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वो तरक्क़ी पसंद है

वो तरक्क़ी पसंद है
फ़िक्रमंद भी..!
पिछड़े से गाँव से ले आया है अपने माँ-बाप को
खेतों की गंध वाले कपड़े 
पेड़ों से कटी-बनी खूँटियों पर लटकने लगे हैं अब!

 

पिता के गाँठों भरे हाथ,
खुरपी की जगह 
पकड़ने लगे गैस-स्टेशन का पंप!
माँ ने झुकी कमर सीधी की
और सँभाल लिया चूल्हा चौका!
घुटनों के दर्द को भूल 
बन गई है पोते के लिये घोड़ा..!

 

माता-पिता देखते हैं चुपचाप 
एक-दूसरे को नज़र बचाते से!
उनकी आँखों में तैरने लगता है
गाँव का पीपल, चौपाल, हुक्का
हाट-मेला, पड़ोस के दोस्त और बहुयें…
उम्र के पन्ने भरे हैं इन्हीं से!

 

बुहार कर रख देते हैं सारी यादें 
वे साथ लाये एअर बैग में!
विदेशी भाषा की उनकी ये बातें
बेटे का ’घर’ नहीं समझता! 
बेटा गर्व से देखता है सब कुछ
गाड़ी, बँगला, बैंकबैलेंस और माँ-बाप!
बुदबुदाता है-सही समीकरण!
इतना सुख कहाँ था उस पिछड़े से गाँव में?

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