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आँखों में शाम

आज बिना कोट के,
सर्दी में घर से बाहर आ गये।
ग़रीबों की सर्दी महसूस करने।


कचरों की ढेर पर..
सिर्फ कचरे नहीं होते हैं साहब!
कितने बच्चों की,
ज़िन्दगियाँ बिखरी होती हैं।


दिन भर सच कहता हूँ..
लेकिन हर शाम,
एक झूठ भारी हो जाता है।
जब किसी से कहता हूँ..
सूरज देखो पश्चिम की ओर चला।


अब बच्चों में ताक़त,
संस्कारों से नहीं मिलती है।
अब तो ताक़त,
पाँच रुपये के बॉर्नबीटा के,
पैकेट में बिकती है।


मेरे सामने ही दुनिया इल्मदार हो गई..
मैं अभी तक,
उसके जैसा समझदार नहीं हो पाया।

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