सर जी का हमशक्ल साँड़
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी डॉ. अशोक गौतम15 Jun 2026 (अंक: 299, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
मेरा महल्ला आवारों का महल्ला है। यहाँ पर आपको क़दम-क़दम पर आवारा कुत्ते मिल जाएँगे। यहाँ पर आपको क़दम-क़दम पर आवारा पढ़े-लिखे मिल जाएँगे। आपको ही नहीं, मुझे भी अजीब लगता है जब पढ़े-लिखों को भी अपने महल्ले में आवारा घूमते देखता हूँ। आदमी पढ़ता-लिखता किसलिए है? क्या आवारा होकर घूमने-फिरने के लिए?
यहाँ पर आपको यहाँ-वहाँ रात के दस-दस बजे तक स्वास्थ्य लाभ के बहाने घर से बाहर रहने को विवश घूमते आवारा रिटायरी मिल जाएँगे। और इन सबके बीच आपको मिल जाएगा कहीं भी अकड़ कर बीच सड़क में पूरी सड़क को अपने बाप की सड़क मान लेटा सबको डराने का अभिनय करता हमारे महल्ले का भारी-भरकम इकलौता पालतू आवारा साँड़!
वह सबका प्रिय तो नहीं, पर कुछ डरपोकों का प्रिय साँड़ है। वे उसमें अपने अपने हिसाब से अपने अपने आराध्य के दर्शन करते हैं, भले ही वह उनके पीछे कभी कभार हाथ-मुँह धो पड़ा हो तो पड़ा हो। जब कभी ग़लती से वह अपना हिंसकपना दिखाने के लिए उनके पीछे पड़ता है तो उसे वे अपना भाग्य नहीं, सौभाग्य मान लेते हैं।
उसका दिखावटी भय महल्ले में इतना है कि जिस-जिस को वह घूरा, वे तो उसके भय की पूजा करते ही हैं, पर जिसको उसने कुछ नहीं कहा, वे भी उससे भय खाते हैं। साँड़ में अक़्ल तो होती नहीं। क्या पता? कब बिन मतलब किसीसे क्या कर जाए? क्या पता? कब बिन मतलब किसीसे लड़-भिड़ जाए? साँड़ जो ठहरा। यहाँ तो आदमी भी आजकल साँड़ों के पिता प्रपिता चल रहे हैं।
मतलब बेमतलब किसीके पीछे पड़ना हर नस्ल के साँड़ की आदत होती है। वैसे, जिसे-इसे-उसे डरा-धमकाकर एकबार मौज उड़ाने की मानसिक बीमारी हो जाए, वह सच में किसीको डराने की मशक्क्त क्यों करे? किसीमें किसीका भय तभी तक बना रहता है, जब तब वह किसीको दिखाने भर को आँखें दिखाता रहता है।
यह जी जनाब साँड़ हमारे महल्ले का इकलौता साँड़ है। सो उसमें सब अपनी-अपनी आस्था के हिसाब से वह सब-सब देखते हैं, जो-जो वे देखना चाहते हैं। कोई उसमें भगवान के दर्शन करता है तो कोई शैतान के। पर इससे उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। एकाधिकारी को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि जनता उसमें किसके दर्शन कर रही है। उसे केवल इस बात से फ़र्क़ पड़ता है कि जनता में जैसे भी हो, उसका भय क़ायम रहना चाहिए। वह चाहे भक्ति से क़ायम रहे चाहे दिखावटी शक्ति से।
इस साँड़ के भय से हमारे महल्ले वाले कभी उसमें किसीके साक्षात् बलात् दर्शन करते हैं तो कभी किसीके। आजकल वे उसमें सर जी के साक्षात् दर्शन कर कृतार्थ हुए जा रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि इन दिनों हमारे महल्ले के साँड़ की शक्ल परमादरणीय सर जी से हू-ब-हू मिल रही है। कई सर जी प्रेमियों ने तो इसलिए उसका उपनाम सर जी रख दिया है।
वैसे मेरे कुछ दोस्तों की शक्लें कई बार गीदड़ों से मिलती हैं तो कई बार सियारों से। मेरे घरवाले कहते हैं कि मेरी शक्ल हू-ब-हू धोबी के गधे से मिलती है। मिलती होगी! अब मैं इस बाबत कर ही क्या सकता हूँ? जाकी रही भावना जैसी, मुझमें मूरत देखी तिन तैसी।
और मज़े की बात! जब उसके भक्त तो भक्त, दुश्मन तक उसे सादर सर जी! सर जी! कह कर बुलाते हैं तो वह ग़ुस्से युक्त प्यार से अपने सींग हिलाता है, कुटिल मीठी हँसी मुस्कुराता है।
तो हुआ यों कि जैसे ही पशुपालन विभाग को सोशल मीडिया से पता चला कि हमारे महल्ले में सर जी का हमशक्ल साँड़ है, इससे पहले कि उसके साथ कुछ ग़लत-फलत होता, वह हरकत में आया। विभाग पशुपालन था, सो उसे साँड़ की ही सोचनी थी। आदमियों के बारे सोचने वाले विभाग यहाँ हैं ही कहाँ? और उसने विदेश नीति के तहत हमारे मैत्री संबंधों पर विपरीत असर पड़ने से पहले सर जी के हमशक्ल साँड़ का रेस्क्यू कर सकुशल चिड़ियाघर भेज दिया।
और देखते ही देखते सड़क पर मज़े से पसरा रहने वाला सर जी का हमशक्ल साँड़ चिड़ियाघर में! चिड़ियाघर में साँड़ तो परेशान हुआ ही, पर चिड़ियाघर से बाहर मैं भी परेशान हो उठा। असल में मुझे भी सर जी के हमशक्ल साँड़ के साथ रहने की आदत पड़ गई थी। समाज में डर का माहौल बनाने वाले को एकाएक समाज से उठाकर संरक्षण के नाम पर जो कहीं क़ैद कर दिया जाए तो समाज और संरक्षित दोनों परेशान हो जाते हैं। क्योंकि समाज को भय में जीने की आदत होती है और डराने वाले को समाज को बात बात पर भय दिखाने की। समाज भय खाता है और भय दिखाने वाला उसे अलग अलग स्वाद का डिलिशियस भय खिलाता अमर हो जाता है।
इधर साँड़ के भय के बिना महल्ला—महल्ला वासियों को काटने को दौड़ रहा था। लगता, ज्यों महल्ले में कोई नहीं। जिन्हें एकबार भय में जीने की आदत पड़ जाए और एकाएक उनका भय ख़त्म हो जाए तो वे पहले से अधिक भयभीत हो जाते हैं।
मेरा भी यही हाल! मैं महल्ले से अलग थोड़े ही था। और जब मेरा भय गले से ऊपर हो गया तो मैं जा पहुँचा सीधा चिड़ियाघर जहाँ सर जी का हमशक्ल साँड़ संरक्षित था। उसको जी भर देखा तो मन भय से गद्गद् हुआ। मन को परमशांति मिली। लेेकिन वह चिड़ियाघर में भी मज़े में। जिन्हें फ़्री की खाने की आदत पड़ जाए, वे सब जगह मज़े में रहते हैं।
“और सर जी के हमशक्ल साँड़! कैसे हो?”
“मज़े में हूँ,” उसने हँसते हुए कहा, पर लगा कि वह भीतर से हँस नहीं रहा है।
“चिड़ियाघर में बुरा नहीं लग रहा? कहाँ महल्ले में तुम्हारा भय और कहाँ?”
“देखो, सर जी का साँड़ जहाँ भी रहेगा, सर जी का हमशक्ल साँड़ होकर ही रहेगा। वह चाहे कहीं भी हो,” उसने हँसते-हँसते कहा और चिड़ियाघर के मासूम कबूतरों को भयभीत करने का अकुशल अभिनय करने लगा।
“बुरा मत मानना सर जी! है तो भयभीत मुँह बड़ी बात, पर . . .” आगे कुछ कहने से पता नहीं मैं क्यों चुप हो गया? मेरी चुप्पी को कृपया अन्यथा न लिया जाए।
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