फ़्रेंडुआ बैरी हो गए हमार
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी डॉ. अशोक गौतम1 Mar 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
फ़्रेंडो! फ़्रेंड ने फ़्रेंडों की भर्ती करने के बाद निचले स्तर पर फ़्रेंडों की भर्ती करने की सोची और सोच को अमली जामा पहनाते फ़्रेंड बनाने आरंभ किए तो गोबर चहक उठा। ऊपर वाले फ़्रेंडों का तो वह फ़्रेंड बन नहीं सकता था। वे ठहरे सपनों के नाम पर गोबर बेचने वाले और वह ठहरा सपनों के नाम पर गोबर उठाने वाला।
फ़्रेंडों की दुनिया में वह भी कोई न कोई फ़्रेंड होना चाहता था। फ़्रेंड होने के लिए उसने बहुत हाथ पाँव मारे। गोबर ने शुरू-शुरू में मंत्री फ़्रेंड होने कोशिश की, पर उसने उसे पास भी नहीं फटकने दिया। गोबर ने फिर एमएलए फ़्रेंड होने कोशिश की, पर उसने भी उसे पास नहीं फटकने दिया। फिर गोबर ने प्रधान फ़्रेंड होने कोशिश की, पर उसने भी उसे पास नहीं फटकने दिया। फिर गोबर ने उपप्रधान फ़्रेंड होने कोशिश की, पर बात नहीं बनी। हारपच कर उसे लगा कि वह सबकुछ बन सकता है, पर किसीका फ़्रेंड नहीं बना सकता।
तभी अचानक उन्होंने फ़्रेंडों की निचले स्तर पर फ़्रेंडों की भर्तियाँ करनी शुरू कीं तो गोबर को फिर फ़्रेंड बनने की उम्मीद जगी। फ़्रेंडों ने चुनावी फ़्रेंडों की नियत से एजुकेशन फ़्रेंड की भर्ती शुरू की तो गोबर ने इधर-उधर से पेंच लड़ा एजुकेशन फ़्रेंड होना चाहा, पर बात नहीं बनी।
कुछ दिनों बाद उसे फिर पता चला कि फ़्रेंड रोगी फ़्रेंड रख रहे हैं। सुनते ही वह ख़ुद रोगी होते हुए भी रोगी फ़्रेंड बनने की तैयारी करने लगा। इधर-उधर से जितने सम्भव थे, उससे भी अधिक जुगाड़-सुगाड़ जुटाए। पर हाय रे गोबर की तक़दीर! जुगाड़-सुगाड़ जुटाने भिड़ाने के बाद भी बात नहीं बनी तो नहीं बनी।
कुछ दिनों बाद उसे फिर पता चला कि फ़्रेंड जोगी फ़्रेंड बना रहे हैं। अबके उसने फिर फ़्रेंड होने की बुरी नियत से जुगाड़ जुटाए भिड़ाए और जोगी फ़्रेंड होने के सपने देखने लगा। पर लास्ट में फ़्रेंडों की लिस्ट से उसका नाम कट गया और वह जोगी फ़्रेंड बनता बनता रह गया।
कुछ दिनों बाद उसे फिर पता चला कि फ़्रेंड लोभी फ़्रेंड बना रहे हैं। अबके फिर उसने फिर जुगाड़ जटाए भिड़ाए और लोभी फ़्रेंड होने के सपने देखने लगा। पर लास्ट में लोभी फें फ़्रेंडों की लिस्ट से भी उसका नाम ग़ायब हुआ तो वह जोगी फ़्रेंड बनता बनता रह गया।
कुछ दिनों बाद उसे फिर पता चला कि फ़्रेंड चाल-चलन फ़्रेंड बनाने जा रहे हैं। यह पता होते हुए भी उसका चाल-चलन क़तई भी सही नहीं, उसने फिर भी चाल-चलन फ़्रेंड बनने की तैयारी शुरू कर दी। उसने सोचा, जब ऊपर वाले भी बिन चाल-चलन के मज़े से चल रहे हैं तो वह भी चलेगा। निस्संकोच चलेगा। सही चाल-चलन वालों को यहाँ पूछता ही कौन है? जो-जो जो भी चाल चल गया, वही समाज का चाल-चलन बन गया। उसने इधर-उधर से बीसियों एक से एक उम्दा चाल-चलन के प्रमाण पत्र जोड़े, पर वह लास्ट में फिर चाल-चलन फ़्रेंडों की लिस्ट से बाहर हो गया।
कुल मिलाकर, गोबर की अंतिम इच्छा यही थी कि वह जैसे भी हो, फ़्रेंडवत् सिस्टम में कोई न कोई फ़्रेंड बन खाए।
अचानक उसे फिर अख़बारी सूत्रों से पता चला कि फ़्रेंडप्रिय अब पशु फ़्रेंड बनाने जा रहे हैं। यह पता चलते ही गोबर के भीतर का पशु फ़्रेंड रंभाने लगा, खुर मारने लगा। उसे लगा कि अब उसे पशु फ़्रेंड बनने से कोई न ही रोक सकता। उसकी तो सारी पुश्तें पशुओं के बीच ही रही हैं। फिर भी वह कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था। उसने अपने महल्ले के सारे भैंसों, साँड़ों को खिला-पिलाकर इकट्ठा किया और उनका डेपुटेशन लेकर फ़्रेंडप्रियों के दरबार में जा पहुँचा। गोबर के साथ आए भीड़ साँड़ों, भैंसों को देख वे आत्मविभोर हो उठे।
कमाल है! इतने साँड़ भैंसे तो उनके पास भी नहीं! उन्होंने उसके साथ शिष्टाचार भेंट कर उससे चुनावी वादा ले, उसे फ़्रेंड बनाने का पक्का वादा दे विदा किया।
नीति नैतिक निर्धारकों की संतान तो वह था नहीं कि बिन इंटरव्यू दिए पशु फ़्रेंड बन जाता। वह तो होरी का गोबर था। इसलिए अपनी ओर से कोई कमी न रखने के लिए गोबर जी जान से तैयारी में जुट गया।
सबसे पहले रोज़ सुबह पचास किलो का बोरा उठाए उसने फिजिकल टेस्ट की तैयारी करते रंनिंग शुरू की तो एक सुबह उसे रनिंग करते देख पढ़े-लिखों के कचरे के ढेर पर बसेरा जमाए अलसाए, सब्सिडी की लेटे-लेटे खाए सरकार से मिले ख़ास क़िस्म के गद्दों पर सारा दिन पसरे गधे ने अपने दाँतों से सब्सिडी का फँसा निकालते पूछ ही लिया, “गुड मार्निंग गोबर! कई दिनों से मैं तुम्हें लोड उठाए दौड़ते देख रहा हूँ। आख़िर ये सब क्या चल रहा है? आर्मी की तैयार कर रहा है क्या?” अजीब दिन आ गए! अब तो गधे तक आदमी से तू कर बात करने लगे दोस्तो!
“नहीं।”
“तो कोई चेम्पियनशिप जीतने के लिए बीवी को उठाकर रेस लगाने की तैयार कर रहा है?”
“नहीं, पशु फ़्रेंड होने की तैयारी कर रहा हूँ,” गोबर ने मरे मन कहा।
“मतलब?” गधे ने दाँतों तल उँगली दबाई, “मतलब, पशु फ़्रेंड बन जाने के बाद तुझे पशु उठाकर दौड़ना पड़ेगा क्या? बुरा न माने तो बात कहूँ?” थका गोबर भार से तनिक रिलीफ़ पाने के लिए अपना लोड ग़लती से जो गधे की पीठ पर धरने लगा तो गधे ने उसे झिड़कते पूछा, “ये क्या कर रहा बे?”
“तुम्हारी पीठ पर ज़रा बोझ रख रहा हूँ और क्या?”
“देख गोबर! गधे की पीठ पर बोझ रखना ग़ैर क़ानूनी है। अब मेरी पीठ पर बोझ रखना घोषित अपराध है। आजकल तो मैं अपना बोझ घोड़ों की पीठ पर उठवा रहा हूँ।”
“मतलब?” गेाबर ने माथे पर आया पसीना पोंछ गधे पर फेंकते पूछा।
“मतलब ये कि जिसे मिले यों वो ख़ून पसीना बहाए क्यों? अब मुफ़्त का खाना मेरा वोट सिद्ध अधिकार है। गधा हूँ, पर ध्यान से सुन! आजकल गधे ही ज्ञान के अक्षय भंडार हैं। यहाँ अपना बोझ उठाना समझदारी नहीं, अपना बोझ दूसरों पर डालना ही समझदारी है।”
“मतलब?” गोबर भौचक्क!
“अगर तू बेहतर ढंग से जीना चाहता है तो कभी भी किसीका भी किसीके लिए बोझ मत उठा, दूसरों पर अपना बोझ डाल जीने के फूल मज़े ले। अपना बोझ ख़ुद उठाना ज़िन्दगी नहीं, अपना बोझ दूसरों पर डाल मज़े से जीना ही ज़िन्दगी है, ” गोबर ने कुछ देर खड़े खड़े अपनी पीठ पर लोड उठाए ज्ञानी गधे के ज्ञान पर शोक फ़रमाया और गधे के पास पड़े अख़बार में प्रशासनिक कारणों से पशु फ़्रेंडों की भर्ती पर अचानक रोक लगने की ख़बर पढ़ी तो भी फ़्रेंडों का फ़्रेंड बनने की उम्मीद लिए रनिंग पर निकल पड़ा, यह सोचकर कि कभी न कभी तो पशु फ़्रेंड भर्ती पर से रोक हटेगी ही।
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