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आज की बात

एक श्मशान मेरे अन्दर भी है।
मुझे पता है मेरे प्यार का हश्र,
उस दिन मैं भी जला दूँगा इसकी शक्ल
सुना है चिता की आग हर हाल में जल जाती है।

 

मुझे पता है तुम अपना वक़्त,
ज़िम्मेदारियों में काट देते हो।
मैं भी कहाँ हूँ ख़ाली,
बची उम्र अल्फ़ाज़ों को लिखने में काट देता हूँ।

 

अब न तो मेरे लिए दिन है. . .
न अब मेरे लिए रात
अब मैं बँटवारे में टूट चुकी मकान की दीवार हूँ।

 

मेरे मन के आँगन में भी,
एक गुलाब खिला था।
लेकिन उसके काँटे,
तो मेरे जिस्म को चीर गए।

 

अब कहाँ है इल्म की इज़्ज़त
जब से लोग बच्चों का नक़ाब पहने हैं।
फिर भी ख़ुश नहीं होते हैं ये बच्चे,
ज़रूरत से ज़्यादा भावनाओं से खेलकर।

 

अब रिश्ते कहाँ दिल से बनाते हैं लोग।
बस अब खा लेते हैं रिश्ते हिसाब से
सुना है अब लोगों को रिश्ते भी नहीं पचते।

 

मुक़म्मल जनाज़ा भी नहीं था उसका।
लगता था दोस्त. . .
किसीकी ख़ुशियों के लिए
बहुत पहले ही ख़ाक़ में मिल गया था।
 

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