अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

काँच के शब्द

लोग रक्तदान करते हैं,
मैं जज़्बात दान करता हूँ।
लोग जीवन देते हैं,
मैं कई बार जन्म लेता हूँ।
चश्मों से आँखें ठंडी नहीं हुआ करतीं
जब आँखों के नीचे,
आग ही आग हो।
घिन आती है मुझे अपनी नाक से
दुश्वारियों की बदबू,
सूँघ ही लेती है।
चिल्लाता हूँ मैं भावनाओं की क़ैद से
बस मेरी आवाज़,
आसमान ही सुनता है।
दुःख की दलदल भी,
बड़ी ज़िद्दी होती हैं।
एक पैर निकला भी नहीं,
दूसरा पैर धँस जाता है।
ये ख़्वाहिशें बहुत भारी होती हैं
एक ने अभी रुलाया ही था,
दूसरी ने कंधे को तोड़ दिया।
लोग कहते हैं,
मैं शब्दों से ज़हर उगलता हूँ।
अरे साहब!
जब मैंने ही इसे पीया है तो,
उगलेगा कौन?
हर चीज़ छोटी नहीं होती
छोटी तो बस सोच होती है।
माँ के सिवाय यह जहान
कितना सूना-सूना है।
झींगुरों की आवाज़,
हर शाम बता जाती है।
इन्सानों से बेहतर हैं मेरे बरतन
जब भी मैल जमता है,
उसे धो कर अपने पास रख लेता हूँ।
अन्धेरा सिर्फ़ रातों में ही नहीं होता
कभी-कभी थकी,
आँखों में भी होता है।
आज रोटी खाते-खाते,
मैं फिर रो पड़ा।
रोटी के एक-एक टुकड़े में,
माँ का जला हाथ नज़र आया।
लोग कहते हैं,
मुझे कम सुनाई देता है।
सब सुनता हूँ,
बस सच और झूठ कह नहीं पाता हूँ।
बार-बार कहते हैं सब,
हाथ साफ़ नहीं है।
क्या हाथ का साफ़ होना ज़रूरी है?
या नीयत का साफ़ होना?
कफ़न से जाकर कोई कह दे. . .
अभी दुकानों में ही पड़ा रहे,
अभी कई ख़्वाहिशें मेरे ज़िन्दा हैं।
कभी-कभी कुछ एहसासों को,
अपने जेबों में बचा लेता हूँ - उनके लिए,
कोई रोज़ पूछ लेता है,
आप कैसे है?

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं