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निगाहों से मिरे सपने भला किसने चुराया है

 

1222    1222    1222    1222
 
निगाहों से मिरे सपने भला किसने चुराया है। 
शहर तेरा मुझे ए दिल कभी ना रास आया है। 
 
बनाते ही रहे जो घर जतन से हम मोहब्बत का, 
उसे घर के चराग़ों ने मुसलसल क्यों जलाया है। 
 
ज़माना कब किसी के दिल की बातों को समझ पाया, 
कभी कोशिश किया जिसने वो अक्सर चोट खाया है। 
 
सवालों में घिरे इस वक़्त की तासीर तो पूछो, 
जवाबों की गली से कोई क्या इस दर पे आया है। 
 
तिरा मैं नाम तो लिख दूं सितमगर अर्श पे लेकिन, 
मिरे दिल में तिरी रुसवाइयों का डर समाया है। 
 
मुसाफ़िर हूँ यहाँ, मैं हूँ फ़क़त राहों से वाबस्ता, 
कहीं ठहरा जो दो पल तो सफ़र ने फिर बुलाया है। 
 
तिरी इस जुस्तजू में हम कहीं के ना रहे “शोभा,” 
लुटा जब आशियां दिल का तो हमको होश आया है। 

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