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 क़लम घिसाई

मैं क़लम-घिसाई करता हूँ
ख़्वाबों की बुनाई करता हूँ
जब दिल में हलचल होती है
थोड़ी सी लिखाई करता हूँ,

अक्षर जब अकुलाते हैं
वो गीत दर्द के गाते हैं
राग कोई जब छिड़ जाता है
उसकी मैं भरपाई करता हूँ,

जब ऋतुयें वस्त्र बदलती हैं
हर शाख़ पे कली थिरकती है
कोयल भी गुनगुन करती है
उन सबकी मैं सुनवाई करता हूँ,

जब तन्हा सी रातें होती हैं
और तारों से बातें होती हैं
अश्कों की बूँदा-बाँदी से मैं
ज़ख़्मों की तुरपाई करता हूँ,

सियासत के फंदे उलझे हैं
ये दाँव-पेंच कब सुलझे हैं
बेफ़ज़ूल मसलों की मैं तो
हर वक़्त धुनाई करता हूँ,

जो घटना नज़र को जँचती है
जो बात ज़ेहन को चुभती है
लेकर सबकी ख़बरसार फिर
विचारों की खुदाई करता हूँ
थोड़ी सी लिखाई करता हूँ

कोई कब तक नज़र चुरायेगा
इस क़लम से बच न पायेगा
जो कहती, चलता सदियों तक
इसकी मैं सुनवाई करता हूँ
थोड़ी सी लिखाई करता हूँ

सुख-दुख संग ही चलता है
हर दिन, रात में ढलता है
जहाँ अन्धेरा, वहीं उजाला
कुदरत की बढ़ाई करता हूँ
थोड़ी सी लिखाई करता हूँ

जब मन का पंछी उड़ता है
हर रिश्ता ख़ुद से जुड़ता है
ऊँची मस्त हवाओं में उड़
ख़ुद को मैं ख़ुदाई करता हूँ
थोड़ी सी लिखाई करता हूँ।

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