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क़िला फ़तह आज भी करते हैं लोग! 

"क़िला फ़तह करना" शब्द आज भी प्रासंगिक है जबकि आज न तो कोई राजा-महाराजा है और न ही कोई क़िला बनवाता है। लेकिन इसके बावजूद कुछ लोग रोज़ क़िला फ़तह कर रहे हैं हमारा ध्यान इन पर भले ही न जा रहा हो! 

अब आप पूछेंगे कौन रोज़ क्यों और कैसे क़िला फ़तह कर रहा है? 

हाँ यदि आप पेरेंट नहीं हैं तो आपको इसका भान नहीं होगा और यदि आप हैं तो हो सकता है कि आप भी क़िला फ़तह करने वालों में शामिल हो लेकिन आपको अपनी इस उपलब्धि के बारे में पता न हो।

बच्चे के बड़े होने के साथ ही आप इस क़िला फ़तह करने वाले क्लब में शामिल होते हैं। जब आप अपने बच्चे का एडमीशन अच्छे नर्सरी स्कूल में कर लेते हैं तो यह आपका पहला क़िला फ़तह होता है! फिर बच्चा और बड़ा हुआ तो एक अच्छे स्कूल के एंट्रेंस टैस्ट में उसे पास करवा कर नियमित कक्षाओं में दाख़िला करवा लेना आपका दूसरा क़िला फ़तह होता है। वैसे स्कूल वाले शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत आठवीं तक की कक्षाओं के लिये कोई प्रवेश परीक्षा आयोजित नहीं कर सकते हैं लेकिन कुछ स्कूल वाले जानते हुए भी इसे मानते नहीं हॅै क़िला फ़तह करने के लिये पेरेंट्स को मजबूर करते हैं। 

अब आपका बच्चा यदि नौवीं कक्षा में पहुँच गया है और अब आप यदि और अच्छे स्कूल में दाख़िला दिलवाना चाह रहे हैं तो यह एक और बड़ा क़िला फ़तह करने के समान है! आप कितने भी बड़े तोपचंद या मिसाईल मैन हो आप स्कूल के टैस्ट में बच्चे को पास करवा कर एडमीशन करवा पाये तो यह एक और सबसे महत्वपूर्ण क़िला फ़तह करना होगा! अब ये तो बात हुई अच्छे स्कूल में एडमीशन की अभी एक और महत्वपूर्ण क़िला फ़तह करना बाक़ी है। ये है बच्चे को किसी अच्छे कोचिंग संस्थान में एडमीशन दिलवा लेना क्योंकि यहाँ भी आजकल प्रवेश परीक्षा होती है। इसे पेरेन्टस हल्के से नहीं लेना नहीं तो सबसे महत्वपूर्ण क़िला फ़तह करने से आप चूक जायेंगे! और गंगू की बात को ग़ौर कीजियेगा आप सोसायटी में दीन-हीन और मीन व्यक्ति हो जायेंगे जिसमें कोई "कीन" नहीं होगा। आपका जो होगा सो होगा परन्तु आप अपने बच्चे के बारे में तो सोचिये कि वह कितना हीन भावना से भरपूर हो जायेगा तो आपका गरूर कहाँ जायेगा। याद रखिये क़िला फ़तह करना एक सीरीज़ में चलने वाली प्रक्रिया है जब तक कि आपका बच्चा कालेज में दाख़िला न ले ले। 

माँ-बाप आज अपने बच्चों के ख़ातिर क़दम-क़दम पर क़िला फ़तह कर रहे हैं। पहले का क़िला फ़तह करना तो गंगू आज के क़िला फ़तह से आसान मानता है। पहले जिसकी सेना और रणनीति मज़बूत रहती थी वह क़िला फ़तह कर लेता था, लेकिन आज का क़िला फ़तह करना आसान नहीं है। आप बड़े पद पर हो सकते हैं, आप बड़े आदमी हो सकते हैं, आप बड़े कलाकार हो सकते हैं, आप बड़े लेखक हो सकते हैं, आप बड़े संगीतकार हो सकते हैं, आप बड़े खिलाड़ी हो सकते हैं परन्तु यह सब आपके किसी काम का नहीं। इस क़िला फ़तह के खेल में अलग तरह की योग्यता चाहिये! यदि आप अपने बच्चे की अच्छे स्कूल और अच्छे कोचिंग संस्थान में एडमीशन नहीं करवा पाये तो आप कुछ भी नहीं और आपकी हस्ती भी इतनी सस्ती कि किसी काम की नहीं। 

अब जब क़िला फ़तह करना ही है तो इसके बारे में तैयारी भी अच्छी होनी चाहिये ताकि सफलता आपको मिले मतलब आपके बच्चे को मिले! आप जब भी किसी शैक्षणिक संस्थान में किसी टैस्ट या दाख़िले के काम से जाएँ तो कई बातों का ध्यान रखें जैसे आपकी ड्रेस अच्छी हा़ेनी चाहिये, दाढ़ी बग़ैरह बढ़ी नहीं होना चाहिये नहीं तो आपके बच्चे की बाढ़ यहाँ रुक सकती है और पत्नी साथ में हो तो उनकी साड़ी वगैरह अच्छी होनी चाहिये! आप अपराधी की तरह सिर झुकाकर संस्था के परिसर में बैठे रहें यदि कोई तीन चार घंटो में एक गिलास पानी के लिये भी नहीं पूछे या मिलने का नम्बर दो घंटे में भी न आये तोे बुरा न मानें, सोचें कि कैसे आप अपने कार्यालय में लोगों को इंतज़ार कराते हैं। यह उसी का फल है। तथा ये मानें कि यह वह ज़ोन है जहाँ आपका पद, पैसा, सम्मान कुछ भी काम नहीं आता है। उसे सब को घर में छोड़ कर आएँ नहीं तो फिर आप अपने बच्चे के बारे में सोच रहे सपनों को घर छोड़ कर आएँ। 

 हाँ, एक और बात को याद रखें कि जब क़िला फ़तह कर लिया हो तो जीत को हार में न बदले यह कहकर कि किताबें स्कूल द्वारा बताये समय, दिन, स्थान और दुकान से ही क्यों ख़रीदी जाएँ? आपको क्या पता नहीं है कि स्कूल वालों का इससे इमोशनल अटेचमेंट होता है। वे नहीं चाहते कि उनके प्रिय छा़त्र किसी ऊट-पटांग दुकान से यह सब खरीदें! और हाँ यदि वे यूनिफ़ॉर्म भी किसी ऐसी दुकान से ख़रीदने को कहें जिसने कि पहली बार ही ये काम शुरू किया हो; तो माँईड नहीं करना है। नहीं तो आपका क़िला फ़तह रिबाऊंड हो सकता है! इसमें इस बात का भी कोई ध्यान रखने की ज़रूरत नहीं है कि मान लीजिये यदि आपकी बिटिया या बेटा कक्षा सात और कक्षा नौ के विद्यार्थी हैं और यूनिफ़ॉर्म छोटी या बड़ी दे दी गई है; तो यह भविष्य को देखकर ही किया गया होगा। बच्चे तेज़ी से बढ़ते हैं कि आपका मतलब स्टूडेन्ट के पेरेंट्स का निकट भविष्य में ज़्यादा नुक़सान न हो तो बड़ी साईज़ की यूनिफ़ॉर्म दे दी गई हैं। यदि छोटी साईज़ की दे दी गई हैं तो यह भी भविष्य को ध्यान में रखकर ही दी गई होगी। छोटे भाई-बहन भी तो कल के दिन स्कूल जायेंगे? तो फिर कहाँ बार-बार समय बेकार करेंगे?

आपने अपने वार्डस के लिये इतने क़िला फ़तह किये हैं कि आपके मन में कोई गिला-शिकवा नहीं होना चाहिये कि स्कूल वालों ने आपको बेआबरू करके ही छोड़ा। आपको लंबी रेस का घोड़ा मानकर ख़ूब दौड़ाया। बड़े लोगों के साथ ऐसी छोटी-छोटी घटनाएँ होती रहती हैं। आपको तो इनका एहसानमंद होना चाहिये कि आपको झुकना सिखाया गया। नहीं तो जैसे तूफ़ान में वृक्ष धराशायी हो जाते हैं और छोटे पेड़ साबूत बने रहते हैं; तो आप भी जिंदगी के आनेवाले तुफ़ानों में अब धराशायी नहीं होंगे। साबूत बने रहेंगे, नहीं तो आपके ताबूत में चले जाने का अंदेशा था! 

गंगू तो कहता है कि हे भगवन अगले जन्म में मुझे किसी अच्छे स्कूल का मालिक या प्रिंसिपल बनाना या यहाँ का कुछ नहीं तो चपरासी ही बना देना। कम से कम क़िला फ़तह करने में कुछ सपोर्ट तो मिल ही जायेगा।    

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