चट मँगनी पट ब्याह
कथा साहित्य | कहानी प्रदीप श्रीवास्तव15 Jan 2026 (अंक: 292, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
अनवरत लिखने-पढ़ने की आदत कमज़ोर पड़ती जा रही है, और मोबाइल पर रील देखने की प्रगाढ़। जब रील से परिचित नहीं था तो महीने में कई किताबें, कहानियाँ, कविताएँ, व्यंग्य आदि पढ़ना और लिखना कोई बड़ी बात नहीं थी, लेकिन जब से रील देखना लत बनती गई तो पढ़ना-लिखना बड़ी बात बनती जा रही है।
एक लेखक मित्र का तीन माह पूर्व मिला वह उपन्यास आधा भी नहीं पढ़ पाया जिसके लोकार्पण कार्यक्रम में बतौर अध्यक्ष बोलना है। पराकाष्ठा यह कि उन्होंने एसी प्रथम श्रेणी ट्रेन टिकट भेजी, प्लैटफ़ॉर्म पर रील देखता बैठा रह गया, ट्रेन छूट गई। दोस्त न छूट जाए इसलिए दूसरी ट्रेन की जनरल बोगी में बैठ कर चल दिया। भीड़ इतनी कि हिलना-डुलना मुश्किल, साँस फूलने लगी, उलझन महसूस होने लगी। सोचा जान का ख़तरा तो मोल नहीं ले लिया, लेकिन ट्रेन चलते ही फाल्गुनी बयार से राहत मिल गई।
तभी मैले-कुचैले कपड़े पहने एक साँवली-सलोनी युवती, फ़िल्मी गीत गाती पैसे माँगती हुई आ पहुँची। कुल मिलाकर ठीक गा रही थी, प्रकृति-प्रदत्त मधुर कंठ सभी को मोह रहा था, उसे देखते ही लोगों के मोबाइल सक्रिय हो उठे, वीडियो बनने लगी। मैंने सोचा बस कुछ ही मिनटों में इसकी भी रील लोगों के मोबाइल में चल रही होगी। जो भी उसे पैसा देता उससे कुछ लाइनें दुबारा गाने को ज़रूर कहता। एक कामगार-सा दिखता युवक पता नहीं उसके गायन से या उससे इतना प्रभावित हुआ कि उसी के पीछे-पीछे चलता हुआ आँखों से ओझल हो गया। कई उस पर फब्तियाँ कसते रहे, अश्लील बातें कहते रहे।
मेरी यह बड़ी कष्टप्रद यात्रा छह घण्टे बाद अगले दिन प्रातः आठ बजे अपने गंतव्य पर पूर्ण हुई। मित्र को सूचित कर दिया था वह लेने आ गए थे। उन्हीं के यहाँ दिनभर सफ़र की थकान उतारने के बाद शाम को लोकार्पण कार्यक्रम में उनके लेखन, पुस्तक की प्रशंसा में कोई कोर-कसर बाक़ी नहीं रखी। उनके अपूर्व आतिथ्य का भी क़र्ज़ उतारना था। कार्यक्रम की सफलता से उनके आतिथ्य-भाव में और मधुरता आ गई थी।
उन्होंने अगले तीन दिन पत्नी संग खूब-सेवा सत्कार करने, शहर घुमाने के बाद, ससम्मान एसी फ़र्स्ट क्लास बोगी में बिठा कर देर रात मुझे विदा किया। अगले दिन सुबह हो रही थी, मेरा स्टेशन कुछ ही देर में आने वाला था, मैंने अपना सूटकेस, मित्र के दिए गिफ़्ट समेटे और बैठ कर रील देखने लगा। पहली ही रील ट्रेन में गाने वाली युवती और उसके पीछे ग़ायब हुए युवक की थी।
दोनों एक टूटे-फूटे से मकान के आँगन में चट मँगनी पट ब्याह कर के साथ खड़े थे। ख़ुशी उनके, उनके साथ खड़े परिवार, अन्य सभी के चेहरों पर भी थी। दूल्हे-दुल्हन कुछ अन्य को छोड़ कर बाक़ी सभी के मोबाइल रील बना रहे थे। मैंने मन ही मन कहा यह जेन-ज़ी ही नहीं हमारी, हमारी पूर्व पीढ़ियाँ भी करती आई हैं, इन्होंने परम्परा ही आगे बढ़ाई है, इन्हें वैवाहिक जीवन की हार्दिक शुभकामनाएँ, अशेष आशीर्वाद ही दिया जाए। मैंने मन ही मन यही किया, ट्रेन रुकते ही उतर कर मोबाइल हाथ में लिए हुए घर चल दिया।
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