अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

भविष्य की नाहक़ चिन्ता

ज़्यादातर पुरानी पीढ़ी का
है यह सोचना कि
थामा हुआ है उन्होंने आसमां,
नहीं रहेंगे कल को जो 
तो टूट कर  गिर जाएगा
अगली पीढ़ियों पर यह जहां,
 
लगे रहते हैं उम्र भर वो
अपना पेट काट-काटकर
उनके लिए धन-सम्पत्ति 
करने जमा,
चाहे फिर वो बुढ़ापे में
सेवा-टहल करें ही न उनकी
और न बन पाएँ हमनवाँ,
 
कर देना चाहते हैं वो लोग
अपनी कई पीढ़ियों तक के लिए
बैठ कर खाने का भंडार जमा,
बिना यह सोचे कि जाने कैसा
लिखा गया हो 
क़िस्मत में उनकी समां,
 
अपने बच्चों को अक़्सर वो
डराते रहते हैं भविष्य का
भयानक सा चित्र दिखा,
अपने दम पर कर सकते हैं
उनके बच्चे कुछ सही
होता नहीं इसका उनको भरोसा,
 
सोचते नहीं इतना सा वो
कि सिर पर पड़ जाए जिसके 
जो बला,
उसे वो दे ही देता है अंजाम
थोड़ा बुरा या भला,
 
अपने बच्चों पर भरोसा 
करने के लिए उन्हें देखना चाहिए
दीवार पर अपने बुज़ुर्गों का चित्र टँगा,
जो उनके बारे में भी सोचते होंगे
यही कि उनके बच्चे उनकी तरह
नहीं चला पाएँगे यह दुनियादारी का कारवां।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

528 हर्ट्ज़
|

सुना है संगीत की है एक तरंग दैर्ध्य ऐसी…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं