बिल्लो की भीष्म प्रतिज्ञा – 6
कथा साहित्य | कहानी प्रदीप श्रीवास्तव15 Jun 2021 (अंक: 183, द्वितीय, 2021 में प्रकाशित)
इतना कह कर बिल्लो ने लंबा कश लेकर बहुत सा धुँआ उगल दिया और काफ़ी कुछ को अंदर ही जज़्ब कर लिया। इसके उलट वो बातें एक भी जज़्ब नहीं कर रही थी। उसके इस रहस्योद्घाटन ने मुझे फिर अचंभित किया। कि आख़िर ये औरत है क्या? ये कहाँ से कहाँ पहुँच गई है? क्या-क्या कर चुकी है? मैं बड़े आश्चर्य से उसे देख रहा था। मुझे इस बात का सबसे ज़्यादा आश्चर्य था कि महिला के नाते इसने इतनी परेशानियों का सामना किया है लेकिन फिर भी एक महिला होकर अपने टारगेट को पाने के लिए महिला ही को साधन बना रही है। उसी का सेक्सुअल हैरेसमेंट करवा रही है।
मेरा मुँह आधा खुला हुआ था। मुझे इस तरह देख कर वह खिलखिलाई, "का हो ऐइसे का देख रहे हो?"
मैं आश्चर्य भाव से वापस लौटा। पूछा, "बिल्लो वाक़ई दुनिया ही नहीं, तुम भी, हम भी, सब कहाँ से कहाँ पहुँच गए हैं। ये नेता, होटल, औरतों का इंतज़ाम, रिकॉर्डिंग वह भी वाराणसी में। यह सब तुमने कहाँ से सीखा? कैसे कर ले रही हो यह सब?"
"तुमहूँ का बात करत हो। ई सब आज कल कऊन बड़ा काम है," फिर बिल्लो ने भतीजे के योगदान का ज़िक्र किया।
कहा, "औरत-फौरत का इंतजाम वही के सहारे है। मैं बताती रहती हूँ, वह वैसा ही करता रहता है। उसे मैं अपने अनुभवों से इतना तैयार कर देना चाहती हूँ कि वो भी एक दिन सांसद का चुनाव लड़ने लायक हो सके। पहले उसको विधायक बनाऊँगी। काहे से हमने देखा कि ई पढ़ने-लिखने में कुछ खास है नहीं। बी.ए., एम. ए. करने इंजीनियरिंग, डॉक्टरी का कोई फायदा नहीं। बेरोजगारी के इस युग में नौकरी कहीं है ही नहीं। नौकरी वही पा रहे हैं जो पढ़े लिखे माँ विरले हैं। बाक़ी तुम देख ही रहे हो कि पीएच.डी. किए लोग सफ़ाई कर्मी के लिए परीक्षा दे रहे हैं।
"महाराष्ट्र में एक पीएच.डी. किए सफाई कर्मी को ट्रांसफर के मुद्दे पर बर्खास्त कर दिया। अखबार में फोटो सहित पढ़ा था। तो हमने कहा काम धंधा करो, चुनाव लड़ो अब यही बचा है। मैं जहाँ सांसदी का अगला चुनाव लड़ूँगी वहीं भतीजा विधायकी का चुनाव लड़ेगा। मगर ई जो एक साल बाद होए वाला है इसको छोड़ कर। इसके बाद वाला यानी छः साल बाद। हम साफ़ कह दिए हैं तब तक जै लड़का-बच्चा पैदा करे का हो कर लो। राजनीति में आए के बाद लड़का-बच्चा के चक्कर में कमज़ोर ना पड़ जाओ।"
मैंने कहा, "वाह बिल्लो, बड़ा लंबा, दूरगामी प्रोग्राम बनाया है। मगर इस रास्ते पर आजकल तो बड़े ख़तरे हैं। कैसे निपटोगी?"
"जैसे बाक़ी चीजों से निपटती आ रही हूँ, वैसे ही यहू से निपट लेब। मैं हर तरह से तैयारी कर रही हूँ। और करवा भी रही हूँ।" टारगेट को लेकर औरतों को यूज़ करने, भतीजे से सारा इंतज़ाम कराने की बात मुझे बहुत पिंच कर रही थी कि यह गँवई दुनिया की होकर भतीजे से इस बारे में कैसे बात करती है।
उसकी बीवी एतराज़ नहीं करती क्या? मैंने पूछा तो हँस कर बोली, "शहर के होके तुम भी कैसी बात कर रहे हो? रिश्तों का चाबुक हमने बहुत सहा है। भतीजा उसकी बीवी और हम एक दोस्त की तरह बतियातें हैं। सब मिलके तय करते हैं। सब खुल कर बतियातें हैं तो कोई बात छिपाते-लुकाते नहीं। वो तुम लोग का कहते हो कि पूरी पारदर्शिता बनाए रखते हैं।" कह कर हँस दी। मैं भी हँसता हुआ उसे देखता रहा।
मैंने सोचा यह जितना बता रही है। जितना मैं देख रहा हूँ, उस हिसाब से इस एरिया में गिने-चुने ही इसके सामने टिक पाते हैं। खेत बेचने की ज़िम्मेदारी रिश्तेदार के बजाय इसी को दे दूँ। मैंने बात बढ़ाई। उसके ऐलोवेरा की खेती का भी प्रसंग उठाया तो वह कुछ देर बाद बोली, "देखो मैं तो यही कहूँगी कि खेत बेचो ही नहीं। इससे जन्मभूमि से रिश्ता बना रहेगा। आते-जाते रहोगे। अरे घूमने-फिरने जाते ही रहते हो। परिवार को लेकर एक बार यहाँ भी आ जाया करो। रही बात पैसों की तो यही कहूँगी कि बेच कर एक बार पैसा पाओगे ख़त्म कर दोगे। ऐसे हर साल बढ़िया पैसा मिलेगा। खेत की कीमत दिन पर दिन बढ़ेगी ही। दोहरा फायदा है। हाँ अगर बेचना तय कर लिया है तो ठीक है मैं करा दूँगी।"
बिल्लो की बात में मुझे दम नज़र आया। दूसरी बात कि बिल्लो मुझे बराबर इतना मोहे जा रही थी कि मेरे मन के किसी कोने में यह बात उठ रही थी कि अगर कोई जरिया यहाँ आने का बन जाए तो अच्छा ही है। शिखर भी कह रहा था कि यहाँ से चला जाएगा। फिर तो कोई बहाना ही नहीं बचेगा। अगर मैं खेत ना बेचूँ, ऐलोवेरा ही को ट्राई करूँ। शिखर को भी तैयार करूँ। पैसे मिलने लगेंगे तो वह भी रुकेगा ज़रूर। उसके रुकने से आसानी रहेगी। वह कह ही रहा था कि घर का कोई आता-जाता रहता तो भी वह यहीं रहने की सोचता।
इन दो बातों को सोच कर मैंने निर्णय लेने में देरी नहीं की। तुरंत कहा, "बिल्लो। तुम्हारे, प्यार, व्यवहार, तुम्हारे काम को जानने के बाद मेरे मन में तुम्हारी जो ख़ास तसवीर बनी है, वह मुझे रोक रही है। मोह रही है। मेरा मन भी कह रहा है कि अब कुछ ऐसी व्यवस्था करूँ कि यहाँ से रिश्ते का जो पेड़ सूख गया है उसे फिर हरा-भरा करूँ। और यह तभी होगा जब मैं तुम्हारी यह सलाह मान लूँ कि खेत ना बेचूँ, खेती करवाऊँ, आता-जाता रहूँ। इसलिए अब यह तय है कि खेत नहीं बेचूँगा। ऐलोवेरा में जैसा पैसा बता रही हो मैं चाहूँगा कि वही करवाऊँ। उसमें ज़्यादा झंझट नहीं है। माल के कंपनी तक जाने पेमेंट वग़ैरह की व्यवस्था तुम देख लोगी तो मुझे आसानी रहेगी, नहीं किसी और फ़सल के बारे में सोचना पड़ेगा।"
पहली बार बिल्लो मेरी बातों से कुछ हैरानी सी दिखाती हुई बोली, "तुम तो हमार करेजवा ही निकाल लिए हो। इससे बढ़ियाँ और क्या होगा? कम से कम एक जने तो यहाँ से संबंध बनाए रहोगे। तुम ऐसा करोगे तो शिखर भी यहाँ से छोड़कर जाएगा नहीं। नहीं तो पूरा कैथान ऐसे भी खाली हो चुका है। मगर एक बात कहूँ कि ज़िम्मेदारी शिखर को ही दो। गाँव का मामला है। बात फैल जाएगी कि हमने तुम्हें भड़का कर परिवार से अलग कर दिया। सारी प्रॉपर्टी पर कब्जा कर लिया। इसलिए ज़िम्मेदारी उसी को दो। बाकी मैं पूरी निगाह रखूँगी। कहीं गड़बड़ की तो तुरंत ठीक कर दूँगी।
"वैसे उसकी हिम्मत ही नहीं। फिर उसे भी तो इस काम के लिए मुझ पर ही निर्भर रहना है। समझे। मगर सच-सच बताओ तो एक बात पूछूँ।"
मैंने कहा, "कैसी बात करती हो बिल्लो। तुमसे झूठ क्यों बोलूँगा? पूछो जो पूछना है।"
"तो बताओ कि ई जो निर्णय लिए हो इसमें मेरे प्यार, व्यवहार और मेरे मोहने का कितना हाथ है। और कितना हाथ खेतों का है। उसमें खेती कराने का है।" कह कर बिल्लो हँसी फिर बोली, "देखो सच-सच बताना। एकदम उहै तरह जैइसे बचपन में सारी बातें बताते थे।"
मुझे भी हँसी आ गई। मैंने कहा, "बिल्लो तुम वाक़ई हर बात में इतनी मैच्योर इतनी समझदार हो गई हो इसके लिए मैं तुम्हारी जितनी तारीफ़ करूँ उतना कम है। तुम्हारे इस रूप की मैंने कल्पना भी नहीं की थी। और जिस तरह तुमने पूछा है। जितना प्यार स्नेह दे रही हो उसके बाद तो मैं चाह कर भी कुछ छिपा नहीं सकता। झूठ बोलने की तो बात ही नहीं। मेरा जवाब इतना ही है कि मेरे निर्णय में सबसे अहम रोल, पहला रोल, तुम्हारे प्यार स्नेह का ही है। बल्कि इसी ने मुझे यह निर्णय लेने के बारे में सोचने की तरफ़ मोड़ा। दूसरा खेत या खेती कराने, या फ़ायदे नुक़सान की बात है तो उसका रोल तुम इतना ही मानो जितना की दाल में नमक।
"मैं यही कहूँगा कि तुम्हारे प्यार ने मुझे अपनी जड़ से अपनी ज़मीन से सारे रिश्ते तोड़ने से रोक दिया। मुझे लगता है मेरे रुकने से शिखर भी रुकेगा। तुमने वाक़ई बहुत बड़ा काम किया है। मगर यह ज़रूर कहूँगा कि तुमने बचपन के इस रिश्ते को जो एक नई ऊर्जा, नई ताक़त, नया रंग, नया रूप, नई उमंग दी है इसे और आगे बढ़ाते रहना। ठहरने रुकने मत देना।"
"यही सब तो तुमको भी करना है। तुम भी पीछे मत हटना। ’सूरत’ घर लौटते ही भूल मत जाना। मुझे डर यही कि जाते ही बिजनेस, बीवी, बच्चों में ये सारी बातें भूल ना जाओ। मेरी बातों का यह मतलब कतई ना निकालना कि बीवी, बच्चों, बिजनेस को भूल जाओ। यहाँ-वहाँ सब को याद रखो। सब को गले लगाए रहो।"
"बिल्लो यह भी कहने की बात है क्या? जिस बात की कल्पना भी नहीं की थी। वह डिसीज़न मैंने लिया है तो मैं कैसे ख़ुद पीछे हट सकता हूँ। मुझे तो अब दोहरी ख़ुशी मिली है। और हर कोशिश यही करूँगा कि मिलती ही रहे।"
"भगवान चाहेगा तो यही होगा। और तुम्हें अभी से बता दे रही हूँ कि अपनी बिल्लो, अपने भतीजे के चुनाव में तुम्हें अब आना जरूर है। सिर्फ आना ही नहीं है। अपनी पूरी ताकत भी लगानी है। मैं तुम्हारे पूरे परिवार का नाम यहाँ की वोटर लिस्ट में डलवाऊँगी। सब का राशन कार्ड वगैरह सब बनवाऊँगी। तुम्हारे हिस्से का जो मकान यहाँ पड़ा है उसे भी ठीक करवा दूँगी। तुम पैसा आगे पीछे देते रहना। उसके लिए तुम्हें क्षण भर को भी अलग से समय निकालने की जरूरत नहीं।"
"तुम जो कहोगी वो करूँगा बिल्लो।"
"अच्छा।" बिल्लो ने बड़े भेद भरे अंदाज़ में कहा।
"हाँ इसमें तुम्हें शक नहीं करना चाहिए।"
"सोच लो।"
"अरे इसमें सोचने वाली क्या बात है?"
"हूँ... तो बचपन में जैइसे हमरे पास बैइठते थे, वैसे ही मेरे पास यहाँ इधर आकर बैठो।" बिल्लो ने ठीक अपनी बग़ल में हथेली रखते हुए कहा।
बिल्लो की यह बात मेरे लिए अप्रत्याशित थी। मैं एकदम सकपका गया। चुपचाप एकटक उसे देखता रहा। उसके चेहरे पर अपनी बात कहते-कहते गहन गंभीरता छा गई थी। मैं क़रीब सात फिट की दूरी पर बैठा था। लेकिन वहाँ से भी देख रहा था कि बिल्लो की आँखें भरी हुई थीं। मैं उसके चेहरे को बिल्कुल समझ नहीं पा रहा था कि आख़िर बिल्लो के मन में चल क्या रहा है? यह क्या चाहती है? मुझे चुप देख बिल्लो बोली।
"क्यों, डर गए। हमरे पास बैइठने में डर लग रहा है। बचपन से ही तुम डरपोक थे। तब भी जब बैठते थे मेरे पास तो चौंक-चौंक कर देखते रहते थे हर तरफ कि कोई देख तो नहीं रहा। एक तरफ चौंकते रहते थे दूसरी तरफ ज्यादा से ज्यादा सटने की कोशिश भी करते थे। तुम्हारी इस हरकत पर मैं मन ही मन हँसती थी। मगर इस समय तो हिंआ देखे वाला केओ नाहीं बा। फिर काहे एतना डरात हैअ। कुछ बोलअ। बचपन वाला गिफ्ट मुझे उसी समय को जीते हुए उसी समय की तरह से हाथों में थमाया था। कितना निश्छल था तुम्हारा वह गिफ्ट, तुम्हारा तरीका। का वैइसे ही बचपन की ही तरह बैइठ नाहीं सकते। कुछ वैसी ही बातें नाहीं कर सकते जो तब किया करते थे।"
बिल्लो अब भी मुझे एकटक देखे जा रही थी। उसकी चमकदार आँखों में आँसू और भी ज़्यादा तेज़ चमक रहे थे। मेरे दिमाग़ में अब भी एक शब्द नहीं सूझ रहा था कि मैं उससे क्या कहूँ ? उसके पास जाऊँ कि नहीं। यह उचित होगा कि नहीं। मेरी चुप्पी को वह ज़्यादा देर नहीं सह पाई और बोल ही दिया। मगर खड़ी बोली में कहा, "कोई बात नहीं। हमीं सब गड़बड़ कर बैठे। पहले ही की तरह कुछ बौरा गई तुम्हें देख के। हमें सोचना चाहिए कि अब बचपन बीत गया है। परिस्थितियाँ बदल गईं हैं। तुम शादी-शुदा हो। मैं भी। कहने को ही सही।
"दुनिया यह कहाँ जानती है कि उस निठल्ले ने चुड़िहारिन और कई और आवारा बदमाश औरतों, शराब के सामने मुझे छुआ ही नहीं। आया ही नहीं मेरे पास। पहली रात भी उसी चुड़िहारिन के पास पड़ा रहा। हाँ तुम बीवी-बच्चे वाले हो। बचपन के साथ बचपन का रिश्ता भी खत्म हो गया। और हम बुढ़ौती में बचपन का रिश्ता निभाहनें चले हैं। लगता है बेवजह तुम्हें परेशान किया। चलो अच्छा बताओ, चुनाव में भाषण देना बहुत बड़ा काम है। और हमें ठीक से आता नहीं। तुम हमें भाषण देना कैसे सिखाओगे?"
इतना कहने के साथ ही बिल्लो ने साड़ी के आँचल से दोनों आँखें पोंछ लीं। फिर अपनी स्थिति को एकदम बदलने की कोशिश में बनावटी हँसी हँसते हुई बोली, "हाँ भाषण देना सिखा पाओगे कि नहीं?"
बड़ी हिम्मत कर अब की मैं बोला– "जो आदमी एक छोटी सी बात का जवाब ना दे पा रहा हो वह भाषण देना क्या सिखाएगा बिल्लो।" इतना कहकर मैं उठा और उसके पास जाकर वैसे ही बैठ गया जैसे बचपन में बैठा करता था।
उसकी आँखों को मैंने देखा, वह फिर भरी थीं। मैंने उन्हें पोंछा। कहा, "बिल्लो मेरी नज़र में तुम आयरन लेडी हो। और आयरन लेडी की आँखों में आँसू कभी नहीं आते।" फिर हम बड़ी देर तक बातें करते रहे। उस दौरान मैंने साफ़-साफ़ देखा कि उस आयरन लेडी की भावनाएँ उसका हृदय बाक़ी महिलाओं ही की तरह कोमल, निर्मल, फूल सा नाज़ुक है। मगर उसने जितनी बातें कीं वह किसी विकट संघर्षशील, जुनूनी, निडर, जीवट वाले मर्द के लिए भी एक चुनौती हैं। इतने दिनों में उसने खाद, बीज, मिट्टी के तेल, सरकारी राशन, किराना, कपड़े की दुकान के साथ-साथ साइकिल, टायर ट्यूब की दुकान चलवा रखी है। कपड़े की सबसे बड़ी दुकान उसी की है।
अच्छे ख़ासे क़स्बे का रूप ले चुके उस एरिया में उसने व्यवसाय की जो दुनिया बनाई थी उसके सामने वहाँ कोई दूसरा नहीं था। उसकी लठैतों की पूरी फौज थी। और दिन भर वह उनके साथ व्यवसाय की दुनिया सँभालती थी। उसकी क्षमता उसका जुनून साफ़ कह रहे थे कि धर्म-जाति की राजनीति का वह शिकार नहीं हुई तो जल्दी ही सांसद भी होगी। उसका कड़कपन और करुणामय हृदय देखकर मेरे मन में आया कि तैंतीस नहीं आधे विधायक, सांसद, महिलाएँ होनी चाहिए। इस से ताक़त, सत्ता के मद में अत्याचारी बन गई नेता नगरी की छवि सुधरेगी। क्योंकि जब सत्ता की ताक़त के साथ मद नहीं करुणा भी होगी तब ये तथा-कथित जनसेवक वाक़ई जनसेवक बन सकेंगे। इनको तैंतीस प्रतिशत आरक्षण वास्तव में इनके और जनता वास्तव में दोनों के साथ धोखा है।
जब ये आधी दुनिया हैं तो इनके लिए प्रधानी से लेकर सांसदी तक में आधा यानी पचास प्रतिशत आरक्षण ही न्याययोचित है। बाक़ी सब धोखा या अन्याय है। इस बात के साथ ही मेरे मन में आया कि बिल्लो इसी को मुख्य मुद्दा बना ले तो बड़े फ़ायदे में रहेगी। जब उससे कहा तो उसने बात को हाथों-हाथ लिया। कहा, "ये बचपन का साथ कुछ बड़ा कारनामा जरूर करेगा। इस बात से तो हम निश्चिंत हो सकते हैं।"
रात का पहला पहर जहाँ मेरे लिए तनावपूर्ण था कि बिल्लो अकेली है वहीं दूसरा पहर आश्चर्यजनक रूप से अद्भुत अकल्पनीय था। हालाँकि इस पहर में भी हम और बिल्लो ही थे। मेरी अच्छी रात के गर्भ से मेरी सुबह भी बड़ी-प्यारी, बड़ी ख़ूबसूरत पैदा हुई थी। मैं जब सुबह बिल्लो के प्यार स्नेह से भरी आवभगत से निकल कर शिखर के पास जा रहा था, तभी बिल्लो के भतीजे को सपरिवार वापस आते देखा। जीप में परिवार के साथ-साथ बिदाई में मिला अच्छा-ख़ासा सामान भी दिख रहा था।
शिखर और चाचा मुझे मेरा इंतज़ार करते मिले। मैंने चाचा, शिखर के सामने ऐलोवेरा की खेती सहित अपना प्लान रखा तो चाचा तो ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हो गए। ख़ुशी इतनी कि जैसे उन्होंने जिस चीज़ की उम्मीद ही ना की हो वह ना सिर्फ़ मिल गई बल्कि बेइंतहा मिल गई हो। मगर शिखर इस शर्त के साथ तैयार हुआ कि जब तक यह सब मैं करूँगा तभी तक वह करेगा। और कम से कम चौथे महीने मैं अवश्य आऊँगा।
मैंने आँख मूँद कर उसकी शर्त मान ली। सोचा कि जब नक़दी हथेली गर्म करने लगेगी तो यह शर्त अपने आप भूल जाएगा। बीच में एकाध बार इसको सूरत बुला कर शहरों में इनके जैसे पढ़े-लिखों की नौकरी, बिज़नेस में क्या हालत है, ये ख़ुद कहाँ ठहर पाएँगे इसका अहसास करा दूँगा। तब यह शहर के नाम से भागेगा। इसके बाद मैं पूरा दो दिन गाँव में रुका। इसमें पूरा एक दिन बिल्लो के साथ अपने गाँव के साथ-साथ कई और गाँव घूमा। ये सारे गाँव उसी संसदीय क्षेत्र में आते हैं जहाँ से बिल्लो ने चुनाव लड़ना तय किया था। इन गाँवों में भी मैंने बिल्लो की अच्छी पकड़ देखी। वह सबकी प्यारी बिल्लो बुआ हैं। बच्चों, बड़ों, बूढ़ों, महिलाओं सबकी।
वह सबसे ऐसे मिलती मानों सब उसके ही परिवार के सदस्य हों। सब लगे हाथ अपने काम-धाम के बारे में भी उससे बातें कर रहे थे। मैंने उससे रास्ते में कहा भी, "बिल्लो तुम तो लड़ने से पहले ही सांसद बन गई हो।" वह हँस कर रह गई। बिल्लो तमाम जगह मेरा परिचय भी कराती रही। बाबा का नाम लेकर कि यह उनके पोता हैं। अगला पूरा दिन मैं शिखर के साथ घूमा। जितना समय मैं सारे गाँव घूमा-फिरा उस दौरान मैं उन बहुत सी चीज़ों को नहीं देख पाया, जिन्हें मैं देखना चाहता था।
कोई बुज़ुर्ग मुझे खरहरा (अरहर की दाल के सूखे पेड़ों से बनी बड़ी झाड़ू) लेकर अपना दुआर बुहारता नहीं दिखा। ना ही दौरी, (बाँस की पतली खपच्चियों से बनी बड़ी गहरी डलिया) झऊआ, मौनी, कठौती, कठौता, या कुश लेकर डलिया बनाती कोई महिला। ना ही शाम को बाहर खटिया पर बैठे, बतियाते लोग, बुज़ुर्ग। ना ही शाम को घरों के बाहर नादों में चारा खाते गाय, बैल या शाम होते ही गाँव के बाहर से गाँव में अपने खुरों से धूर (धूल) उड़ाता गाय गोरुओं का झुंड। गाँवों में इनके खुरों से उड़ती धूल ही के कारण तो इस बेला को गोधुलि बेला भी कहा गया है। यह गाय गोरू सीधे अपने उन घरों के सामने नादों पर जाकर रुकते थे, जिन घरों के मालिक उन्हें बाँधते थे।
इन बेज़ुबानों को रास्ता बताने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। यह अपने ठिकाने पर अपने आप पहुँचते थे। बचपन का जो कुछ भी मैं ढूँढ़ रहा था वह कुछ नहीं मिला। तिनकझांए भी नहीं मिला। बिल्लो के बाद उसी से मेरी ज़्यादा पटती थी। उसका तिनकझांय नाम उसके अतिशय तुनकमिज़ाजी स्वभाव के कारण पड़ा था। वह शराब और गाँव की राजनीति का शिकार हो कई साल पहले ही अपनी जान गँवा बैठा था।
शिखर ने उसके बारे में और कुछ भी बताया जो अच्छा नहीं था।
बिल्लो मिली मगर उसमें भी बचपन की मासूमियत, अल्हड़ता ना मिली। दूसरे दिन वहाँ से चलते समय उससे फिर मिला था। उसने बड़े अपनत्व प्यार के साथ बिदा किया। शिखर मेन रोड तक छोड़ने आया था। उससे बिदा लेते वक़्त मैंने बड़ा होने के अधिकार के साथ उसको काफ़ी पैसे दिए कि "भाई मेरी तरफ़ से यह तुम सब के लिए है। आते वक़्त मैं तुम सबके लिए कुछ लेकर नहीं आ पाया था।" मन में यह बात ज़रूर आई थी, कि भाई तब हमारे-तुम्हारे बीच रिश्ते में इतनी मिठास इतनी मधुरता रह भी कहाँ गई थी?
मैंने जौनपुर रिश्तेदार के यहाँ पहुँचने से पहले उन सबके लिए बहुत सा गिफ़्ट लिया था, कि जितना इन्होंने मुझ पर ख़र्च किया, उसका हिसाब बराबर कर दूँ। कोई अहसान मुझ पर ना रहे। आख़िर खेत बेचने से मना करने पर उनका कमीशन मर रहा था। मैं नहीं चाहता था कि उन्हें कोई नुक़सान हो। मगर पूरे परिवार ने अपने व्यवहार से मुझे पानी-पानी कर दिया। गिफ़्ट के लिए साफ़ कहा कि "बहुत पैसा ख़र्च कर दिया। हमें बड़ा कष्ट हो रहा है।" उनके आत्मीय व्यवहार से मैं भीतर-भीतर आत्मग्लानि महसूस करने लगा। बार-बार यह बात मन में उठने लगी कि सब एक से नहीं होते। आत्मीय रिश्तों का कोई मोल नहीं होता। उसे पैसों से नहीं तौला जा सकता।
रात को भी रिश्तेदार स्टेशन से तभी गए जब ट्रेन चल दी। उसी समय पत्नी का फोन आ गया। बात कर के जब डिस्कनेक्ट किया तो मन में इस बात के आते ही मैंने पसीना सा महसूस किया उस एसी बोगी में भी कि बिल्लो के साथ पूरी रात बचपन के साथ और जो कुछ जिया उसे क्या नाम दूँ? उसे सही कहूँ कि ग़लत? या कि उस रिश्ते के बारे में ऐसा सोचना भी ग़लत है। और जब-जब पत्नी के सामने होऊँगा तब-तब ख़ुद पर कितने घड़ों पानी को पड़ता महसूस करूँगा। तब मैं आत्मग्लानि को किस हद तक सह पाऊँगा ? यह रिश्ता मुझ पर क्या प्रभाव डालेगा? इसे अपनी एक आदर्श पत्नी के साथ धोखा कहूँ या.... और अब तो बार-बार गाँव आाना-जाना रहेगा। बिल्लो के गाँव। भीष्म प्रतिज्ञा वाली बिल्लो के पास।
समाप्त
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