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सुनो स्त्री . . .

छुपाती हो जब तुम
अपनी झूठी मुस्कराहट के पीछे
ज़िंदगी के सौ दर्द-ओ-ग़म,
 
अपमान के कड़वे घूँट
पी जाती हो हर बार
सिर्फ़ इसीलिए कि कहीं 
बदनामी न हो जाए समाज में,
 
पहले थप्पड़ को 
माफ़ कर देती हो कभी-कभार का
आवेश समझकर,
 
माहौल ना ख़राब हो घर का,
उसकी सारी ज़िम्मेदारी
ले बैठ जाती हो सिर्फ़ अपने सर पर,
 
उसी पल में तुम दे देती हो
पुरुष को यह अधिकार
कि वो तुम्हें डाँटता-फटकारता रहे
पूरे जीवन भर के लिए,
 
जिस दिन तुम हिम्मत कर दोगी
जवाब देने की अपने ऊपर होने वाले 
हर उत्पीड़न के ख़िलाफ़,
मेरा यक़ीन मानो!
दुनिया के किसी पुरुष में हिम्मत नहीं होगी
तुमसे नज़रें तक मिलाने की,
अत्याचार करना तो दूर की बात है।

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