सब लहसुन प्याज़ का खेला
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी डॉ. अशोक गौतम1 May 2026 (अंक: 296, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
बंधुओ! सच कहूँ तो मैं खाने के मामले में सनातनी होने के बाद भी बिल्कुल भी फस्सी नहीं हूँ। मतलब मैं सर्वाहारी हूँ। इसलिए घर से कैंटीन, ढाबे, होटल दफ़्तर में जो कुछ भी मिल जाता है, मज़े से आँखें मूँद खा लेता हूँ। दफ़्तर में कोई सज्जन अपनी फ़ाइल के पाँच सौ खिलाता है तो हँसते हुए खा लेता हूँ। कोई मुँह नहीं बनाता। कभी मुँह नहीं बनाता। उससे कभी शिकायत नहीं करता कि भैये! इतनी महत्त्वपूर्ण फ़ाइल के पाँच सौ खिला रहे हो? उसने जो खिला दिया हरि कृपा।
दफ़्तर में जो कोई सज्जन अपनी फ़ाइल के हज़ार खिलाता है तो भी हँसते हुए खा लेता हूँ। उससे कभी शिकायत नहीं करता कि भैये! इतनी महत्त्वपूर्ण फ़ाइल के केवल हज़ार खिला रहे हो? उसने जो खिला दिया हरि कृपा।
पिछले हफ़्ते घर से दूर जाना हुआ। चुनाव के सिलसिले में। मंगलवार था। मैं मंगलवार का शुद्ध वैष्णव रहता हूँ। भूख बहुत लगी थी। सरकारी कर्मचारियों को वैसे भी भूख बहुत लगती है, कुर्सी पर लेटे हुए भी। चपरासी तक अफ़सर से अधिक खाने का माद्दा रखता है, जो उसका बस चले तो। सामने ढाबा दिखा। शुद्ध शाकाहारी माछ ढाबा! देखकर मन गद्गद् हो गया। मतलब, मंगलवार का बंधन ख़त्म। फिर ज़रा तार्किक हो सोचा, माछ शुद्ध शाकाहार में कब से आ गए गुरु? फिर ज़रा आगे सोचा, हो सकता है, मांसाहार शाकाहार की सूची में कोई नया संशोधन हो गया हो संविधान में संशोधन की तरह। सफल ज़िन्दगी में शोधन नहीं, संशोधन ज़रूरी होते हैं।
सहमा-सहमा ढाबे के मालिक की ओर लपकते-लपकते सरका तो उसने मेरा भव्य स्वागत किया, “आइए साहब! क्या खाओगे? मेरे शुद्ध शाकाहारी माछ ढाबे में आपका हार्दिक स्वागत है।” भीतर पतीले से वाह! क्या शाकाहारी माछ की शाकाहारी ख़ुश्बू आ रही थी! पेट बाग़-बाग़ हो गया। मन किया शुद्ध शाकाहार माछ पकते पतीले में ही घुस जाऊँ। लेकिन धर्म भीरु ने उससे अपनी शंका निवारण के लिए पूछ ही लिया, “बंधु! माछ कब से शाकाहार की श्रेणी में आ गए?”
“अपने यहाँ के माछ पहले तो मांसाहार की श्रेणी में ही थे साहब! पर जबसे कुछ सनातनियों ने उसे मांसाहार से निकाल अपनी प्लेट में डालते माछ का उद्धार करते उसको शाकाहार की श्रेणी में शामिल किया है तबसे माछ मांसाहार की श्रेणी से शाकाहार की श्रेणी में आ गया है।”
“पर हमारे यहाँ तो अभी भी माछ मांसाहार में गिना जाता है।”
“शायद आपके यहाँ अभी तक मांसाहार शाकाहार की रिवाइज़्ड एडवाइज़री की कॉपी नहीं पहुँची होगी जनाब! सब जीभ-जीभ का भेद है साहब! जिस तरह कहीं नैतिकता अनैतिकता में गिनी जाती है तो कहीं वही अनैतिकता नैतिकता हो जाती है। जिस तरह कहीं धोखा विश्वास के अंतर्गत माना जाता है तो कहीं विश्वास धोखे के अंतर्गत रखा जाता है। जिस तरह कहीं सच झूठ के अंतर्गत रखा जाता है तो कहीं झूठ सच के अंतर्गत रखा जाता है, ठीक उसी तरह आपके यहाँ माछ मांसाहार में गिना जाता है, और अपने यहाँ शाकाहार में। समरथ मुँहों-मुँहों की अपनी अपनी स्थापनाएँ हैं साहब! अपने-अपने विधान। जो बन निकला सो चल निकला।”
“मतलब?” उसकी दलील के आगे मैं सिर से पाँव तक झुका। लगा, पिछले जन्म में ज़रूर कोई दार्शनिक रहा होगा। अब पिछले जन्म में किए पाप भुगतने के लिए विचारों के मालिक के बदले ढाबे का मालिक बन गया होगा, “तो मांसाहार और शाकाहार को अलग कौन करता है?” यों ही बेतुका सवाल पूछा लिया।
“जनाब! सब लहसुन-प्याज़ का खेला है। नए सनातनियों ने विधान दिया है कि लहसुन-प्याज़ एक ही चीज़ को मांसाहारी भी बना देता है और शाकाहारी भी।”
“मतलब?” चौंकना लाज़िमी था, सो चौंका भी।
“मतलब जनाब ये कि अगर माछ में लहसुन-प्याज़ डाल दिया तो वह मांसाहार हो जाएगा और जो बिन लहसुन-प्याज़ के माछ बनाया खाया तो वह शुद्ध शाकाहार की श्रेणी में आएगा।”
“मतलब?”
“जनाब! अब जब चाहे माछ खाओ। तीज, व्रत में माछ खाओ। घर के भीतर घर के बाहर जब मन करे माछ खाओ, बस, बार, तीज-त्योहार देखकर उसमें लहसुन प्याज़ पाओ।”
सच कहूँ तो अब शुद्ध शाकाहरी माछ ढाबे मालिक द्वारा शाकाहार और मांसाहार पर दिए शास्त्रीय विधान ने मेरी जीभ का काया-कल्प कर दिया है। अब मैं जिस दिन मांसाहार खाने को मन करता है उस दिन गोभी में लहसुन-प्याज़ डाल शुद्ध मांसाहारी हो जाता हूँ। और जिस दिन शाकाहारी खाने को मन करता है उस दिन चिकन, मटन, बिन लहसुन-प्याज़ के बना शुद्ध शकाहारी हो लेता हूँ। न अब शाकाहार का झंझट, न अब बार, तीज-त्योहार का खटका। ऊपर से सिर से लेकर पाँव तक अव्वल दर्जे का सनातनी ही सनातनी। अब मेरे मलेच्छ होने का प्रश्न ही नहीं उठता।
तुम धन्य हो सनातनियो! तुमने शाकाहार मांसाहार को जो नया विधान दिया है उसके लिए तुम्हारा बहुत-बहुत आभार! अब सब सनातनी ही सनातनी। सनातन को लेकर कहीं कोई नहीं तनातनी।
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