अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

नोक-झोंक

वैसे मुझे लड़ाइयाँ पसन्द नहीं, मगर जब बात माँ-पापा की आती है; तब मुझे बड़ा आनंद आता है। क्योंकि उनकी लड़ाई में लड़ाई कम और प्रेम ज़्यादा झलकता है।

तो लड़ाई के इस उत्सव में माँ गिराती है, अपने ग़ुस्से के "परमाणु बम" और पापा बनते हैं, "बलि का बकरा"। और मैं एक मूक दर्शक, जिसका किसी भी पक्ष में बोलना दण्डनीय अपराध समझा जाता है। तो ऐसी परिस्थिति में, मैं पतली गली पकड़ कर निकल लेना ज़्यादा उचित समझती हूँ।

पापा कोशिश तो बहुत करते हैं मनाने की, मगर चार उनका पसंदीदा अंक है। इसके बाद वो ख़ुद हाथ खड़े कर देते हैं।

क्योंकि शादी के 38 साल में उन्हें इतना अनुभव तो हो ही गया है, कि "औरतें मनाने से नहीं मानतीं बल्कि उल्टा उनसे नाराज़ हो जाओ, ख़ुद मान जाती हैं"।

तो इस उत्सव के बाद घर में छा जाती है, दो दिन की पूर्ण रूपेण शांति, जिसको बोलते हैं "शांति उत्सव"। इसमें दोनों खिलाड़ी एक दूसरे से नाराज़ हैं और सम्पर्क का एक मात्र साधन होती हूँ मैं।

जिसे इधर का संदेश उधर और उधर का संदेश इधर करना होता है।

मगर इस नोक-झोंक में माँ कभी पापा की ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ नहीं करती। हाँ पापा को नज़रअंदाज़ करने का नाटक बख़ूबी अच्छा कर लेती है।

और दूसरी तरफ़ पापा माताश्री के ग़ुस्से का असर कहीं उनके स्वास्थ्य पर न पड़ जाए, इसी चिंता में माताश्री की परिक्रमा उपग्रह की भाँति करते रहते हैं।

अनन्त दो दिन के शांति उत्सव के बाद दोनों पक्ष अपने हाथ खड़े कर देते हैं।और बिना ना-नुकुर किए एक हल्की सी मुस्कान के साथ मेरी मौजूदगी में समझौता हो जाता है।

"प्रेम में हुई नोक-झोंक, एक स्त्री के द्वारा किए गए व्रत के समान पवित्र है। जिस प्रकार व्रतों के माध्यम से एक स्त्री अपने जीवन-साथी का साथ दीर्घकाल के लिए ईश्वर से माँग लेती है, उसी प्रकार प्रेम में हुई नोक-झोंक प्रेम की आयु-सीमा और गहराई दोनों बढ़ा देने का कार्य करती है"।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अँधेरा
|

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची…

अंजुम जी
|

अवसाद कब किसे, क्यों, किस वज़ह से अपना शिकार…

अंडा
|

मिश्रा जी अभी तक'ब्राह्मणत्व' का…

अंधविश्वास
|

प्रत्येक दिन किसी न किसी व्यक्ति की मौत…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

लघुकथा

कहानी

स्मृति लेख

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं