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साहित्यिक-क्रान्ति की आवश्यकता महसूस करते थे कुँवर बेचैन

प्रदीप श्रीवास्तव– 

नोबेल पुरस्कार ग्रहण करते समय उपन्यासकार मारियो वार्गास लोसा ने कहा, ‘साहित्य समाज को समृद्ध, सुसंस्कृत बनाता है, चेतना का निर्माण करता है, आशाओं, आकांक्षाओं को प्रेरित करता है'। इस संदर्भ में आप भारत में क्या स्थिति पाते हैं। साहित्य की दशा–दिशा क्या है?

कुँवर बेचैन– 

जी हाँ, मैं ख़ुद भी साहित्य को शब्दों की लोक-सभा में जागरूक चिंतन और संवेदनशील हृदय द्वारा दिया गया वह बयान मानता हूँ जो लोकहित में दिया गया हो। जिस बयान में लोक का यथार्थ चित्रण और उसकी विसंगतियों तथा विद्रूपताओं के दर्शन तो हों किंतु उसमें आदर्श का भी स्पर्श हो। उसमें समाज की चिंता के साथ-साथ कोई न कोई दिशा निर्देश भी हो। साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है तो वह इस अर्थ में कहा गया है कि उसमें समाज अपने चेहरे को देखकर उसमें अपने दाग़-धब्बों को भी देख सके किंतु इसके बाद दर्पण का दूसरा काम शुरू हो जाता है और वह यह कि वह उसके चेहरे को सँवारे भी। साहित्य का काम समाज का केवल यथावत चित्रण करना ही नहीं है वरन्‌ उसे सँवारना भी है। इस संबंध में मुझे मुंशी प्रेमचंद के आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की याद आती है और नोबल पुरस्कार-प्राप्त मारियो वार्गास का वह कथन भी सार्थक लगता है जो आपने अपने प्रश्न में समाहित किया है।

इस संदर्भ में जहाँ तक भारत की स्थिति का प्रश्न है तो वह हम सबके सामने स्पष्ट है। वैसे इतिहास इस बात का साक्षी है कि हमारे साहित्य ने समाज को सदैव नई दिशा दी है किंतु आजकल ऐसा लगता है कि हमारे साहित्य की धार अब कुछ भोथरी हो गई है। सामने जो समाज की स्थितियाँ हैं वे पत्थर की तरह कठोर हैं। उन पर आज का साहित्य प्रहार तो कर रहा है किंतु वर्तमान व्यवस्था का पथरीलापन उसकी धार को कुंठित कर देता है।

प्रदीप श्रीवास्तव– 

क्या हमारा साहित्य समाज को समृद्ध, सुसंस्कृत, चेतनामय बनाने, आशाओं, आकांक्षाओं को प्रेरित करने में सफल हो रहा है? यदि नहीं तो इसके लिए आप किन प्रयासों का होना ज़रूरी मानते हैं?

कुँवर बेचैन–

आज का हमारा पूरा समाज एक नए आर्थिक युग से गुज़र रहा है जिसमें पैसे का महत्व बहुत बढ़ गया है। इधर चीज़ों के मूल्यों में बड़ा परिवर्तन होता रहा और उधर जीवन-मूल्यों में। वरन्‌ शायद यह कहना अधिक उचित होगा कि जैसे-जैसे वस्तुओं के मूल्य बढ़ते गए या ऊँचे मूल्य की वस्तुएँ सामने आने लगीं वैसे-वैसे समाज में जीवन-मूल्य गिरते चले गए। जीवन-मूल्यों का आधार नैतिक मूल्य थे, वे भी बदले। संवेदना और भावुकता का स्थान तर्क ने लिया किंतु तर्क से भी ऊँचा स्थान चालाकी और होशियारी ने ले लिया। अपनी परिस्थितियों के दवाब में नया समाज पहले के मुक़ाबले कम संवेदनशील होता चला गया। यह बात राजनीतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक तथा साहित्यिक आदि सभी क्षेत्रों में हुई। साहित्य का प्रमुख आधार ही संवेदना है और साहित्य में जो संवेदना का तत्व है उसी के कारण पाठक या श्रोता प्रभावित होता है, उसी के कारण पाठक और श्रोता के हृदय में कोई रचना उतरती चली जाती है, किंतु यह प्रभाव भी उन्हीं पर अधिक पड़ता है जो लोग संवेदनशील होते हैं। समाज में जैसे-जैसे संवेदनशीलता का ह्रास होने लगता है वैसे ही वैसे साहित्य का प्रभाव भी कम होने लगता है। कारण चाहे कोई भी रहे हों किंतु यह सच है कि आजकल समाज में सबसे बड़ा संकट संवेदनशीलता का है।

जहाँ तक इस संबंध में किए गए साहित्यिक प्रयासों का प्रश्न है तो इसके जवाब में यह कहना चाहूँगा कि आज के साहित्यकार को ऐसे साहित्य-लेखन की आवश्यकता है जो एक ओर समाज के भावुक-वर्ग का मनोरंजन भी करता हो और दूसरी ओर मानव को संवेदनशील बना कर उसे सच्चा मानव बनाने में भी सहयोग कर रहा हो। यहाँ मैं यह कहना सबसे ज़्यादा ज़रूरी समझता हूँ कि आज के साहित्यकार को श्रेष्ठ और उद्देश्यपूर्ण बाल साहित्य लिखने की आवश्यकता है। आज के बच्चे पहले के बच्चों से कहीं ज़्यादा जागरूक और वयस्क हैं। इसलिए उनकी रुचियों को दृष्टि में रखते हुए प्रेरक बाल साहित्य को लिखने की ज़रूरत है। यही नहीं ऐसे साहित्य को जनता तक पहुँचाने के लिए विभिन्न माध्यमों का प्रयोग भी ज़रूरी है। जहाँ लेखकों का दायित्व बढ़ा है वहीं प्रकाशकों को ऐसे साहित्य को पाठक तक कम मूल्य में पहुँचाने का संकल्प लेना होगा। प्रिंट मीडिया को अपने अख़बारों में साहित्य को ज़्यादा से ज़्यादा पृष्ठ देने होंगे। ऐसी घटनाओं को सबसे महत्वपूर्ण स्थान और कॉलम में छापना होगा जो व्यक्ति में संवेदनशीलता को जगाने वाली हों तथा जो जीवन मूल्यों की सुरक्षा को रेखांकित करने वाली हों। यही नहीं उन घटनाओं को पीछे धकेलना होगा जो जीवन-मूल्यों का विघटन करने वाली हों। इस उद्देश्य को इन दिनों साहित्यिक-क्रांति का नाम देना ज़रूरी हो गया है।

प्रदीप श्रीवास्तव– 

भारत सवा अरब लोगों का विशाल देश है लेकिन साहित्यकारों की पेशानी पर पाठकों, श्रोताओं की कमी की समस्या को लेकर चिंता की रेखाएँ साफ़ दिखती हैं। आप इसकी क्या वज़ह मानते हैं?

कुँवर बेचैन– 

साहित्य के पाठकों और श्रोताओं की कमी के अनेक कारणों में से कुछ जो प्रमुख कारण हैं उनमें भी सबसे बड़ा कारण यह है कि आज जो साहित्य का पाठक है वह रोज़ी-रोटी के चक्कर में इतना अधिक फँसा है कि उसे चाह कर भी उस साहित्य को पढ़ने या सुनने का समय नहीं मिलता। साहित्य के पाठकों की संख्या को यदि टटोला जाए तो पता चलेगा कि साहित्य को पढ़ने वालों में मध्यम वर्ग की भागीदारी सबसे अधिक है। किंतु यही वर्ग सुबह से शाम तक रोटी को जुटाने में लगा हुआ है। उसके ज़िम्मे इतने काम हैं कि वह कुछ और सोचने लायक़ ही नहीं बचता। दूर–दराज़ से अपनी नौकरी के स्थानों तक पहुँचने में ही काफ़ी समय लग जाता है। घर आते ही वे घर के कामों में लग जाते हैं या फिर मनोरंजन के लिए टेलीविजन खोल लेते हैं। पहले जब टेलीविजन आदि जैसे मनोरंजन के साधन घरों में नहीं थे तो यह वर्ग पत्र-पत्रिकाओं तथा किताबों को पढ़ने में अपना समय लगाता था। आज टेलीविजन के आकर्षक चैनलों, मोबाइल एवं कंप्यूटर ने साहित्य के पाठकों के इस ख़ाली समय को भी अपनी तरफ़ मोड़ लिया है। निम्न वर्ग के लोग अख़बार पढ़ कर ही अपने पाठक होने का सबूत देकर अपने पाठन की इतिश्री कर लेते हैं। समाज का उच्च वर्ग अपने व्यापार-कार्य में इतना उलझा रहता है कि उसे भी यह मौक़ा नहीं मिलता कि वह साहित्य के पठन के लिए थोड़ा समय निकाल सके। पहले घरों में पढ़ने-लिखने वाली महिलाएँ साहित्यिक कृतियों को पढ़ने में अपना ख़ाली समय गुज़ारती थीं। किंतु अब अधिकतर पढ़ी-लिखी महिलाएँ काम-काजी महिलाएँ हैं। वे ऑफ़िस जाती हैं, घर के भी काम करती हैं। साफ़ है कि उनके पास भी समयाभाव है। जहाँ तक विद्यार्थियों का प्रश्न है वे भी अपने प्रोफ़ेशनल कोर्स की पढ़ाई में फँसे हैं। बड़े-बड़े कोर्स हैं उनके पढ़ने के लिए। लिहाज़ा उनके पास भी साहित्य को पढ़ने का समय नहीं है। छोटे बच्चों के पास भी इतना होम-वर्क होता है कि उन्हें उसे पूरा करने से ही फ़ुर्सत नहीं। और यदि कुछ समय उनके पास है भी तो वह वीडियो-गेम तथा टेलीविज़न के देखने में निकल जाता है।
मैंने अनेक बुज़ुर्ग लोगों को यह कहते सुना है कि वे किस प्रकार से अपने प्रिय लेखक की पुस्तक को हासिल करने के लिए मीलों चलते थे और उसे प्राप्त करते थे। अब पढ़ने की ऐसी ललक कहाँ है?

प्रदीप श्रीवस्तव– 

साहित्य और पाठक दोनों को एक सिक्के का दो पहलू बनाने या फिर दोनों के बीच की दूरी समाप्त करने के लिए क्या होना चाहिए?

कुँवर बेचैन– 

यह सच है कि साहित्य और पाठक का अन्योन्याश्रित संबंध है। या यूँ कहें कि दोनों का चोली–दामन का साथ है। किंतु इन दिनों इनमें जो दूरी बढ़ रही है, उसको घटाना बहुत ज़रूरी हो गया है। श्रेष्ठ साहित्य और समाज के बीच की दूरी जितनी ही घटेगी उतना ही अपना देश भीतरी तरह से, अर्थात् संवेदना के स्तर पर समृद्ध होगा। इस दूरी को कम करने के लिए सबसे पहले तो साहित्यकारों को ऐसे साहित्य की सर्जना करनी होगी जो भाषा की दृष्टि से सरल हो, समाज के मनोविज्ञान को पहचान कर उसकी समस्याओं को रेखांकित करने वाला हो, समाज को ऐसा लगे कि रचनाकार उसकी चिंता कर रहा है और उसकी समस्याओं का समाधान ढूँढ़ रहा है। साथ ही रचनाकार को अपनी रचनाओं में रोचकता के तत्व का भी समावेश करना होगा। दूसरी ओर समाज, देश और सरकार को भी कुछ ऐसे प्रयास करने होंगे जिनके कारण समाज में साहित्यकार की प्रतिष्ठा बढ़े तथा साहित्य से उसका लगाव भी बढ़े। आज के रचनाकार को युवा-वर्ग की समस्याओं को भी अपने साहित्य का विषय बनाना होगा और उनका विश्लेषण करते हुए तर्क और संवेदना दोनों का सहारा लेकर अपने लेखन को सँवारना होगा। युवा-वर्ग एक अलग प्रकार के निराशा के दौर से गुज़र रहा है, वह डिप्रेशन में है। रचनाकार को अपनी रचनाओं के माध्यम से उसे आशावादी बनाना होगा, उसे हौसला देना होगा, उसे सकारात्मक सोच वाला बनाना होगा।

प्रदीप श्रीवस्तव– 

मतलब यह है कि यदि साहित्य अधिसंख्य समाज का हो जाए या उन्हें अपने साथ जोड़ ले तो तमाम बुराइयों, अव्यवस्थाओं से मुक्ति मिल सकती है। आख़िर साहित्य समाज को समृद्ध, सुसंस्कृत चेतनापूर्ण आदि-आदि बनाता है। इस सदर्भ में बतौर साहित्यकार आप देश या समाज से क्या अपेक्षा रखते हैं?

कुँवर बेचैन–

जी हाँ, मेरा विश्वास है कि यदि साहित्य अधिसंख्य समाज का हो जाए तो समाज का रूप ही दूसरा होगा। साहित्य क्योंकि अपने साथ सहिष्णुता का भाव जोड़े रहता है इसलिए समाज के अधिकांश लोग एक दूसरे के दर्द को समझने लायक़ बनेंगे, अधिक अनुशासित रहेंगे और सच्चे नागरिक बनेंगे। हाँ, इस संबंध में साहित्यकार के अपने दायित्व तो रहेंगे ही साथ ही सरकार, देश और समाज को भी अपनी ओर से प्रयास करने होंगे। इन्हें भी सोचना होगा कि साहित्य और समाज के बीच की दूरी को कैसे कम किया जाए। रूस के लोगों ने इस संबंध में ख़ूब सोचा था। उनके यहाँ शहीदों और साहित्यकारों को सबसे ऊँचा स्थान दिया गया। हम सभी जानते हैं कि उन्होंने अपने देश के प्रिय कवि कीव के नाम पर कीव नाम के शहर को ही बसा दिया है। मुझे 1987 में वहाँ जाने का अवसर मिला तो मैंने देखा कि वहाँ के बाज़ारों में जो दूकानें थीं उनमें से अधिकांश दूकानें या तो किसी साहित्यकार के नाम से थीं या शहीदों के नाम से। साहित्यिक जागृति ऐसे पैदा की जाती है। क्या हमारे देश में ऐसा नहीं हो सकता?

अपने देश में हरित क्रान्ति तथा अन्य क्रांतियों की तरह चाहे कुछ दिनों के लिए ही सही साहित्य क्रांति को लाना ही होगा। हमारे देश में साधनों की कमी नहीं है, कमी है तो संकल्प-शक्ति और अपने अंदर चाह जगाने की। प्रयास तो किए ही जाने चाहिए परिणाम चाहे कुछ भी निकले। इस संदर्भ में मुझे अपनी ही चार पंक्तियाँ याद आ गई हैं और वह यह हैं– ‘किसी भी काम को करने की चाहें पहले आती हैं/अगर बच्चे को गोदी लो तो बाँहें पहले आती हैं/हर इक कोशिश का दर्जा कामयाबी से भी ऊँचा है / कि मंज़िल बाद में आती है, राहें पहले आती हैं।’

प्रदीप श्रीवास्तव– 

संघर्षों की एक बड़ी गाथा रहा है आपका जीवन, कुछ उसके एवं अपनी साहित्यिक यात्रा के बारे में बताइए।

कुँवर बेचैन–

मेरी साहित्य चेतना में मेरे अपने व्यक्तिगत जीवन का बड़ा योगदान रहा है और उसी के माध्यम से आप को भी मेरे साहित्य के मर्म को पहचानने में अधिक सुविधा रहेगी। मैं उत्तर प्रदेश के ज़िला मुरादाबाद के एक छोटे से क़स्बे कांठ के पास छोटे से उमरी नामक गाँव में 1 जुलाई, 1942 को पैदा हुआ। मेरे पिताश्री नारायण दास सक्सेना का निधन तब ही हो गया जब मैं मात्र 2 महीने का था। पिता जी की मृत्यु के तुरंत बाद माँ मुझे और मेरी दो बड़ी बहनों को लेकर अपनी माँ यानी मेरी नानी के घर जो गजरौले के पास के गाँव शाहपुर में था आ गई। लगभग डेढ़ वर्ष तक मैं अपनी माँ और दोनों बहनों के साथ नानी के यहाँ ही रहा। फिर दो साल की उम्र तक अपने छोटे मौसा जी के यहाँ मुरादाबाद में रहा। मुरादाबाद में जब मेरी बड़ी बहन की विदाई हो रही थी तब ही कोई आदमी मुझे अपहृत करने के उद्देश्य से उठाकर भागा। बारातियों ने उसे घेर लिया और उसे पुलिस में दे दिया। ये सब ख़ानदानी रंजिश के कारण हो रहा था। मेरे पिताश्री की भी मृत्यु प्राकृतिक मृत्यु नहीं थी। मेरी माँ ने मुझे सुरक्षित रखने की दृष्टि से मुरादाबाद से बाहर जाने की सोची।

दुर्भाग्य से मेरी माताश्री का भी उस समय देहांत हो गया जब मैं कक्षा तीन का छात्र था और मेरी उम्र 8 वर्ष की थी। इसके बाद भी दुर्भाग्य ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। मेरी बहन भी उस समय दिवंगत हो गई जब मैंने पाँचवाँ दर्जा पास किया था और मैं मात्र 10 वर्ष का था। बस तब ही से घर की चाबी-कुंजी मेरे हाथ में आ गई। मैं और बहनोई साहब मिलकर उल्टा-सीधा खाना बना लेते थे। जहाँ तक मेरी साहित्यिक यात्रा की बात है, तो वह यह है कि जब मैं सातवीं कक्षा में पढ़ता था तो हँसी-हँसी में ही मैंने तुकबंदी करनी शुरू कर दी थी। सन् 1965 में जब मैं गाज़ियाबाद प्रवक्ता के पद पर नियुक्त हुआ तो दिल्ली और दिल्ली के कवियों के संपर्क में आया। इन्हीं दिनों मुझे दिल्ली आकाशवाणी और बाद में दूरदर्शन पर भी बुलाया जाने लगा और इस माध्यम से भी मैं धीरे-धीरे कवि रूप में प्रतिष्ठित होने लगा। इन दिनों मेरा एक गीत बहुत चर्चित हुआ जो मैंने सन् 1961 में लिखा था जिसके बोल थे – ‘जितनी दूर नयन से सपना/जितनी दूर अधर से हँसना/बिछुए जितनी दूर कुँवारे पाँव से/उतनी दूर पिया तुम मेरे गाँव से।’

इसी गीत के कारण मैं पूरे हिंदुस्तान में होने वाले कवि सम्मेलनों में बुलाया जाने लगा और सराहा भी जाने लगा। तब से लेकर आज तक लगभग पिछले 52 वर्षों से मैं कवि सम्मेलनों के मंच पर हूँ। मुझे यह कहते हुए भी प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है कि न केवल भारत वर्ष के शहरों और गाँवों में वरन्‌ विदेशों में भी मुझे कविता पाठ करने का मौक़ा मिला। सबसे पहले 1984 में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति महामहिम ज्ञानी जैल सिंह जी के प्रतिनिधित्व में मॉरीशस जाने का मौक़ा मिला और वहाँ के कई गाँवों और शहरों में कविता पाठ का अवसर मिला। मॉरीशस के राष्ट्रपति महामहिम शिव सागर रामगुलाम के निवास पर भी कविता पाठ का गौरव मिला। 1990 में दो बार मॉरीशस जाना हुआ तब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अनिरुद्ध जगन्नाथ जी के निवास पर भी कविता पाठ का अवसर मिला। इसके बाद तो अन्य 17 देशों में भी जाने का मौक़ा मिला जिनमें रूस, सिंगापुर, इंडोनेशिया, मस्कट, कनाडा, सूरीनाम, हॉलैंड, फ्रांस, जर्मनी, बेल्जियम, लक्समबर्ग, स्विट्जरलैंड, पाकिस्तान, जापान भी शामिल हैं। इन देशों के साथ ही चार बार अमरीका के लगभग 18 शहरों में, चार बार यूके के लगभग 14 शहरों में तथा चार बार दुबई जाने का मौक़ा मिला। अब तक मेरी 34 पुस्तकें प्रकाशित हो गईं, जिनमें गीत-नवगीत संग्रह, ग़ज़ल संग्रह, अतुकांत कविताओं के संग्रह, दोहा संग्रह, हाइकु संग्रह, पांचाली नामक महाकाव्य, उपन्यास आदि हैं। मैंने लगभग 150 पुस्तकों की भूमिका भी लिखी है। इसके अतिरिक्त अनेक लघुकथाएँ भी प्रकाशित हुई हैं।

पुस्तकों के प्रकाशित होने का लाभ यह मिला कि मेरे साहित्य पर विभिन्न विश्वविद्यालयों में शोध कार्य हुए। जिनकी संख्या अब 22 है। मेरठ, रुहेलखंड तथा बड़ौदा विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में कविताएँ संकलित हैं। महाराष्ट्र तथा गुजरात बोर्ड के और गल्फ़ कंट्रीज़ के पाठ्यक्रमों में भी मेरी कविताएँ संकलित हैं।

मेरा यह भी सौभाग्य रहा कि मेरे गीत फ़िल्मों में भी लिए गए। ‘कोख’ नाम की फिल्म में ‘बिछुए जितनी दूर कुँवारे पांव से’ गीत लिखा गया जिसे प्रसिद्ध संगीतकार रवींद्र जैन जी के संगीत-निर्देशन में हेमलता जी ने गाया था। इसी प्रकार यू.के. के प्रसिद्ध नेत्र विशेषज्ञ और फ़िल्म प्रोड्यूसर एवं निर्देशक श्री निखिल कौशिक की फ़िल्म ‘भविष्य द फ़्यूचर’ में भी दो गीत लिए गए। यही नहीं मेरे गीतों को दूरदर्शन पर भी फ़िल्माया गया। दूरदर्शन के एक सीरियल ‘क्या फ़र्क पड़ता है’ के लिए भी थीम सॉन्ग तथा और गीत भी लिखे। इसी प्रकार टीवी की कुछ आर्ट फ़िल्मों में भी गीत लिखे।

मेरे द्वारा किए गए कविता पाठ के कई कैसेट और सीडी भी बनी हैं। ऐसी भी कई सीडी बनीं जिनमें मेरी ग़ज़लों को दूसरे गायकों ने गाया। एक ऐसी सीडी भी है, जिसमें मैंने अपनी ग़ज़लों को गायक के रूप में संगीत के साथ गाया है। संगीत दिया है ज्ञानदीप ने और फ़िल्मांकन श्री हेमंत कुमार ने किया है। अभिनय कुमाऊँ के अनेक फ़िल्म–कलाकारों का है।

प्रदीप श्रीवास्तव– 

कॉर्पोरेट घराने अपनी सोशल रिसपॉन्सिबिलिटी के तहत समाज के लिए काफ़ी कुछ करते रहते हैं। खेलों के संवर्धन से लेकर कला, साहित्य, संस्कृति के संवर्धन के लिए भी। उनके इन प्रयासों के बारे में क्या कहना चाहेंगे।

कुँवर बेचैन– 

साहित्यकारों और उनके साहित्य को प्रोत्साहित तथा प्रचारित करने में पुराने समय में राजाओं और राजघरानों का जैसा योगदान रहा है और जैसा उनमें पारस्परिक संबंध रहा उसी प्रकार का गहरा संबंध आज के समय में कॉर्पोरेट घरानों और साहित्य का रहा है। सभी जानते हैं कि वीरगाथा काल के कवि और ‘पृथ्वीराज रासो’ जैसे महाकाव्य के रचयिता चंद्रवरदाई पृथ्वीराज के राजदरबार के कवि थे। ऐसे ही आगे चलकर महाकवि बिहारीलाल राजा जयसिंह के और कवि रहीमदास अकबर के तथा कविवर भूषण एवं केशव राजा छत्रसाल के राजदरबार में रहे। इन सभी को कवि की पहचान देने में तथा उनको प्रोत्साहित करने में राजाओं का भरपूर योगदान रहा। पुराने समय से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक के अनेक शायर भी अनेक राजघरानों से संबंधित रहे। मिर्ज़ा गालिब को भी कई राजघरानों से वज़ीफ़ा मिला था। कहने का आशय यही है कि साहित्य और राजघरानों का घनिष्ठ संबंध रहा है।

वर्तमान समय में राजा-महाराजा तो हैं नही, आज ‘कार्पोरेट घरानों’ से साहित्य को भी संरक्षण मिल रहा है। अनेक कम प्रख्यात और सर्व प्रसिद्ध कॉर्पोरेट घराने किसी न किसी प्रकार से परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप में साहित्य का संरक्षण कर रहे हैं। इसे और बढ़ावा मिलना चाहिए ।

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