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तुलसी काव्य में आलोचना का प्रेरणार्थक स्वरूप

ईश्वरीय शक्ति के माध्यम से जगत का निर्माण व इसकी सृजनात्मक शक्ति निश्चय ही अनिर्वचनीय तथा वर्णनातीत है। जगत के सृजन का आधार मानते हुए ईश्वर ने परस्पर दो विरोधी शक्तियों को इस प्रकार नियोजित किया है कि विपरीत परिस्थितिजन्य होते हुए भी उनमें ऐसी अदृश्य एकरूपता दृष्टिगोचर होती है कि एक-दूसरे के बिना उनका कोई अस्तित्व नहीं। यथा- सुख-दुख, हानि-लाभ, फूल-शूल, सज्जन-दुर्जन, अच्छाई-बुराई जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न होकर एक-दूसरे के महत्व को बढ़ा देती हैं। सुख का महत्व इसीलिए है क्योंकि दुनिया में दुख है। पतझर ऋतु में ही पुष्पवाटिका के सुखद दिग्दर्शन का स्वप्न आँखों में तिरता रहता है। ये सभी परिस्थितियाँ तो प्राकृतिक परिवर्तनों के प्रभाव में आबद्ध हैं अतः समयानुसार इनका परिवर्तन चक्र चलता ही रहता है। युगों-युगों से जो विरोधी शक्तियाँ समान स्तर पर मानव समाज को प्रभावित करती चली आ रही हैं, वह हैं- अच्छाई-बुराई, संत-असंत, सज्जन-दुर्जन, धर्मात्मा-पापात्मा आदि। वास्तव में यही वे शक्तियाँ हैं जिन्होंने इतिहास की आधारशिला हिला कर रख दी। चाहे सतयुग हो, त्रेता हो या द्वापर। हर युग में अच्छाई-बुराई का द्वंद्व चलता ही रहता है। इसी कारण कई बार तो धर्म भी ख़तरे में पड़ जाता है जिसके रक्षार्थ अवतारवाद की कल्पना को बल मिलता है। धर्म और अधर्म के इस युद्ध में धर्म सदैव अधर्म की आलोचना का शिकार हुआ है। कलयुग की परिधि में रहकर चर्चा की जाए तो धर्म और मर्यादाहीनता की स्थिति तो पूर्व के युगों में देखी जा चुकी है जिसके लिए ईश्वर ने स्वयं अवतार लेकर धर्म और मर्यादा को पुनः स्थापित किया। परंतु कलियुग में उच्छृंखलता, अनाचार और पापाचार का फैलता जाल विकराल रूप लेता जा रहा है। ऐसी विकट स्थिति के निराकरण हेतु सामाजिक चेतना के जागरण के उद्देश्य से संत शिरोमणि तुलसीदास ने समाज के सामने ‘रामचरितमान’ के रूप में रामकथा का एक सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया। 

यह सत्य से परे नहीं कि अनाचार और भ्रष्टाचार के इस युग में किसी सज्जन व्यक्ति द्वारा धर्म और नीति की बातें करना अपना वैचारिक मख़ौल उड़ाना है किन्तु इस सत्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि आज भी धरती पर नीति और धर्म के पक्षधरों की कमी नहीं है। यह और बात है कि धर्मावलंबियों को कतिपय दुराग्रही लोगों की कटु आलोचना का शिकार होना पड़ता है। कई बार ऐसी स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है कि ऐसे दुराग्रहों और आलोचनाओं के चलते व्यक्ति उचित मार्ग का अनुसरण करने से विमुख होने लगता है। भारत के मूर्धन्य मनीषियों की जीवन शैली पर दृष्टिपात किया जाए तो किसी का भी जीवन चरित ऐसा नहीं जो लोकापवाद से बच सका हो। बल्कि इन दिग्गज व्यक्तित्वों ने तो आलोचनाओं को अपने धर्म के मार्ग पर पुष्पपथ की तरह सुकोमल पाया और इन आलोचनाओं से प्रेरणा ग्रहण कर सफलता के सोपान पर चढ़ते गए। मानस प्रणेता तुलसीदास का जीवन चरित भी ऐसे ही महान आदर्शों का सम्मिश्रण है। लोकमंगल की भावना से अभिप्रेरित ‘रामचरितमानस’ महज़ भारतीय जीवन दर्शन के लिए ही नहीं वरन विश्व संस्कृति के लिए भी पथ प्रदर्शक है।   

तुलसी काव्य में आलोचना के फलस्वरूप पड़ने वाले कुप्रभाव को ही नहीं वरन प्रतिद्वंद्वी द्वारा की गई आलोचना को भी निन्दा न समझकर प्रेरणास्वरूप ग्रहण करने पर प्राप्त होने वाले उसके सुफल पर भी प्रकाश डाला गया है। यद्यपि तुलसी ने मानवादर्श की स्थापना के उद्देश्य से एक स्थान पर लिखा है कि –

"जड़ चेतन गुन दोषमय, विस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पय, परिहरि बारि विकार॥"

अर्थात-  “ईश्वर ने इस संसार का निर्माण अच्छाई व बुराई से युक्त किया है। किन्तु इस संसार में जो हंस प्रकृति के प्राणी हैं वे समस्त सांसारिक विकारों को पानी की तरह छोड़कर अच्छाई रूपी दूध ही ग्रहण करते हैं।" इससे यह स्पष्ट होता है कि संसार में सब कुछ ग्रहण करने लायक़ नहीं है। श्रेष्ठ व्यक्ति में इतना साहस होना चाहिए कि वह भले बुरे की परख करके बुराइयों को छोड़े व अच्छाइयों को अपनाता चले। फिर भी यह सृष्टि बुरा सोचने की प्रवृत्ति से विहीन नहीं है। संसार में श्रेष्ठ कार्यों के विपरीत आलोचना के माध्यम से सदैव प्रतिवाद की स्थिति निर्मित होती हुई देखी जा सकती है। वास्तव में यदि आलोचना के अर्थ को गहराई से समझने का प्रयास किया जाए तो ज्ञात होगा कि आलोचना किसी श्रेष्ठ व्यक्तित्व या कृतित्व का सम्यक विश्लेषण कर उसमें पर्याप्त सुधार कर किसी व्यक्ति या कृति को उसके वर्तमान स्वरूप से अधिक श्रेष्ठ व सुन्दर बनाने का प्रयास करे व उचित परामर्श दे तो वहाँ पर आलोचना का सौन्दर्य निखरता है। किन्तु जहाँ किसी अन्य की योग्यता व क्षमता को स्वयं में न पाकर निरर्थक किसी व्यक्ति के श्रेष्ठ कार्यों की निन्दा की जाए तो ऐसी आलोचना को मस्तिष्क की विकृति ही मानना चाहिए। ऐसी विकार ग्रस्त आलोचना अपने प्रस्तुत रूप में कभी-कभी इतनी उत्तेजक होती है कि संबंधित व्यक्ति का मनोबल डगमगा सकता है। तुलसी ने आलोचना के आंतरिक स्वरूप का बखान करते हुए कहा है कि- "प्रगति के पिपासु मनुष्य के लिए सौन्दर्य मंडित आलोचना की अति आवश्यकता है ताकि बची हुई थोड़ी बहुत कमज़ोरियाँ भी दूर होती रहें और व्यक्ति आध्यात्मिक व नैतिक स्तर पर सदैव सुधारवादी बना रहे। परंतु यदि कभी विकृत आलोचना से व्यक्ति का सामना हो जाए तब भी चिन्ता की बात नहीं क्योकि ऐसी आलोचनाएँ भी अपने साथ प्रेरणा का अजस्र स्रोत लेकर आती हैं जिन्हें विवेकी व्यक्ति ही समझ पाते हैं। तुलसी के शब्दों में –

"खल परिहास होई हित मोरा।
काक कहहिं कल कंठ कठोरा॥"

अर्थात- "यदि दुष्ट मेरे इस लोकमंगल के प्रयास की निन्दा करेंगे तो इससे मेरी भलाई ही होगी क्योंकि कौआ कोयल को कठोर बोलने वाली कहता ही है।" स्पष्ट है कि मनुष्य अपनी वृत्ति के अनुरूप ही दूसरे के साथ आचरण करता है। किन्तु यह आवश्यक नहीं कि बुराई का प्रत्युत्तर बुराई से ही दिया जाए क्योंकि तुलसी के अनुसार -"कौआ कोयल को कठोर बोलने वाली कह तो देता है किन्तु लाख प्रयास के बाद भी वह कोयल की मीठी वाणी नहीं पा सकता।" सत्य है बुरी भावना रखने वाले मनुष्यों की आलोचना से श्रेष्ठ मनुष्यों की श्रेष्ठता समाप्त नहीं हो सकती। इस भाव को तुलसी ने मानस में इस प्रकार व्यक्त किया है-

 "हंसहिं बक दादुर चातकहिं।
हँसहिं मलिन खल विमल बतकहिं॥"

अर्थात-  "बगुले हंस की, मेंढक पपीहे की तथा मैली बुद्धि वाले दुष्ट निर्मल और अच्छी बातों की हँसी उड़ाते हैं।" वास्तव में तुलसी की अद्भुत वाणी लोकमंगलकारी भावना का प्रस्फुटन करती है कि सन्मार्ग पर चलने वालों को कभी भी दुष्टों की निन्दा से प्रभावित नहीं होना चाहिए वरन शांत भाव से आत्म कल्याण तथा समाज कल्याण की महती तप साधना में निरत रहना चाहिए। निन्दा करने वालों का तो यह स्वभाव ही होता है कि जो कार्य उनकी रुचि के विपरीत होता है, उसमें वे अड़ंगा लगाते ही हैं। अतः ऐसे प्रतिवादियों के तर्क-कुतर्क में न पड़कर व्यक्ति यदि अपनी आत्मशक्ति को पहचाने तथा ईश्वरीय कृपा के अनुग्रह की कामना करते हुए अपने पुरुषार्थ पर अड़ा रहे तो सफलता स्वयं आगे बढ़कर ऐसे व्यक्तियों का वरण करती है। इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिए तुलसी ने स्वयं के अनुभव को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया है –

"संभु प्रसाद सुमति हिय हुलसी।
रामचरित मानस कवि तुलसी॥ "

अर्थात-  "भगवान शिव की कृपा से तुलसी के अंतःकरण में सद्बुद्धि जागृत हुई, फलस्वरूप रामचरित मानस की रचना हुई।" स्पष्ट है कि ईश्वरीय कृपा से ही मनुष्य में सद्बुद्धि का विकास होता है। सद्बुद्धि विकसित होने पर मनुष्य के हाथों महान व श्रेष्ठ कार्य संपादित होते हैं। तुलसी की ये अभिव्यक्ति मनुष्य के चेतन मन में ईश्वर के प्रति आस्था विकसित कर स्वबुद्धि व स्वविवेक का प्रयोग कर किसी स्वस्थ निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए प्रेरित करती है। वास्तव में आस्था और विश्वास से उत्पन्न यही प्रेरणा मानवीय पुरुषार्थ की प्रथम सीढ़ी है।

मानवीय संचेतना में कई बार ऐसी मनःस्थिति जन्म लेती है जो इस बात के लिए जिज्ञासा प्रकट करती है कि क्या आलोचक का स्वरूप सदैव निंदक के रूप में ही सामने आता है? वास्तव में आलोचना किसी व्यक्तित्व या कृतित्व का समुचित मूल्यांकन करना है जबकि निंदा प्रतिद्वंद्वी के प्रति विकारग्रस्त बुद्धि का परिणाम। आलोचना व निंदा के इस अंतर को एक उदाहरण के द्वारा समझा जा सकता है–  "यदि कोई अयोग्य बालक अपने किसी अयोग्य मित्र के श्रेष्ठ कार्यों की भी बुराई करने लगे व उसे स्वयं से निम्न कोटि का सिद्ध करने के लिए अनर्गल क्रिया-कलापों का सहारा लेने लगे तो यहाँ विकारग्रस्त बुद्धि के कारण निंदा का स्वरूप दृष्टिगोचर होने लगता है। किन्तु दूसरी ओर कोई मित्र अपने मित्र की महान सफलता से प्रसन्न तो हो पर उस सफलता में भी कोई कमी ज्ञात होने पर तत्काल अपने मित्र को उस कमी का भान कराए तथा अपनी समझ के अनुसार उस कमी को दूर करने के लिए मित्र को उचित परामर्श दे तो यहाँ आलोचना का सौन्दर्य निखर उठता है। इस प्रकार आलोचना अपने उर्जस्वित रूप में प्रेरक सिद्ध होती है। तुलसी काव्य में आलोचना को लेकर ऐसे प्रेरक तत्व स्थान-स्थान पर दिखाई देते हैं। कई बार आलोचना का कारण व्यक्ति का मानसिक क्षोभ भी होता है। मन में क्षोभ की स्थिति उत्पन्न होने पर घोर निराशा जनित उद्गार फूट पड़ते हैं। इस स्थिति में मनुष्य इस बात का विचार नहीं कर पाता कि उपस्थित व्यक्ति आलोचना का पात्र है भी अथवा नहीं। यह मनःस्थिति मानस में सीता स्वयंवर वाले प्रसंग में राजा जनक के माध्यम से स्पष्ट होती है। जब महान धुरंधर और शक्ति संपन्न राजाओं के द्वारा शिव धनुष हिलाया भी न जा सका तो अपनी प्रतिज्ञा पूरी न होते देख विदेहराज जनक अत्यन्त आकुल हो उठे। क्षोभ जनित मनः स्थिति के कारण उपस्थित अतिथियों के प्रति सम्मान भाव होते हुए भी उनके मुख से कटु उद्गार फूट पड़े- "यदि मैं जानता कि अब पृथ्वी पर कोई वीर नहीं है तो मैं ऐसा प्रण करके क्यों हँसी का पात्र बनता। अब कोई अपनी वीरता का बखान न करे तो अच्छा है।" राजा जनक के इन कटु वचनों का अन्य आर्यों पर तो विशेष प्रभाव दिखाई नहीं देता किन्तु लक्ष्मण चुप न रह सके – 

"रघुबंसिन्ह महुँ जहं कोई होई।
तेहि समाज अस कहइ न कोई॥
कही जनक अस अनुचित बानी।
विद्यमान रघुकुल मनि जानि॥"

अर्थात- "जिस समाज में रघुवंशियों में से कोई एक भी उपस्थित हो वहाँ कोई ऐसी बात न कह सकेगा। राजा जनक ने तो रघुकुल शिरोमणि श्रीराम के होते हुए भी ऐसी अनुचित बात कही है।" तुलसी इस प्रसंग के माध्यम से स्पष्ट करते हैं कि आलोचक के शब्दों को सुनकर ही उसे अपना कोपभाजन नहीं बनाना चाहिए वरन पहले यह विचार करना चाहिए कि आलोच्य वाक्य कहते समय वक्ता की मानसिक स्थिति क्या है तथा उसके द्वारा ऐसा व्यवहार करने का हेतु क्या है। ऐसा केवल विवेक से ही संभव है।

वास्तव में तुलसी ने रामकथा का आधार लेकर आलोचना वृत्ति को एक कसौटी की भाँति माना है जो समयानुसार मनुष्य की स्वस्थ विचार-शक्ति व विवेक-कौशल का आकलन करती है। साथ ही वैचारिक शक्ति को पुष्टता प्रदान करती है। यदि कोई बालक अपने लिए मीठे फल का चयन कर कटु फल अपने मित्र को दे दे तो यह निश्चय ही चिन्ता का विषय है क्योंकि इससे एकता और समता बाधित होती है साथ ही स्नेह भी कुंठित होने लगता है। किन्तु बालक की अस्वस्थता की स्थिति में यही कड़वापन कटु औषिधि के रूप में जब माता बालक को पिलाती है तो यह कड़वापन बालक के लिए अमृत बन जाता है। तुलसी काव्य में ऐसे संदर्भों की कमी नहीं जहाँ मानवादर्शों का चरम स्वरूप दृष्टिगोचर होता है। तुलसी काव्य का हर शब्द मनुष्य को प्रेरणास्फूर्त व प्रगतिगामी बनाने के लिए संजीवनी बूटी है। तुलसी के अनुसार आलोचना को वैचारिक परिष्कार की दृष्टि से कटु औषिधि के रूप में ग्रहण करना चाहिए। आलोचना के निकष से गुज़रने के बाद ही राम को गुरु आदेश प्राप्त होता है –

"उठहुं राम भंजहुं शिव चापा।" और इस प्रकार राम शक्ति स्वरूपा सीता का सानिध्य प्राप्त कर "निशिचर हीन करौं महि" के अपने संकल्प को पूरा करते हैं। मानस में आलोचना के सकारात्मक पक्ष को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है जिससे आध्यात्मिक पुष्टता व सामाजिक उत्थान की भावना को बल मिलता है। इस अर्थ में तुलसी के काव्य-दर्शन में आलोचना के प्रेरक स्वरूप की सार्थक अभिव्यक्ति हुई है।

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