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होने का अहसास

होना...
सिर्फ़ कहने मात्र से ही
नहीं होता
न ही होता है
होने का अहसास,

होने के लिए तो
प्रतिदिन, प्रतिपल
दिलाना पड़ता है
होने का आभास,

ज्यों दिलाते हैं
एक-दूजे को
मीन औ’ सागर
हवा औ’ ख़ुश्बू
धरती औ’ आकाश

तब जाकर कहीं
खिलते हैं अनेक पुष्प
जिनसे महकती है फिर
रोज़ नई इक आस!

होना –
कहने से ही फ़क़त
होना नहीं होता!

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