अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

चट मँगनी पट ब्याह

 

अनवरत लिखने-पढ़ने की आदत कमज़ोर पड़ती जा रही है, और मोबाइल पर रील देखने की प्रगाढ़। जब रील से परिचित नहीं था तो महीने में कई किताबें, कहानियाँ, कविताएँ, व्यंग्य आदि पढ़ना और लिखना कोई बड़ी बात नहीं थी, लेकिन जब से रील देखना लत बनती गई तो पढ़ना-लिखना बड़ी बात बनती जा रही है। 

एक लेखक मित्र का तीन माह पूर्व मिला वह उपन्यास आधा भी नहीं पढ़ पाया जिसके लोकार्पण कार्यक्रम में बतौर अध्यक्ष बोलना है। पराकाष्ठा यह कि उन्होंने एसी प्रथम श्रेणी ट्रेन टिकट भेजी, प्लैटफ़ॉर्म पर रील देखता बैठा रह गया, ट्रेन छूट गई। दोस्त न छूट जाए इसलिए दूसरी ट्रेन की जनरल बोगी में बैठ कर चल दिया। भीड़ इतनी कि हिलना-डुलना मुश्किल, साँस फूलने लगी, उलझन महसूस होने लगी। सोचा जान का ख़तरा तो मोल नहीं ले लिया, लेकिन ट्रेन चलते ही फाल्गुनी बयार से राहत मिल गई। 

तभी मैले-कुचैले कपड़े पहने एक साँवली-सलोनी युवती, फ़िल्मी गीत गाती पैसे माँगती हुई आ पहुँची। कुल मिलाकर ठीक गा रही थी, प्रकृति-प्रदत्त मधुर कंठ सभी को मोह रहा था, उसे देखते ही लोगों के मोबाइल सक्रिय हो उठे, वीडियो बनने लगी। मैंने सोचा बस कुछ ही मिनटों में इसकी भी रील लोगों के मोबाइल में चल रही होगी। जो भी उसे पैसा देता उससे कुछ लाइनें दुबारा गाने को ज़रूर कहता। एक कामगार-सा दिखता युवक पता नहीं उसके गायन से या उससे इतना प्रभावित हुआ कि उसी के पीछे-पीछे चलता हुआ आँखों से ओझल हो गया। कई उस पर फब्तियाँ कसते रहे, अश्लील बातें कहते रहे। 

मेरी यह बड़ी कष्टप्रद यात्रा छह घण्टे बाद अगले दिन प्रातः आठ बजे अपने गंतव्य पर पूर्ण हुई। मित्र को सूचित कर दिया था वह लेने आ गए थे। उन्हीं के यहाँ दिनभर सफ़र की थकान उतारने के बाद शाम को लोकार्पण कार्यक्रम में उनके लेखन, पुस्तक की प्रशंसा में कोई कोर-कसर बाक़ी नहीं रखी। उनके अपूर्व आतिथ्य का भी क़र्ज़ उतारना था। कार्यक्रम की सफलता से उनके आतिथ्य-भाव में और मधुरता आ गई थी। 

उन्होंने अगले तीन दिन पत्नी संग खूब-सेवा सत्कार करने, शहर घुमाने के बाद, ससम्मान एसी फ़र्स्ट क्लास बोगी में बिठा कर देर रात मुझे विदा किया। अगले दिन सुबह हो रही थी, मेरा स्टेशन कुछ ही देर में आने वाला था, मैंने अपना सूटकेस, मित्र के दिए गिफ़्ट समेटे और बैठ कर रील देखने लगा। पहली ही रील ट्रेन में गाने वाली युवती और उसके पीछे ग़ायब हुए युवक की थी। 

दोनों एक टूटे-फूटे से मकान के आँगन में चट मँगनी पट ब्याह कर के साथ खड़े थे। ख़ुशी उनके, उनके साथ खड़े परिवार, अन्य सभी के चेहरों पर भी थी। दूल्हे-दुल्हन कुछ अन्य को छोड़ कर बाक़ी सभी के मोबाइल रील बना रहे थे। मैंने मन ही मन कहा यह जेन-ज़ी ही नहीं हमारी, हमारी पूर्व पीढ़ियाँ भी करती आई हैं, इन्होंने परम्परा ही आगे बढ़ाई है, इन्हें वैवाहिक जीवन की हार्दिक शुभकामनाएँ, अशेष आशीर्वाद ही दिया जाए। मैंने मन ही मन यही किया, ट्रेन रुकते ही उतर कर मोबाइल हाथ में लिए हुए घर चल दिया। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

......गिलहरी
|

सारे बच्चों से आगे न दौड़ो तो आँखों के सामने…

...और सत्संग चलता रहा
|

"संत सतगुरु इस धरती पर भगवान हैं। वे…

 जिज्ञासा
|

सुबह-सुबह अख़बार खोलते ही निधन वाले कालम…

 तो ऽ . . .
|

  सुखासन लगाकर कब से चिंतित मुद्रा…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कहानी

बात-चीत

सम्पादकीय प्रतिक्रिया

पुस्तक समीक्षा

पुस्तक चर्चा

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं

लेखक की पुस्तकें

  1. वह अब भी वहीं है
  2. औघड़ का दान व अन्य कहानियाँ
  3. मन्नू की वह एक रात
  4. जेहादन एवं अन्य कहानियाँ
  5. जेहादन एवं अन्य कहानियाँ
  6. हार गया फ़ौजी बेटा एवं अन्य कहानियाँ
  7. बेनज़ीर: दरिया किनारे का ख़्वाब2
  8. बेनज़ीर: दरिया किनारे का ख़्वाब
  9. बेनज़ीर - दरिया किनारे का ख़्वाब
  10. मन्नू की वह एक रात