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अभिनंदन ग्रंथ इन प्रोग्रेस

 

रत्ती भर भी माननीय सम्मानीय न होने के बाद भी गधे से सूअर तक चाहता है कि जनता उसे माननीय, सम्मानीय कह कर संबोधित करे। अगर ऐसा नहीं होता तो कुछ गधे टाइप के गधे कोर्ट तक चले जाते हैं अपना सम्मान पाने को।

महिमा हीन, महिमा विहीन होने के बाद भी अपने को महिमा मंडित अपंडित होने के बाद भी अपने को पंडित नहीं, महापंडित कहलवाने, घोषित करवाने की बीमारी हर जीव में नैसर्गिक होती है। मुझमें भी है। मतलब, मैं भी महा पंडित, महिमा मंडित प्रिय जीव हूँ।

हे बात-बात पर अपना मंडन, महिमा मंडन करवाने वालो! यहाँ तो लोग, किसीके सच्ची को महिमावान होने के बाद भी उसकी महिमा का मंडन करने के बदले क़दम-क़दम पर उसकी महिमा का मुंडन करते रहते हैं। राख तक के मोल के समय में किसीका कोई फ़्री में महिमा मंडन करे भी तो क्यों? अपना महिमा मंडन करवाने वाले मुझसे बेहतर जानते हैं कि अपना महिमा मंडन करवाने से पहले अपना मुंडित सिर कितना मुंडित करवाना पड़ता है। तब जाकर महिमा मंडन हो जाए तो हो जाए। वर्ना कुछ महिमा मंडन के सिद्धहस्त तो इतने ज़ालिम होते हैं कि महिमा मंडन की चाह रखने वाले का मुंडन करने के बाद भी उसका महिमा मंडन करने के बदले बड़ी चालाकी से उसकी महिमा का मुंडन कर जाते हैं। और जब तक उसे पता चलता है कि वे उसका महिमा मंडन के बदले उसकी महिमा का मुंडन कर गए, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

चाहे राजनीति का फ़ील्ड या फिर साहित्य का, अपना महिमा मंडन करवाने के लिए अपने पास विश्वस्त चेले होना बहुत ज़रूरी होता है।

जब मैं अपना मौखिक महिमा मंडन करवाते-करवाते थक गया तो मुझे लगा कि अब मुझ पर लिखित अभिनंदन-ग्रंथ होना चाहिए। यह सोचते ही मेरी अपने पर अभिनंदन ग्रंथ लिखवाने, प्रकाशित करवाने की बीमारी अगले ही पल इस क़द्र बढ़ गई कि पूछो ही मत।

अब दिमाग़ में सनक जगी तो जगी। तब मैं तो जैसे-कैसे सो भी जाता, पर सनक फिर भी जागती रहती। जब उसने मुझे जगा-जगा कर परेशान कर दिया तो आख़िर मैंने तय किया कि अब अपने ऊपर अपने चेलों से अभिंनदन ग्रंथ लिखवाने का समय आ गया है।

और मैंने आव देखा न ताव, अपने पास पड़े धूल चाटते अभिनिंदनीय का अभिनंदन ग्रंथ निकाला और उसमें अपने मन माफिक उलट-फेर कर अपने अभिनंदन ग्रंथ की रूपरेखा तैयार कर ली। मित्रो! ज़िन्दगी और लेखन में कुछ भी मौलिक नहीं होता। बस, उलट-फेर ही अधिक होता है।

अपने अभिंनदन ग्रंथ की रूपरेखा तैयार हुई तो मैं वाह का पागल हो उठा। मैंने अपने पहले चेले को फोन किया, “हे मेरे अबस चेले! मैं अपने पर तुम्हारे कर-कमलों से अभिनंदन ग्रंथ के चार अध्याय बदले नामों से लिखवाना चाहता हूँ। मतलब, तुम भी अमर! और मैं तो अमर ही अमर! तुम तो जानते ही हो कि इसमें प्रशंसा के सिवाय और कुछ न होगा। और मुझे पता है कि तुम मेरे मुँह के आगे तो आगे, मेरी पीठ के पीछे भी मेरी प्रशंसा के कभी न गिरने वाले पुल बाँचते रहे हो।”

“हो जाएगा गुरुदेव! डाँट वरी! मैं हूँ न!” उसने मुँह भर कहा। क्योंकि उसे पता है कि मैं भविष्य में उसके कितने काम आने वाला हूँ। यहाँ निःस्वार्थ कुछ भी नहीं। सब लेन-देन का मामला है।

फिर मैंने अगले चेले को अपने अभिनंदन ग्रंथ की ज़रूरत के हिसाब से फोन लगाया, “मैं अपने पर तुम्हारे कर-कमलों से अभिनंदन ग्रंथ के तीन अध्याय बदले नामों से लिखवाना चाहता हूँ। मतलब, तुम भी अमर! और मैं तो अमर ही अमर! तुम तो जानते ही हो कि इसमें प्रशंसा के सिवाय और कुछ न होगा। और मुझे पता है कि तुम मेरे मुँह के आगे तो आगे, मेरी पीठ के पीछे भी मेरी प्रशंसा के कभी न गिरने वाले पुल बाँचते रहे हो।”

“हो जाएगा गुरुदेव! डाँट वरी! मैं हूँ न!” उसने मुँह भर कहा। क्योंकि उसे पता है कि मैं भविष्य में उसके कितने काम आने वाला हूँ। बंधुओ! यहाँ निःस्वार्थ कुछ भी नहीं। सब लेन देन का मामला है।

फिर मैंने अगले चेले को अपने अभिनंदन ग्रंथ के मैटर की ज़रूरत के हिसाब से फोन लगाया, “हे मेरे टबस चेले! मैं अपने पर तुम्हारे कर-कमलों से तीन विभन्न नामों से तीन अध्याय अपने अभिनंदन ग्रंथ के लिखवाना चाहता हूँ। मतलब, तुम भी अमर! और मैं तो अमर ही अमर! तुम तो जानते ही हो कि इसमें प्रशंसा के सिवाय और कुछ न होगा। और मुझे पता है कि तुम मेरे मुँह के आगे तो आगे, मेरी पीठ के पीछे भी मेरी प्रशंसा के कभी न गिरने वाले पुल बाँचते रहे हो।”

“हो जाएगा गुरुदेव! डाँट वरी! मैं हूँ न!” उसने मुँह भर कहा। क्योंकि उसे पता है कि मैं भविष्य में उसके कितने काम आने वाला हूँ। बंधुओ! यहाँ निःस्वार्थ कुछ भी नहीं। सब लेन-देन का मामला है।

इस तरह जब अपने अभिनंदन ग्रंथ के मैटर के हिसाब से सब फ़ाइनल हो गया तो मैंने प्रकाशक को फोन लगाया, “हे माई डियर प्रकाशक!”

“बोलो मेरे प्रिय लेखक! अबके क्या नया लिख मारा है?”

“तुम्हारे लिए लिखते-लिखते अब मैं बहुत थक गया हूँ। अबके मैं अपने लिए अपना अभिनंदन ग्रंथ लिखवा छपवाना चाहता हूँ।”

“कितने पेज होंगे?” वह सीधे मुद्दे पर आया। सच्चे प्रकाशक के लिए हर लेखक एक पेज होता है बाज़ार में जमकर थिरकने वाला।

“लेखन के हिसाब से न सही तो न सही, पर उम्र के हिसाब से तो वरिष्ठ हूँ-ही-हूँ। इस हिसाब से पेज भी ज़्यादा ही होंगे!”

“पर यह बाज़ार में उठने वाला नहीं। और तुम तो जानते ही हो कि . . .”

“जानता हूँ। आजकल तो साहित्य के बाज़ार में वह भी नहीं उठता तो हर हाल में उठने वाला होता है। फिर यह तो ठहरा अभिनंदन ग्रंथ। अपनी जय-जयकार करवाने को कई बार बहुत कुछ अपनी जेब को चूना लगवा मुफ़्त में भी बाँटना पड़ता है मित्र!”

“तो कोई बात नहीं। मैटर भेजते रहना। हो जाएगा। लेकिन अभिनंदन ग्रंथ का लोकार्पण हो जाने के बाद भी मेरी डिमांड के हिसाब से लिखते रहोगे न?” प्रकाशन के बाज़ार में लेखक अपने मन के हिसाब से नहीं, प्रकाशक की डिमांड के हिसाब से लिखता है। न लिखे तो उसे प्रकाशन नहीं छापता।

“पहले तुम से बाहर गया हूँ क्या? अपनी मर्ज़ी का लिख अपनी किताब को ज़िन्दा क़ब्र में दफ़नवाना है क्या?” मैंने कहा तो वह तय किए रेट से आधे में मेरा अभिनंदन ग्रंथ छापने को राज़ी हुआ।

मित्रो! आजकल मेरे अभिनंदन ग्रंथ पर ज़ोरों-शोरों से काम चला है। मेरे पास सिर खुरकने को भी समय नहीं। कोई मेरी प्रशंसा के पुल बाँध मुझे भेज रहा है तो किसीके टाइप होकर आए के मैं प्रूफ़ पढ़ रहा हूँ। मित्रो! मेरे जीवन में ग़लतियाँ रही हों तो रही हों, पर मैं चाहता हूँ कि अब मेरे अभिनंदन ग्रंथ में कोई ग़लती न जाए। ऐसे में मैं किसीकी कॉल अटेंड न कर पाऊँ तो मेरी विवशता को मद्देनज़र रखते हुए अन्यथा मत लीजिएगा प्लीज़! 

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