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अभी मत बोलो

नहीं,
कुछ मत बोलो,
कुछ भी नहीं
न अपना और न दूसरों का।

अभी धुँधले है तुम्हारे शब्द,
आवाज़ भी नहीं है साफ
विचारों की मसें तक नहीं भीगी हैं अभी,
और तुम,
चाहते हो कुछ कहना
देना चाहते हो "कुछ" अधपका
क्यों, केवल एक साँस भरकर
मिट जाना चाहते हो जगत के मस्तिष्क से?

सहो,
जीवन को पूरा-पूरा सहो,
बैठ कर देखो गहरे पानी,
और गहरे
घ्राण की अन्तिम सीमा तक सूँघो,
पोर-पोर में भर लो इसकी छुअन
आकंठ चखो जीवन को
फिर पहुँचो जिन निष्कर्षों पर
आत्मा की पूरी उष्मा देकर
कह डालो सहज भाव से,
दे डालो बिना अहसान के,
मत सोचो सूक्तियाँ अमर रहती हैं
या, भक्तों की एक भीड़ होती है
जो बनाती है किसी को सिद्ध!

पहुँच जाना किसी निष्कर्ष पर
कर लेना उसकी अनुभूति....
यह सिद्धि है बहुत बड़ी!
मत करो चेष्टा
निष्कर्षों को अपने पोस्टर बनाकर
जबरदस्ती चिपकाने की
मस्तिष्क की दीवार पर,
क्योंकि तब
तुम्हारी आवाज़,
खो जाएगी
और जनता तुम्हें कट्टर, पूर्वाग्रही
कह कर मुँह चिढ़ायेगी
जान लो,
सबका अपना-अपना सच होता है
हर किसी का अपना एक दर्द होता है
भोगकर उसे
पाता है हर एक, अपने "एक" निष्कर्ष को॥

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