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बचपन की दोस्त – मेरी गुलाबो

मैं और गुलाबो उर्फ़ पूजा बचपन की सहेलियाँ है। वो बचपन जब दोस्त शब्द का मतलब क्लास में किसी के पास  बैठने से निकाला जाता था। 3 बरस की उम्र में जब मैंने स्कूल जाना प्रारंभ किया, तब मेरी पहली सहेली बनी लक्ष्मी। जो साक्षात्‌ रानी लक्ष्मी बाई थी। उसने कभी किसी को मेरे आसपास फटकने तक नहीं दिया। मगर जैसे ही 5वीं क्लास में वो स्कूल छोड़ कर गई। तब से गुलाबो मेरे पास बैठने लगी। और जैसा कि शुरुआत में ही मैंने आपको बताया, कि हमारे लिए दोस्त शब्द का मतलब था क्लास में पास बैठना। उस हिसाब से अब गुलाबो मेरी दोस्त थी। मगर ये ईर्ष्या का गुण इसमें भी कूट-कूट कर भरा था। गुलाबो से भी तनिक सहन नहीं होता था कि कोई और लड़की मेरा हाथ पकड़े या मुझसे बात करें।

"ईर्ष्या, प्रेम के साथ उपजी एक परछाई है। जिसका स्वयं का तो कोई अस्तित्व नहीं, मगर इसकी मौजूदगी से प्रेम की उपस्थिति का पता अवश्य चल जाता है।" 
5वीं क्लास से शुरू हुई यही दोस्ती 9वीं क्लास तक ऐसे ही चलती रही। मगर तब एक शख़्स के आने से गुलाबो की ईर्ष्या हर हद पार कर चुकी थी। 

"हद से पार गई हर चीज़ मनुष्य को मात्र पीड़ा ही देती है, फिर चाहे वह ईर्ष्या हो या प्रेम"। 

9वीं क्लास में एक नई लड़की हमारी क्लास में आई, जिसका नाम था अंजली शर्मा। हालाँकि मैं उसके पास नहीं बैठती थी। मगर उस वक़्त उसका कोई दूसरा दोस्त नहीं था। इसलिए मैंने उससे दोस्ती कर ली। मेरे और उसके विचार बहुत मिलते थे, इसलिए मुझे उससे बात करना भी अच्छा लगता था। मगर ये बात गुलाबो को क़तई सहन नहीं होती थी। उसने शुरुआत में तो अंजली को मुझसे दूर करने की बहुत कोशिश की, मगर जब ये काम हो नहीं पाया, तो उसने मुझसे ही लड़ना करना शुरू कर दिया। 

"किसी को खोने का डर कभी हमारे मन में इतना पनप जाता है, कि वह हमारे रिश्ते में मौजूद प्रेम को ही मार देता है"।

और कुछ ऐसा ही हुआ हमारे बीच। कक्षा 10 में गुलाबो के इसी डर ने उससे वो शब्द भी बुलावा दिये, जो हम दोनों से कभी सोचे नहीं थे। उसके बाद हमने कई महीनों तक बात नहीं की।

"बात न करना दूरियों को जन्म देता है,और दूरियाँ रिश्ते की गहराई नापने का काम करती है"।

उस वक़्त हमारे बीच आई दूरियों से हम दोनों ने बहुत कुछ सीखा। मैंने सीखा कि  "हमें वक़्त-वक़्त पर अपनों को हमारे जीवन में उनकी अहमियत बताते रहनी चाहिए, जिससे कभी उनके मन मे असुरक्षा का भाव उत्पन्न न हो"।
और गुलाबो ने सीखा कि "हर व्यक्ति का हमारे जीवन में अलग-अलग स्थान होता है। और सबकी अलग-अलग अहमियत। इतनी ईर्ष्या भी सही नहीं कि हम अपनों को ही पीड़ा पहुँचानें लग जाएँ"।

यही लड़ाई हमारे जीवन की पहली और अब तक आख़री लड़ाई थी। इसके बाद से गुलाबो ने ईर्ष्या तो की, मगर कभी उसे सीमा से परे नहीं जाने दिया। और मैंने भी सदैव इस बात का ध्यान रखा कि मुझे खोने का डर उसके मन में न पनपे।

"रिश्ते में उतार चढ़ाव आना स्वाभाविक है,मगर निभाने की इच्छा अगर दोनों तरफ़ से हो, तो कोई भी रिश्ता कभी वक़्त के मँझदार में पीछे नही छूटता है"।

और हमारी दोस्ती भी कभी वक़्त के साथ पीछे नहीं छूटी।

क्योंकि हमारी दोस्ती—

"एक प्यार का नग्मा है,
मौजों की रवानी है।
ज़िंदगी और कुछ भी नहीं
तेरे मेरी कहानी है।"

 

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