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1984 का पंजाब

शाम ढले अक्सर ज़ुल्म के
साये को छत से उतरते देखा
सारी सारी रात उसे फिर
बेख़ौफ़ आँगन में टहलते देखा

दहशत का माहौल फिर
इस क़दर रहा उस घर पे भारी
कि घर के हर शख़्स को
ज़िन्दा ही क़ब्र में उतरते देखा

गुम हो गया वो साया फिर
दूर कहीं सुबह से पहले
दिन के उजाले में भी न
हमने किसी को हँसते देखा

अमनो सुकून जल गया,
ज़िन्दगी क़फ़न की मुहताज़ बनी
क्या क्या न जाने छूट गया,
किस किस को न मरते देखा

न रही सलामत कोई जान,
न ही महफ़ूज़ किसी की आबरू
ख़ौफ़ के साये तले ज़िन्दगी को
क़तरा क़तरा पिघलते देखा

यतीम हुए, घर बार छूटा,
हिजरत हुई जाने ही कितनों की
अनगिनत बेक़सूर जानों को
मुसलसल ज़िन्दान में सड़ते देखा

वो जो समझते थे कि उनका
सूरज कभी ढलने वाला नहीं
आई शाम तो उनके इरादों को
भी पत्तों सा बिखरते देखा

ये कोई कहानी नहीं, हक़ीक़त
 थी हर रोज़ की मेरे दोस्त
कि हमने तेरे पंजाब को ‘निर्मल’
सालों-साल है जलते देखा

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