अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

तेलुगु सिनेमा ‘मालपिल्ला’ में दलित विमर्श

गूढवल्ली रामब्रह्मम तेलुगु के एक ऐसे युगद्रष्टा फ़िल्मकार थे जिन्होंने सिनेमा की अर्थवत्ता को केवल मनोरंजन तक सीमित न रखकर उसे समाज कल्याण हेतु विचारों को उद्दीप्त करने का सशक्त माध्यम बना दिया। जिस प्रकार किसी भी कृति को समझने के लिए कृतिकार और उसके युग-धर्म को समझना आवश्यक होता है, उसी प्रकार किसी भी फ़िल्म की समीक्षा करने से पहले फ़िल्मकार और उसके युग-धर्म की सामान्य जानकारी अपेक्षित है। भारत में 1930 का दौर क्रांति और विद्रोहों का दौर था। आज से 85 वर्ष पूर्व देश में कई प्रकार की धार्मिक परम्परायें, आचरण और मान्यतायें प्रचलित थीं। हर ओर अंध-विश्वास और अज्ञानता का आतंक फैला हुआ था। स्वार्थ-वृति, जातिवाद, अस्पृश्यता जैसे नाना प्रकार के रूढ़िग्रस्त सामाजिक मूल्यों और कुप्रथाओं से समाज आक्रांत था। विशेषतः छुआ-छूत भयंकर बीमारी का रूप लेकर समाज को डस रही थी। 

सिनेमा की पूर्व-पीठिका – 

व्यक्ति का सत्य जब समष्टि की चेतना बन जाता है तो वह सार्वकालिक और सार्वभौमिक सत्य बन जाता है। और वह सत्य है - ‘हर प्राणी का इस पृथ्वी पर सम्मान से जीवन जीने का अधिकार! जब कोई एक जनसमुदाय श्रेष्ठता के दम्भ पर किसी दूसरे समुदाय को उसके मूलभूत मानवाधिकारों से वंचित करने का दुस्साहस करता है, उसे दबा कर रखने का अपराध करता है, उसके अस्तित्व पर ही प्रश्न चिह्न लगाने की धृष्टता करता है तो उसे जन आक्रोश के परिणाम को अवश्य भुगतना पड़ता है। भारत में जातिवाद और अस्पृश्यता ने सदियों पहले से ही जनमानस की चेतना को कलुषित कर रखा था। ‘ढोल, शूद्र, पशु और नारी’ कहकर उन्हें मानव की परिभाषा के दायरे से ही अलग बाहर कर दिया था। और जो मनुष्य ही नहीं माना जाता, उसके क्या अधिकार, और क्या कर्तव्य? वह तो केवल सवर्ण जातियों की सेवा करने के लिए ही धरती पर जन्म लेता है, उनकी जूठन खाकर, उनके बनाए और बताये नियमों का पालन कर अपना जीवन होम कर देता है। यही उसका भाग्य है और अज्ञानता, मूढ़ता अशिक्षा के तिमिर में सदियों से वह इसी भाग्य को स्वीकारता आ रहा है। सवर्ण जातियों ने अपने को उत्तम और श्रेष्ठ मानकर अनाधिकृत रूप से आध्यात्मिक स्थलों पर क़ब्ज़ा कर अन्य जातियों को क्षुद्र, हीन, निम्न और अंत्यज कहकर उन्हें मंदिरों से ही बहिष्कृत कर दिया था। लेकिन उन्नीसवीं शती के आरंभ में कुछ मनीषियों द्वारा चलाये समाजोद्धार और पुनर्जागरण आंदोलनों की बदौलत युगीन चेतना में यत्र-तत्र जागृति की लहर दौड़ पड़ी थी। जन चेतना करवट ले रही थी। हरिजनों और दलित जातियों ने अपने ऊपर हो रहे अत्याचार और अन्याय का प्रतिकार करना आरम्भ कर दिया था। दक्षिण में वाइकोम सत्याग्रह जैसे जन आंदोलन ने शूद्रों के मंदिर प्रवेश निषेध मुद्दे को लेकर सवर्णो के विरुद्ध बग़ावत का बिगुल बजा दिया था। क्रांति की यह लहर महाभीषण ज्वाला का रूप लेकर प्रज्जवलित होने लगी थी जिसने सिंहासन पर बैठे सत्ताधारियों को भी हिला दिया था और इस दिशा में सोचने के लिए बाध्य कर दिया था। गाँधीजी की साम्यवादी विचारधारा की सतत प्रेरणा से ट्रावनकोर के महाराजा श्री तीर्थ तिरूनाल ने 1932 में अत्यंत साहसिकता का परिचय देते हुए इतिहास में पहली बार शूद्रों के मंदिर प्रवेश अनुमति उद्घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये थे। हरिजनोद्धार क्रांति के इतिहास में यह एक चिरस्मरणीय कालजयी दस्तावेज़ माना जा सकता है। सम्पूर्ण भारत वर्ष में इस क़दम की भूरि-भूरि प्रशँसा हुई थी और इसका अनुसरण कर कई राज्यों ने मंदिरों के द्वार हरिजनों के लिए खोल दिए थे। लेकिन तेलुगु साहित्य में इस ऐतिहासिक घटना की छिट-पुट चर्चा अवश्य देखने को मिलती है। यह सर्व विदित है कि साहित्य की पहुँच केवल शिक्षित वर्ग तक ही सीमित है और जबकि फ़िल्म ऐसा माध्यम है जो समाज के हर व्यक्ति, हर वर्ग, हर बिंदु, हर कोने तक पहुँचता है और सामाजिक संचेतना को विशाल स्तर पर उद्वेलित करता है! दुर्भाग्यवश तेलुगु सिनेमा इन सामाजिक हलचलों से पूरी तरह उदासीन था। अब तक तेलुगु फ़िल्मकार केवल मिथक और पौराणिक विषयों को लेकर ही फ़िल्में बना रहे थे। अपने सीमित दायरों से बाहर निकलकर सामाजिक मुद्दों को चित्रित करने का जोख़िम किसी ने नहीं उठाया था। रामब्रह्मम वे पहले शीर्षस्थ क्रांतिचेता फ़िल्मकार थे जिन्होंने ज्वलंत सामाजिक अभिशाप अस्पृश्यता के दंश को कथानक का आधार बनाकर 1938 में फ़िल्म बनाई ’मालपिल्ला’। इस विचारोत्तेजक फ़िल्म ने दर्शकों को प्रभावित ही नहीं अभिभूत कर दिया। जातिवाद के अज्ञान-आच्छादित समाज के नभ-मंडल में मालपिल्ला एक ऐसी किरण की भाँति प्रकट हुई जिसने चारों ओर हलचल मचा दी। समाज की दूषित मानसिकता पर प्रहार करने का यह पहला साहसी क़दम था जहाँ रामब्रह्मम को अपार सफलता मिली। इसी कारण तेलुगु फ़िल्म जगत में रामब्रह्मम युग–प्रवर्तक फ़िल्मकार के रूप में जाने और पहचाने जाते हैं जिनका अनुसरण आगे चलकर मादाल रंगाराव और नारायण मूर्ति जैसे सुप्रसिद्ध सिनेमाकारों ने किया। 

1938 में बनाई गई फ़िल्म थी मालपिल्ला! कथानक – तत्कालीन प्रचलित सामाजिक विषमताओं और व्यवस्थामूलक दुराग्रहों का प्रबल विरोध! अतियंत विस्फोटक और ज्वलनशील। एक ब्राह्मण युवक का एक हरिजन युवती से प्रेम और विवाह। पटकथा दी थी तेलुगु के सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी और नारीवादी लेखक चलम ने और सम्वाद लिखे थे प्रसिद्ध चिंतक और विचारक तापी धर्मा राव ने। समसामयिक फ़िल्मों की तुलना में यह फ़िल्म संवाद, रीति, भाषा, निर्देशन की दृष्टि से अनूठी थी। 25 सितम्बर 1938 में फ़िल्म 12 केंद्रों में प्रदर्शित की गयी थी और सफलता की पायदान में सबसे शीर्षस्थ चोटी पर पहुँची। अन्य संवेदन शील मुद्दों जैसे हरिजनों के मंदिर प्रवेश की अनुमति, मानवीय अधिकारों की लड़ाई, पशुबलि उन्मूलन, मद्यपान निषेध इत्यादि को बड़े पैमाने पर चित्रित किया गया था। 

 फ़िल्म का कथानक – 

पटकथा का आधार है एक छोटा सा गाँव कल्याण सुंदरम। पूरा गाँव दो समुदायों में विभक्त, वर्चस्व और श्रेष्ठता का दावा करने वाला ब्राह्मण वर्ग जिसके अधिनायक है शिवालय के धर्मकर्ता कुलदम्भी, सुंदर राम शास्त्री, तो दूसरी ओर निरीह, असहाय, अशिक्षित, ग़रीब, निपट गँवार, आत्मवंचना का शिकार हरिजन समुदाय। पहला दृश्य- कुछ गाँधीवादी कार्यकर्ता गाँव में सेवाग्राम आश्रम की स्थापना कर लोकगीतों से गाँधीजी का दर्शन सहिष्णुता, जातिवाद उन्मूलन,सह अस्तित्व का संदेश जन-जन तक पहुँचाते हैं। प्रथम दृश्य से ही दर्शक को दोनों समुदायों में अवस्थित तनाव की भनक लग जाती है। और यह चिंगारी प्रबल ज्वाला का रूप ले लेती है जब शिवरात्री के पावन पर्व पर, ब्राह्मणों के बनाये नियमों का अतिक्रमण कर गाँव के शूद्रजन हरि दर्शनार्थ मंदिर प्रवेश करने का प्रयत्न करते हुए, अधर्मियों का मंदिर प्रवेश! घोर पाप! धर्म भ्रष्ट हो जाने की आशंका! ब्राह्मण वर्ग कोपावेश में भर जाता है, हरिजनों को घृणा और निर्ममता से दुत्कार दिया जाता है। इस पाप की सज़ा सुनाई जाती है, और वह है- तालाब के पानी को छूने की मनाही! मनुष्य जीवन की आधारभूत आवश्यकता – पानी! नदी, नाले, तालाब, प्राकृतिक सम्पदा है, उस पर किसका अधिकार, किसका वर्चस्व? लेकिन धर्मकर्ता शास्त्री अपनी अमानवीय निरंकुशता तले हरिजनों को दबाना चाहता है, उनसे उनका जीने का अधिकार ही छीन लेने की धृष्टता करता है। हरिजन समाज तिलमिला जाता है, प्यास से लोग तड़पने लगते हैं, कुछ एक के तो प्राण पखेरू भी उड़ जाते है लेकिन धर्मांध शास्त्री अपनी ज़िद पर अड़ा रहता है। सेवा ग्राम के कार्यकर्ता शास्त्री को मनाने की असफल कोशिश करते हैं, लेकिन निष्प्रयोजन, कोई हल नहीं निकलता। गाँव में संघर्ष आरम्भ हो जाता है, हरिजनों का आक्रोश उबलने लगता है, वे ब्राह्मणों से लोहा लेने की ठान लेते है। परिणाम - विद्रोह! खेतों में काम न करने का संकल्प! सेवाआश्रम के कार्यकर्ताओं के सहयोग से अपने हक़ की लड़ाई में हरिजन एकजुट होकर ब्राह्मणों को लताड़ते हैं। तदयुगीन चेतना से दर्शक का प्रत्यक्ष अनुभव, चोट खाये साँप की तरह शास्त्री फुफकारने लगता है, घृणा और हिक़ारत की अग्नि में जलता हुआ हरिजनों पर प्रहार करने के अवसर की प्रतीक्षा में। 

कहानी का दूसरा और प्रधान बिंदु, शास्त्री के पुत्ररत्न का एक हरिजन युवती से विवाह! राम शास्त्री का पुत्र नागराज पढ़ा-लिखा आधुनिक विचार रखने वाला गाँधीवादी नवयुवक है जो माल पिल्ला शम्पावती के प्रेम में बँध जाता है। दोनों के सम्बंध घनिष्ट होते जाते हैं, और दोनों भावनात्मक रूप से एक हो जाते हैं। शम्पावती नागराज की साम्यवादी विचारों से आकर्षित तो हो जाती है लेकिन अपनी जातिगत हीनता उसे हमेशा चुभती रहती है। धीरे-धीरे उनका प्रेम बहिर्गत होता है, फिर क्या, दोनों वर्गों में भूचाल उपस्थित हो जाता है। राम शास्त्री हक्का-बक्का रह जाता है, पुत्र का ऐसा दुस्साहस! ब्राह्मण होकर नीच कुल की युवती से सम्बंध! कुल प्रतिष्ठा का सत्यानाश! दोनों ओर से दबाव पड़ता है, लेकिन प्रेम की अग्नि लगाये नहीं लगती, बुझाये नहीं बुझती, उक्ति चरितार्थ होती है और दोनों प्रेमी युगल गाँव को संघर्ष की आग ने सुलगता छोड़कर कलकत्ता भाग जाते हैं, शास्त्री गम्भीर रूप से चोट खाता है। उसका दुराग्रह सीमा लाँघ जाता है। कलकत्ता जाकर नागराज और शम्पा एक सम्मानीय जीवन जीने लगते हैं। नागराज राष्ट्र की नवीन चेतना का प्रकाश है जो अपने विचारों के तदनुरूप शम्पावती को भी पढ़ने-लिखने के लिए प्रोत्साहित करता है। क्योंकि वह मानता है कि मूढ़ता और अज्ञान के अंधकार को शिक्षा का दीपक ही दूर कर सकता है। 

इधर गाँव में एक आश्चर्यजनक घटना घटती है जो पूरे परिदृश्य को ही बदल देती है। शास्त्री के घर में अचानक आग लग जाती है। पूरा घर धू-धू कर अग्नि में जलने लगता है। शास्त्री की पत्नी आग से घिर जाती है, प्राण संकट में पड़ जाते हैं। मतिशून्य होकर रामशास्त्री सहायता के लिये इधर-उधर भाग-भाग कर चिल्लाने लगता है। ब्राह्मण नज़ारा देखकर भी निष्क्रिय खड़े रहते हैं, पर कोई सहायता का उपक्रम नहीं करता। हरिजन बस्ती में जब आग की ख़बर पहुँचती है, हरिजन हड़बड़ा कर भाग आते हैं। प्रतिशोधात्मक मानसिकता को परे धकेलकर हरिजन आग में कूदकर अपनी जान की परवाह किये बिना शास्त्री की पत्नी के प्राण बचाते हैं। शास्त्री वाकशून्य होकर उनके साहस को देखता रह जाता है। उसका अहम टूट जाता है, घृणा, द्वेष, क्रूरता, कुलाभिमान सब पश्चाताप की अग्नि में जलकर धूम हो जाते हैं। धर्मकर्ता के चरित्र का अकल्पनीय परिवर्तन! एक ऐसा रूढ़ीवादी मूर्ख पिता जो पुत्र के पत्र को पढ़कर, जिसमें शूद्र युवती से विवाह की सूचना दी जाती है, पवित्र गंगा के जल से हाथों का प्रक्षालन करता है- अब आत्म क्षोभ से भर उठता है। पत्र को छूने से ही अपवित्र और धर्म भ्रष्ट होने की आशंका! धर्मांधता की चरम सीमा...! लेकिन आज वही धर्मकर्ता मंदिर का प्रधान पुजारी हरिजनों की निस्वार्थ सेवाभावना के आगे नतमस्तक होकर शिवालय के कपाट उनके लिए भी खोलकर अपने पाप का परिहार करता है। सहर्ष सरेआम अपने पुत्र और शम्पावती का विवाह कराकर पूरे गाँव के आगे अवर्णों को उनके अधिकार वापस दिलाने का संकल्प कर एक स्वस्थ समाज की नींव रखता है। फ़िल्म का यह अंतिम दृश्य दर्शक को रोमांच से भर देता है। 

1938 में एक लाख दस हज़ार की लागत से बनी यह फ़िल्म उस ज़माने की सर्वश्रेष्ठ कलात्मक उपलब्धि थी। फ़िल्म का पार्श्व संगीत दिया था भीमवरपु नरसिन्हाराव ने और मुख्य भूमिकाओं में थे गोविंदराजू सुब्बाराव, कांचनामाला और गल्लि वेंकटेस्वर राव। राष्ट्र्वादी और साम्यवादी विचारों के संप्रेक्षण के लिए संवादों में लोकभाषा का प्रयोग आम जनता में काफ़ी सराहा गया। कहा जाता है कि इस फ़िल्म ने ऐसी धूम मचाई कि अधिकार, श्रेष्ठता और वर्चस्व का राग अलापने वाले सवर्ण संप्रदायों के पाँव तले ज़मीन खिसकती नज़र आयी। कहीं-कहीं फ़िल्म का विरोध भी किया गया। कुल मिलाकर कहा जा सकता है मालपिल्ला तेलुगु जगत की युगांतरकारी फ़िल्म थी। 
                      


 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कहानी

पुस्तक समीक्षा

यात्रा-संस्मरण

स्मृति लेख

साहित्यिक आलेख

सिनेमा और साहित्य

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं