर ले जाती। कम-से-कम इस ठंड में राहत मिलती।’
इस तरह सुबह से दोपहर हो गई। आज अहाते में कोई काम नहीं था। फिर भी देर तक बैठी रही। गेट की तरफ़ टकटकी लगाए कि शायद मंजू दिख जाए। लेकिन मंजू ना दिखी। इन बीस एक दिनोंं में कोई ऐसा दिन नहीं था, जब उसके ग्रिल के आसपास मंजू मौजूद ना हो। वो रोज़ ग्यारह-साढ़े-ग्यारह बजे तक आ जाती थी।
रूना रात को ठीक से सो भी नहीं पाई थी। उसका सिर दुख रहा था। वो उठकर भीतर चली गई। रात को खाना भी नहीं खाया और सो गई। सुबह हुई तो फिर मंजू की याद आने लगी। लेकिन इस बार बड़ी सख़्ती से उसने इंसानियत के रिश्ते और उससे जुड़े तारों को झटका। एक वही मरी तो अभागी नहीं है। उसके जैसे ना जाने कितने लोग घर से बेघर हैं। कितने दुखियारे हैं। किन-किन लोगों के बारे में इस तरह से सोचती रहेगी। दुनिया में एक-से-एक लोग हैं मजबूर, बेकस, ग़रीब, दीन-हीन अब सबको देखा तो नहीं ना जा सकता है। अगर वो उसके गेट पर ना आती तो वो उसको देखती ही नहीं। ना ही उससे जुड़ती। सोच का कोई सिरा उससे जुड़ता ही नहीं। आज दिनेश का जन्मदिन था। उसका सारा समय घर कि साज-सजावट और केक बनाते बीता। सुबह से शाम हो गई उसने दोपहर का खाना भी नहीं खाया था। जन्मदिन की आपा-धापी में वो दिन भी शेष हो गया।
इस तरह पंद्रह-बीस दिन बीत गए। रूना अपनी दिनचर्या में व्यस्त रहने लगी। वो मंजू को लगभग भूल ही चुकी थी।
तभी एक दिन उसके ग्रिल पर दस्तक हुई। रूना ने मुड़कर देखा। मंजू ही थी। एक बार तो दिल में आया कि कह दे क्यों रे मरी कहाँ मरी हुई थी अब तक? पंद्रह दिनोंं से मुँह क्यों ना दिखाया? लेकिन ख़्याल आया, कि कहीं फिर बीस दिनोंं के लिए ना भाग जाए। पास में टोकरी में आलू पड़े थे रूना छील रही थी। पास में ठंड से बचने के लिए रूना ने उपले जला रखे थे। घुँआ से अहाता भर गया था।
“अरे, वहाँ क्यों खड़ी है अन्दर आकर अलाव ताप नहीं तो ठंडी हो जाएगी। बहुत ठंड है बाहर।”
इस बार मंजू सकुचाती हुई अन्दर आई।
“बैठ, क्या नाम है तेरा।”
धीरे से बोली, “मंजू।”
“कहाँ थी इतने दिनों से। तुझे हर जगह ढूँढ़ा मिली नहीं कहीं। कहाँ थी रे।”
“मैं काम करती हूँ दीदी,” पहली बार उसने ‘दीदी’ कहा।
“कहाँ काम करती है, रे तू।”
“ब्रिगेडियर साहब के यहाँ।”
“कौन सी.पी. साहब यू.पी. वाले।”
“हूँ।”
“तू उनको कैसे जानती है।”
“जानती हूँ, दीदी झारखंड में भी उनके यहाँ पर काम करती थी।”
“अच्छा तो तू झारखंड से है। झारखंड में कहाँ से है?”
“राँची से दीदी।”
“राँची में कहाँ से है।”
“रातू रोड से दीदी।”
“यहाँ कैसे आयी?”
“यहाँ ब्रिग्रेडियर साहब लेकर आए।”
“अच्छा, तब तो ब्रिगेडियर साहब तुझे अच्छे से जानते होंगे।”
“हाँ दीदी, पिछले चार सालों से उनके पास ही रह रही हूँ। दो साल राँची में और दो साल यहाँ।”
“अच्छा।”
“तू भागी क्यों? उस दिन से फिर चेहरा क्यों ना दिखाया? उस दिन से आज आ रही है। मैं कितना परेशान हो रही थी।”
इस बार उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। जैसे पछता रही हो अपनी ग़लती पर।
“आज कैसे आना हुआ?”
“वो ब्रिगेडियर साहब लंदन जा रहे हैं। वो रिटायर हो गए हैं। यू.के. में उनका लड़का रहता है हमेशा के लिए। उनके पास काम छूटने वाला है,” मंजू के स्वर में जैसे बेचारगी उतर आई थी।
वो मायूस लग रही थी।
“कब जा रहे हैं।”
“पंद्रह दिनोंं बाद। उनके जाने के बाद सोचती हूँ कहाँ जाऊँगी क्या करूँगी?”
“मुझसे क्या चाहती है?”
“आसरा।”
“आसरा, माने काम?
“काम, मेरे यहाँ क्यों काम चाहिए तुझे?”
“बताऊँगी दीदी सब बताऊँगी। समय आने दीजिए। बस आप रहने का ठौर दे दीजियेगा, अपने पैरों में कहीं।”
“अपने घर क्यों नहीं चली जाती?”
“मेरा घर कहाँ है, दीदी!”
“क्यों तेरी शादी नहीं हुई है, क्या? तेरा मरद तुझे नहीं रखता अपने साथ?”
“मरद को छोड़े सालों हो गए। मरद मेरा शराबी था। पहले मैं और मेरा मरद रेजा का काम करते थे। सब ठीक-ठाक चल रहा था। लेकिन पता नहीं उसको कहाँ से पीने का चस्का लग गया। और वो सब काम-धाम छोड़कर दिन भर दारू में डूबा रहने लगा। फिर मैं भी रेजा का काम छोड़ दिया। और घरों में बतर्न-बासन का काम करने लगी। मेरा पति निकम्मा और आवारा हो चुका था। मैं दिन भर चूल्हा चौका का काम करती थी। तब मैं मुँबई में थी। मेरा मरद मारता-पीटता था। पैसे कमाकर लाती तो छीन लेता और दारू में उड़ा देता था।
“चाॅल वालों से पता चला था, कि मेरा पति मेरा सौदा करना चाह रहा था। वो मुझे बेचना चाह रहा था। लोगों से एडवांस भी पकड़ लिया था। कोई कलकत्ते का दलाल था। मैं जान बचाकर उत्तर प्रदेश भागी अपने मामा के यहाँ। मेरा मामा ध्रुपद जानते थे, ब्रिगेडियर साहब को। उनके यहाँ मेरे मामा ने काम किया था, यहीं हिमाचल में। ब्रिगेडियर साहब अच्छे आदमी थे। इसलिए उनके यहाँ काम पकड़ लिया था। जब तक राँची में रही तब तक उनके यहाँ थी। बिग्रेडियर साहब के डर से मेरा आदमी मेरे पास नहीं फटकता था। नहीं तो जब तक झारखंड में थी। तब तक मुझे आकर धमकाता रहता था। भद्दी-भद्दी गालियाँ देता था। मैं काहे रहती उसके पास जब मेरी कमाई भी वो खाता था और मुझे मारता भी था।”
धीरे-धीरे अँधेरा होने लगा था। मंजू चली गई ये कहकर की वो फिर आएगी।
रात को रूना सोई तो आँखों में नींद ना थी। वो छत ताकती रही। वो आज के समाज में अपनी यानी नारियों की स्थिति देख रही थी। आज कहने को तो सब कुछ डिजीटल हो चुका था। आदमी अंतरिक्ष में पहुँच गया था। लोग मंगल पर दुनिया बसाने की बात सोच रहे थे। चंद्रमा पर पानी खोजा जा रहा था। लोग दुनिया में बड़े बदलाव करके दुनिया में क्रांति लाना चाह रहे थे। लेकिन औरत को लेकर आदमी की सोच नहीं बदली थी। वो आज भी औरत को अपने जूते की नोक पर रखना चाहता है। फिर कैसे बदली है ये दुनिया? जहाँ आज भी इस धरती पर औरतों की इज़्ज़त नहीं है। लोग जिसका खा रहे हैं, उसका एहसान नहीं मान रहे हैं। आदमी की सोच नहींं बदली थी। औरत आज भी उसकी ज़र-ख़रीद ग़ुलाम थी।
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रूना और अभिनव दोनों ब्रिगेडियर साहब से मिल आए थे। ब्रिग्रेडियर साहब ने जो बातें कहीं थीं और मंजू ने जो बातें कहीं थीं—दोनों सच थीं। यानी वो राँची झारखंड की रहने वाली थी। उसकी सामाजिक और आर्थिक पृष्ठ भूमि बहुत ही ख़राब थी। उसकी माँ भी रातू-रोड में लोगों के घरों में चौका और बरतन का काम करके गुज़ारा करती थी। उसका बाप शराबी था। उसकी माँ के साथ मारपीट करता था। घरेलू हिंसा का शिकार दोनों माँ-बेटी होती थीं। लिहाज़ा मंजू उनके घर में चौका-बरतन करके अपना पेट पालती थी। वो पिछले चार सालों से ब्रिगेडियर साहब के यहाँ काम कर रही थी। और भी बहुत सी बातें ब्रिगेडियर साहब बता रहे थे। कह रहे थे कि उनके घर में विदेशों से आई ना जाने कितनी महँगी-महँगी शराब की बोतलें पड़ी रहती हैं। उनकी मिसेज जो अब दिवंगत हो गईं थीं के ना जाने कितने सारे गहने, कपड़े वैसे ही वार्डरोब में पड़े रहते हैं। लेकिन मंजू ताकती भी नहीं थी, उधर। कारण कि उसको बस और बस सुरक्षा चाहिए थी। मंजू मेरे घर में मेरी बेटी की तरह रहती है। मैंने कई बार कहा भी कि बेटी तुझे जो कपड़े और ज़ेवर पसंद हों अपने पास रख ले। आख़िर अब हमारे यहांँ इसको पहनने और ओढ़ने वाला कौन है? जो मन हो खा-पी। इसको अपना ही घर समझ। मंजू में कोई दोष नहीं है। मैंने उसका पासपोर्ट का आवेदन भी दे रखा है। उसको अपने साथ लंदन ले जाऊँगा।
रोज़ गेट तक आने वाली और कोई भी सामान जैसे खाने के लिए भात या कच्चा चावल देने की पेशकश या कंबल देने की पेशकश करने की बात पर भी जो लड़की तैयार नहीं हुई थी। उसको हमदर्दी और प्यार की ज़रूरत थी। रूना ने ये सब बातें अभिनव को बताई थीं। अभिनव भी मंजू से हमदर्दी रखता था। रूना बताती कि मंजू बेचारी बहुत ही असहाय और ग़रीब लड़की है। इसलिए भी मंजू की हमें मदद करनी चाहिए। इधर रूना दिन भर के कामों से थक जाती थी। अभिनव दिन भर दफ़्तर में काम करता था। और सप्ताह-सप्ताह भर घर नहीं लौटता था। तब रूना को ख़ाली घर काटने को दौड़ता। वो बात करने के लिए किसी की आस देखती। ये सब बातों को जानकर अभिनव ने रूना को ये कह दिया था कि जब ब्रिगेडियर साहब ने मंजू की गारंटी दी है तो वो मंजू को रख ले काम पर। और इस तरह रूना के पास मंजू रहने लगी थी। पहाड़ पर का जीवन आसान नहीं होता है। रूना अक्सर कभी दूध तो कभी राशन का सामान लेने नीचे आती। ऊपर से नीचे उतरने और चढ़ने में उसके कस-बल ढीले पड़ जाते थे। ऐसा प्रायः ही होता था। किसी-ना-किसी काम से उसको प्रायः नीचे आना-जाना होता ही था। मंजू सुबह-सुबह आती और घर के झाड़ू-बरतन करती। फिर कपड़े धोकर खाना बना देती थी। दिनेश का फ़ाइनल एग्ज़ाम आ गया था। रूना उसके पेपर की तैयारी करवाती। खाना बनाने और ऊपर के कामों के लिए समय ही नहीं मिलता था। अब उसका सारा फ़ोकस दिनेश की पढ़ाई पर था।
अब रूना आश्वस्त हो चुकी थी कि मंजू कोईआपराधिक प्रवृत्ति की लड़की नहीं है। उसका बैक-ग्राऊँड भी ठीक था। इस तरह मंजू नियम से रोज़ आने लगी। छह हज़ार रुपये महीने पर बात तय हो गई थी।
इधर कुछ दिनों से मंजू नहीं आ रही थी। शायद ब्रिगेडियर साहब के लंदन जाने का समय हो गया था। मंजू उनकी पैकिंग और उनको लंदन भेजने की तैयारी में जुटी हो। लेकिन जब पंद्रह-बीस दिनोंं के बाद भी वो नहीं आई तो उसको चिंता होने लगी। लेकिन इधर दिनेश की परीक्षा का ख़्याल आता तो रूना, मंजू को भूल जाती।
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एक सुबह वो उठी तो देखा कि ग्रिल पर कोई खड़ा है। उसने आवाज़ देकर पूछा, “कौन है वहाँ?”
“बीबीजी मैं हूँ।”
“मैं कौन, तुम्हारा कोई नाम नहीं है?”
“ध्रुपद।”
“कौन ध्रुपद? मैं तुमको नहीं जानती।”
“ध्रुपद,” रूना ने दिमाग़ पर ज़ोर दिया। नाम तो सुना-सुना सा लग रहा था।
रूना ने दरवाज़ा भेड़ दिया था। ध्रुपद मुड़ने ही वाला था तभी उसको मंजू की याद आ गई। अरे ये ध्रुपद तो मंजू के मामा का नाम था।
“अरे, सुनो ध्रुपद तुम्हारा नाम है। तुम मंजू के मामा हो।”
“हाँ बीबीजी, मैं ध्रुपद मंजू का मामा हूँ।”
रूना ने ध्रुपद को डपटा, “मंजू क्यों नहीं आ रही है काम पर। पैसे तो पिछले महीने उसको दे दिए थे। उसका केवल दो सौ रुपये निकलता है। आकर कहना ले जाए।”
“बीबीजी मंजू के साथ बहुत बड़ा हादसा हुआ है। बहुत बड़ा हादसा। एकटक बस दीवार घूरती रहती है। किसी को नहीं पहचानती। बस एक ही दिशा में देखती रहती है। कुछ बोलती ही नहीं। कुछ खाती-पीती नहीं बस एकटक दीवार को घूरती रहती है।
“ब्रिगेडियर साहब के जाने के बाद से वो अपने बाप के पास राँची चली गई थी। उसको अपने शराबी पति से डर लगता था। लिहाज़ा अपने बाप के पास सुरक्षित रहेगी ऐसा सोचकर मैंने ही उसको कहा था कि बिटिया ब्रिगेडियर साहब तो अब नहीं हैं। इसलिए अब तेरी हिफ़ाज़त तेरे घर में ही होगी। बेटा समय ख़राब चल रहा है। कहीं बाहर रहना ठीक नहीं है। उसको मैं ही ख़ुद राँची छोड़कर यहाँ आ गया था। मैं इधर आया और अभी सप्ताह भर भी नहीं बीता था कि ये हादसा हो गया।”
रूना का कलेजा किसी अनिष्ट की आशंका से काँप उठा, बोली, “क्या हुआ मंजू का पति मर गया।”
“नहीं बीबीजी नहीं मैं आपको किस मुँह से और कैसे बताऊँ?”
रूना संभावनाओं पर विचार करती हुई बोली, “फिर क्या उसके पिताजी मर गए?”
“नहीं बीबीजी नहीं ऐसे शैतान लोगों को भला मौत कहाँ आती है? उसके जैसा हैवान बाप भगवान् किसी को भी ना दे। उसने अपनी ही बेटी की अस्मत लूट ली। वो रोज़ दारू पीकर आता था। दोपहर में मंजू की माँ काम करने कहीं बाहर गई थी। कमीने ने अपनी ही बेटी के इज़्ज़त को तार-तार कर दिया।”
ध्रुपद पछाड़ खा-खाकर रोए जा रहा था। ध्रुपद इस घटना के लिए अपने आप को जैसे ज़िम्मेदार मान रहा था।
ध्रुपद बोला, “बीबीजी मैं उसको अपने साथ रख लेता। कहीं और काम पर लगा देता तो ठीक रहता। बेचारी की अस्मत तो बची रहती।”
रूना को अफ़सोस हो रहा था। अपने व्यवहार पर। आदमी का अपने अधीनस्थ से सिर्फ़ और सिर्फ़ रुपये का व्यवहार थोड़ी ही होता है। इंसानियत भी तो कोई चीज़ होती है। उसको अपने व्यवहार पर शर्मिंदगी महसूस हुई। एक बार तो रूना को अपने इंसान होने पर भी यक़ीन ना हुआ। कहाँ तो वो अभी अक्खड़ बनकर ध्रुपद को डाँट रही थी। मंजू को नौकर समझते हुए उसके काम पर ना आने के कारण उस पर बरस रही थी। और कहाँ तो उसको अब मंजू और ध्रुपद से सहानुभूति हो रही थी। रूना को जैसे अपने आप से घिन आ रही थी।
फिर वो सोचने लगी। मंजू के बाप के बारे में कि आख़िर वो कितना घटिया आदमी है जो उसने ऐसी दरिंदगी अपनी ही बच्ची के साथ की है।
“बीबीजी आप चलेंगी मंजू से मिलने। उसको देखने।”
रूना को याद आया, जब मंजू ने उसको ‘दीदी’ कहकर पुकारा था।
रूना की आँखें भर आईं, “कहाँ भर्ती है मंजू?”
“मिलिट्री अस्पताल में। ब्रिगेडियर साहब लंदन से चल पड़े हैं। शाम तक आ आ जाएँगे।”
रूना ने स्कूटी निकाली और ध्रुपद को पीछे बिठाया। और वे लोग मिलिट्री अस्पताल क़रीब घंटे भर बाद पहुँच गए।
रूना ने मंजू को देखा तो उसकी चीख़ निकल गई। दरिंदे ने चेहरे और छातियों को नोंच दिया था। संघर्ष के सबूत साफ़-साफ़ दिखाई दे रहे थे। उसके होंठ बुरी तरह सूजे हुए थे। गले पर दाँतों से काटने के निशान थे। हाथा-पाई के कारण कुहनियाँ नुची हुई थीं। बाँहों पर नाखूनों के जहाँ-तहाँ निशान पड़े थे।
रूना ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। उसकी हिचकियाँ बँध गईं। सारे मरीज़ और उनसे मिलने आए लोग अब रूना को देख रहे थे।
“मंजू ए मंजू कैसी है मेरी बच्ची। कैसे तेरा ये हाल हो गया रे। मरी अपने घर क्यों गई? मेरे घर आ जाती। कम-से-कम मुझसे एक बार कह कर तो देखा होता।”
रूना के अवचेतन से ये आवाज़ आई, “तुम्हारे घर में मर्द नहीं हैं क्या?”
सहसा इस चेत ने रूना को दूने वेग से रोने पर मजबूर कर दिया। रूना सोचने लगी। जब औरत अपने बाप-भाइयों के बीच सुरक्षित नहीं है। तो वो भला और कहाँ सुरक्षित रह सकती है? हर जगह तो मर्द हैं। ये दुनिया ऐसे ही दरिंदे मर्दों से भरी हुई है।
“मंजू, ए मंजू री इधर आ मुझे बता मुझे। किसने क्या किया है तेरे साथ। ख़त्म कर दूँगी उसको फूलन देवी की तरह। काट कर अलग कर दूँगी उसका सिर धड़ से।”
रूना बोले जा रही थी। और रोए जा रही थी।
नर्स ने आकर उनको डपटा, “अरे आप लोग बाहर जाइए। क्यों बार-बार आप लोग चले आते हैं, मरीज़ को तंग करने। इनकी हालत अभी ठीक नहीं है।
रूना और ध्रुपद उसी स्कूटी से घर लौट आए।
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तब से वैसे ही वो दो सौ रुपये डब्बे में धरे थे। जो मंजू को देने थे। पता नहीं कब आएगी मंजू उसको लेने। रूना को ऐसा लगता था कि वो जल्दी ही ठीक होकर लौटेगी। और अपने दो सौ रुपये ले जाएगी।
“मम्मी ओ मम्मी कहाँ खोई हो? मुझे बहुत ज़ोरों की भूख लगी है। जल्दी से खाना दो,” दिनेश की आवाज़ सुनकर रूना अतीत के सुरंग से वापस वर्तमान की ठोस ज़मीन पर गिरी।
“अरे तुम इतनी जल्दी आ गए स्कूल से।”
“जल्दी नहीं है मम्मी, दो बज गए है़ं। देख लो घड़ी।”
“अरे हाँ बेटा सच में दो बज गए हैं। मुझे तो समय का भान ही ना रहा। बेटा तुम हाँथ-मुँह धोकर बैठो। अभी खाना लगाती हूँ।”
खाना देकर फिर वो धूप में आकर बैठ गई। सुबह से ही उसको ठंड लग रही थी। उसने देखा आसमान में पतंगें उड़ रही थी। और सब-एक दूसरे से जैसे आगे निकल जाने की चाह में दौड़ लगा रही थीं।
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एक दिन ठीक होकर लौट आई थी, मंजू। वो ब्रिगेडियर साहब के साथ लंदन जा रही थी।
उस दिन भी वो पहले दिन की तरह गेट पर आकर खड़ी हो गई थी। रूना की नज़र पड़ी तो हाथ पकड़कर अन्दर ले आयी।
बातों का सिलसिला चल निकला।
“कैसी है री तू?”
“ठीक हूँ, दीदी। देख लो सामने।
“दीदी जा रही हूँ लंदन। ब्रिगेडियर साहब की तबीयत ठीक नहीं रहती। अब एक पिता की तरह उनकी सेवा इतना सालों तक की है। अब वे मुझे छोड़ते ही नहीं। ख़ासकर उस घटना के बाद।”
रूना ने कुरेदना ठीक नहीं समझा। फिर भी बोली, “उस हैवान को जेल भेजा कि नहीं?”
“अब क्या करूँगी उनको जेल भेजकर। मेरा गया तो लौटेगा नहीं। माफ़ कर दिया उनको। आख़िर मेरे पिता हैं। उनको जो करना था वो कर चुके। ये तो अपने-अपने कर्म हैं। जो जैसा करेगा, वो वैसा भरेगा। यहाँ तो नहीं लेकिन वहाँ भगवान् इंसाफ़ करेंगे।”
कहते-कहते, मंजू की आँखों से मोतियों की लड़ियाँ बहने लगीं।
“तू तो बड़ी महान है री। कोई पुन्नी आत्मा है री किसी जन्म की। आख़िरी बार मिली उस हैवान से?”
“मैं उसका चेहरा भी नहीं देखना चाहती,”
रूना की रुलाई फूट गई—एक बेटी अपने पिता के बारे में ऐसा कह रही थी।
“ठहर तेरे दो सौ रुपये पड़े हैं। आई है तो लेती जा अपने पैसे।”
“रहने दो दीदी बच्चों को मिठाई खिला देना। मैं जल्दी में हूँ। फ़्लाइट छूट जाएगी। वैसे भी लंदन में रुपया नहीं चलता है। कभी वापस आई तो ले लूँगी।”
रूना पैसे लेने अन्दर चली गई। पैसे लेकर आई तो मंजू जा चुकी थी।
रूना के मुँह से निकला, “जुग जुग जियो बेटी। ख़ुश रहो जहाँ भी रहो!”
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