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मैं दोषी कब था

मैं दोषी कब था,
मुझे सही कहाँ बनाया गया।
लोग मुझे जज़्बातों के आँच पर,
हमेशा भूनते रहे।
और बचा मैं... सिर्फ़ राख,
किसी ने माथे पर लगाया तो,
कोई थूक कर चला गया।

मैं फिर भी दोषी था,
शिकायत रहता है समाज का,
तुम सख़्त हो कठोर हो!,
जलाया तो गया था मुझे बार-बार,
अनसुलझी भूल की अग्नि में,
जो मैंने कभी की ही नहीं थी।
कठोर लोहे की तरह बेमुरव्वत,
पिघलाया मुझे उसी तरह,
और बार-बार मुझे मोड़ा गया।

मैं फिर भी दोषी था।
मेरी ख़ामोशी की क्या,
क़ीमत लेंगे लोग?
तिरस्कार के शब्दों में,
मुझे बार-बार ढाला गया।
किसी ने उस का अर्थ,
शिकायत में हर बार बदला।
और लावरिस कंकड़ की तरह,
मुझ पर बार-बार फेंका गया।

मैं फिर भी दोषी था।
मैंने तो संसार से,
अपनों से,
शान्ति के सिवा कुछ नही चाहा।
बदले में अपनों से भी,
मज़ाक और प्रश्न,
मुझे बार-बार दिया गया।

मैं फिर भी दोषी था।
लोगों का लक्ष्य,
मुझे दोषी क़रार देना है,
चलते-चलते।
मैं भी तो चल रहा हूँ,
बिना समझौता किए,
न किसी का प्रभाव लिए,
यही मेरा दोष है,
तो मैं फिर भी दोषी था,
मैं फिर भी दोषी था।

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