अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

मूर्ख अड़ियल पागल औरतें


 

मूल मराठी कविता: सारिका उबाले 
अनुवाद: विजय नगरकर

 
तुम जवान हो या बूढ़े, 
बदसूरत हो या राजसी, 
दुबले-पतले, मोटे, छोटे, 
गंजे हो या पूरे शरीर पर बालों वाले, 
भालू जैसे या बंदर जैसे . . . 
नाक टेढ़ी, चेहरा चपटा, सुंदर, 
काले, गोरे, लंबे, 
जैसे भी हो तुम . . . 
तुम्हें थामे रहती हैं जीवनभर 
‘मूर्ख अड़ियल पागल औरतें’। 
 
तुम्हें बुख़ार हो, 
या हार्ट अटैक, 
दस्त हो या उल्टियाँ, 
धूप लगे या चक्कर आए . . . 
जो हालत हो उसमें दौड़ती-भागती हैं, 
साड़ी ऊपर खोंसकर नंगे पाँव, 
मदद माँगने या डॉक्टर बुलाने, 
जद्दोजेहद करती हैं 
‘मूर्ख अड़ियल पागल औरतें’। 
 
तुम एक नंबर के निकम्मे हो, 
नालायक़ हो, 
कुछ समझ नहीं आता तुम्हें, 
अक़्ल मत सिखाओ, 
न ही ताने मारो . . . 
दिनभर सोते हो आलसी, 
जितना डाँटते हो, सहती हैं, 
कभी लात, कभी मुक्के, 
फिर भी 
तुम्हें छोड़ती नहीं, 
जोंक की तरह चिपकी रहती हैं 
‘मूर्ख अड़ियल पागल औरतें’। 
 
तुम ऑफ़िस से चिढ़कर आओ, 
या मज़दूरी से थककर, 
शराब पीकर या गाँजा फूँककर, 
अफ़ीम, चरस, ड्रग्स, सिगरेट, 
या बीड़ी पीकर, 
तुम्हारी सेवा के लिए तैयार रहती हैं, 
रात हो, देर रात हो, दिन हो, 
पैर फैलाकर बिस्तर बन जाती हैं 
‘मूर्ख अड़ियल पागल औरतें’। 
 
थक जाती हैं, टूट जाती हैं, 
घिस-घिसकर बारीक़ हो जाती हैं, 
हज़ार बार मर जाती हैं, फिर भी 
तुम्हारे नाम की सौभाग्यवती बनी, 
जीवनभर दिखाती रहती हैं 
‘मूर्ख अड़ियल पागल औरतें’। 
 
तुम उनसे प्यार करो, 
या न करो, 
बाहर अफ़ेयर करो या झगड़ा, 
वक़्त-बेवक़्त बाहर जाओ, 
बताकर जाओ या न बताओ, 
तुम्हारा घर अडिग रहेगा, 
और संसार सुचारु . . . 
उपमा, साँजा, पोहा का नाश्ता, 
बिना चूक के मिलता रहेगा, 
दो वक़्त का खाना, 
चटनी, सलाद, अचार, पापड़, 
त्योहार, मेहमाननवाज़ी, शुद्ध घी, 
इडली, ढोकला, डोसा घर का, 
शेवई, कुरडई, वडी, सांडगे, 
सालों-साल, 
चिंता करने की वजह नहीं . . . 
व्यवस्था ने इन्हें हमेशा तुम्हारे पैरों से बाँध रखा है 
‘मूर्ख अड़ियल पागल औरतें’। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अकेले ही
|

मराठी कविता: एकटाच मूल कवि: हेमंत गोविंद…

अजनबी औरत
|

सिंध की लेखिका- अतिया दाऊद  हिंदी अनुवाद…

अनुकरण
|

मूल कवि : उत्तम कांबळे डॉ. कोल्हारे दत्ता…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

अनूदित आलेख

अनूदित कविता

साहित्यिक आलेख

काम की बात

सांस्कृतिक आलेख

रचना समीक्षा

ऐतिहासिक

शायरी

सामाजिक आलेख

पुस्तक समीक्षा

स्मृति लेख

आप-बीती

पुस्तक चर्चा

लघुकथा

कविता

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

हास्य-व्यंग्य कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं