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समय पर

चेतनाएँ, 
धीरे-धीरे गल रहीं हैं मेरी! 
तुम्हारी यादों के ऑंच पर! 
 
ये अँधेरी चुप सी रात, 
तुम्हारे लिबास सी थम जाती है . . . 
मेरे जिस्म की तह पर . . .! 
 
तुम्हें, 
खो रहा हूँ मैं! 
अपनी चलती साँसों की हर एक कड़ी में! 
 
तुम्हें फिर से
मुकम्मल करने की ख़्वाहिशें मेरी
मेरे ग़मों के बाज़ार में बिक जाती है, 
मैं क्या करूँ?

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