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कृतियों की तत्वान्वेषी अंतर्यात्रा : ’सृजन का अंतर्पाठ’


समीक्षित पुस्तक: सृजन का अंतर्पाठ
लेखक: बी.एल. आच्छा
प्रकाशक: रचना प्रकाशन, जयपुर
प्रकाशन वर्ष: 2021
मूल्य: 109₹ (सजिल्द)   

संवेदना साहित्य का मूलाधार है, तो समीक्षा आलोचनात्मक प्रज्ञा से रचना के अंतस्तनावों के केंद्र में जाकर उसकी अंतरंग विशिष्टता को सहृदय पाठक वर्ग तक पहुँचाने का एक सशक्त माध्यम मानी जा सकती है। ‘सृजन का अंतर्पाठ’ में हिंदी प्रेमियों के जाने-माने समालोचक एवं व्यंग्यकार बी.एल.आच्छा द्वारा हिंदी की अनेक चर्चित कृतियों की रचनात्मक समीक्षाएँ हैं, जो रचनाकारों के समग्र जीवन परिदृश्यों को समेटती हुई कृति की मूल चेतना को काव्यशास्त्र की अवधानतापूर्वक पाठ पद्धति पर अवलम्बित उनकी नवीन तत्वान्वेषी दृष्टि से व्याख्यायित करती हैं। विभिन्न रचनाओं के कथ्य की प्रकृति, बुनावट, भाषा, शैली, सामाजिक सरोकार और युग संपृक्क्तता पर लिखी इनकी समीक्षाएँ एक नवीन प्रतिमान ही नहीं गढ़तीं, बल्कि रचनात्मक सृजन यात्रा को नवीन आयामों में विश्लेषित करती हैं। कृतियों से पाठक को साक्षात्कार कराने की इस अंतर्यात्रा में ऐसी पैंतीस समीक्षाएँ हैं जो साहित्य की विभिन्न विधाओं से सम्बंधित हैं। इनमें कहानी, कविता, नाटक, लघुकथा, व्यंग्य, और आलोचना को समुचित दृष्टि और स्थान मिला है। समीक्षक ने पुस्तक के प्राक्कथन में ही स्वीकार किया है कि ये सभी समीक्षाएँ हिंदी की लब्ध प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित की जा चुकी हैं, जिनमें कृतियों की मूल संवेदना को यथार्थ के धरातल पर विश्लेषित कर तार्किक आधार देते हुए वैचारिक द्वंद्व के साथ प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक का कलेवर बेहद विस्तृत है, जहाँ कृतियों के तत्वान्वेषण में विधागत विशिष्टताएँ को नेपथ्य में निरंतर सक्रिय रखा गया है।

समीक्षाओं के अंतर्पाठ का आरंभ यायावरीय प्रवृत्ति लेखक महापंडित राहुल सांकृत्यायन के 'घुमक्कड़ शास्त्र 'से होता है, जहाँ घुमक्कड़ों की लक्ष्यधर्मी प्रेरणाओं को उनकी सहजता में उकेरा गया है। इसमें घुमक्कड़ों का जाति-गत टकराव–जुड़ाव, शत्रुता–सहकार, उनकी सामाजिक और आर्थिक संरचना,भौगोलिक, ऐतिहासिक व सांस्कृतिक गत्यात्मक अवधारणाओं की शास्त्रीय विवेचना और स्थापना की गई है। पुस्तक की शोध-परक समीक्षाओं में पारम्परिक चिंतन और आधुनिक प्रगतिशील दृष्टि का अद्भुत समाकलन मिलता है। चाहे वो ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित हजारीप्रसाद द्विवेदी के उपन्यास 'अनाम दास का पोथा' हो या धर्मपाल अकेला का नाटक ’प्रजा ही विष्णु है’ हो, इनमें क्रमशः उपनिषदीय दर्शन और मिथकीय धारणाओं के साथ तद्‌युगीन प्रथाओं की प्रासंगिकता को सहज सुंदर अभिव्यक्ति मिली है।

समीक्षक स्वयं एक प्रतिष्ठित व्यंग्यकार हैं, इसलिए व्यंग्यपरक साहित्यिक रचनाओं के विश्लेषण में व्यंग्य-विधा उनकी तत्वान्वेषी दृष्टि से अलक्षित नहीं रह सकती थी। पुस्तक में तीन व्यंग्यात्मक संकलनों और हरिशंकर परसाई के कृतित्व पर विस्तृत समीक्षाएँ लिखी गई हैं, जो व्यावहारिक विश्लेषण में ‘परिहासमयी छलांगों में व्यंग्यों का कोलाज’ बना देती हैं। अंतर्पाठ में राजनीति में विकृत व्यवस्थाओं से मुठभेड़ करते हुए व्यंग्यों को ही स्थान दिया गया है, जिनकी समीक्षा तीखी सधी हुई और धारदार बन पड़ी है। शशांक दुबे, पिलकेंद्र अरोरा, शांतिलाल जैन और हरिशंकर परसाई के व्यग्यों की समीक्षाओं में बिगड़ते सामाजिक समीकरणों पर इनकी दृष्टि बेबाक, सटीक, सजग और सामाजिक जड़ता पर प्रहार करने में सक्षम है। राजनीति और समाजशास्त्र कसे लक्षित व्यंग्यों में चित्रित ‘व्यवस्था के जाल में फँसी दलाल संस्कृति’ का प्रभावी चित्रण इन समीक्षाओं में जीवंत रूप से उभर कर आया है।

सृजन का अंतर्पाठ में बी .एल आच्छा का कई दशकों का रचनात्मक उद्यम फलीभूत हुआ है,जहाँ इन्होंने साहित्य के हर एक विधा के रचनाकार पर अपनी विश्लेषणात्मक क़लम चलाई है। कहानी संग्रहों में निर्मल वर्मा के 'कव्वे और कालापानी 'की कहानियों के कलात्मक उत्कर्ष के साथ-साथ उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता से सम्पृक्त लेखन की संवेदनशील समीक्षा प्रस्तुत की गई है, जहाँ समीक्षा का आधार एक सहृदय पाठक ही रहा है। इनकी कहानियों में भाव और भाषा के युग्म को एकीकृत करने की अद्भुत क्षमता को समीक्षक ने बिम्बात्मक रूप से पाठक के सामने परोसा है, जो पढ़नेवाले को चमत्कृत कर देता है। पुस्तक में इन्होंने उसी सर्जनात्मक लेखन को ही लिया है जिसमें लीक से हटकर जीवन संदर्भों को यथार्थ से प्रणीत कर मानव संवेदना की उष्मा को मुखर रूप व्याख्यायित किया गया है। इसी शृंखला में सत्येन कुमार और सूर्यकांत नागर की कहानियों की समीक्षाएँ भी हैं, जिनमें सामाजिक मूल्यों के आस्थामय परिदृश्य को मनोवैज्ञानिक निकषों पर कसा गया है। एक लोकसंवेदी लेखक के नाते इन समीक्षाओं में स्वयं लेखक की सर्जनात्मक प्रवृति की भाव प्रणवता भी उभर कर आई है।

कविताओं की समीक्षा का कैनवास विस्तृत है जहाँ रचनाओं की काव्य चेतना और भाषा संप्रेषण के हर एक अंग को पूरी तन्मयता और युगीन मूल्यचेतना से विश्लेषित किया गया है। द्विवेदी युगीन कवि सैय्यद अमीर अली मीर के खंड काव्य 'बूढ़े का ब्याह' में अनमेल विवाह और सामाजिक विसंगतियों पर गहरा प्रहार है। छायावादोत्तर काल के क्रांतिकारी कवि बालकृष्ण सर्मा 'नवीन' की कविताओं से आरंभ कर छायावादी, प्रगतिशील, प्रयोगवादी कवियों को समेटते हुए अधुनातन परिदृश्य में अर्वाचीन संदर्भों को चित्रित करती हुई धर्मवीर भारती की 'कनुप्रिया' सहित जयकुमार जलज, दुर्गाप्रसाद झाला, राकेश शर्मा, कृष्ण कमलेश आदि के संग्रहों की कविताओं की समीक्षाओं में उनकी नवोन्मेषी दृष्टि अत्यंत सराहनीय बन पड़ी है। आत्म बलिदानी उद्वेगों और वैचारिक सक्रियता के काव्य का सर्जक बालकृष्ण नवीन हों या ‘रागात्मकता और आधुनिकता’ के चितेरे कवि धर्मवीर भारती हों, अंतर्पाठ की समीक्षा कवि के बौद्धिक चिंतन और क्रियात्मक संदेश को भली-भाँति पाठक तक संप्रेषित कर देती हैं। व्यंग्यकार की अंतर्वर्ती धारा व्यंग्यालोचन में भुक्तभोगी अवसरवादिता हो या कृत्रिम औपचारिकताओं में छिपे दम तोड़ते संस्कारों का शहरीकरण जैसे अनेक विषयों पर मारक और विश्लेषणपरक समीक्षाएँ अत्यंत तीक्ष्ण बनकर उभरी हैं। फिर हास्यरसाचार्य के रूप में विख्यात कुंजबिहारी पांडेय की कविताएँ कैसे बची रह सकती थीं? यहाँ चुटकुलों, संवेदना, भावुकता, रंजनपरकता जुमलों से भरपूर खिलखिलाती समीक्षाएँ अत्यंत रोचक और आकर्षक बन पड़ी हैं। इनकी प्रयोगधर्मिता भी अत्यंत सराहनीय है। इस पुस्तक में किन्नर विमर्श जैसे संवेदनशील मुद्दों पर लिखी गई पारस दासोत की लघुकथाओं पर भी यथार्थपरक मार्मिक विवेचना मिलती है।

राष्ट्रीय सांस्कृतिक जागरण की भावभूमि पर आधारित प्रसिद्ध गीतकार प्रदीप के छायावादी गीतों पर भी इनकी क़लम चली है। श्रीआच्छा शुरू से ही कल्पना और वायवीलोक के चितेरे समीक्षक नहीं बल्कि सामाजिक यथार्थ केंद्रित वैचारिक संस्पर्श के साथ चले हैं। कविता की काल्पनिक भावभूमि इनकी रचनात्मकता का कभी क्षेत्र न बन सका। इनका झुकाव युगबोध पर आधारित यथार्थ की ही पैरवी करता रहा है। लेकिन यहाँ कवि प्रदीप के साहित्यिक गीतों की समीक्षा में इन्होंने कवि के नवीन युगबोध की झंकार और नवजागरण के स्वरों को अत्यंत भाव प्राणवत्ता और संवेदनशीलता से चित्रित किया है। इन गीतों की समीक्षा पढ़ने के बाद कभी भी अनुभव नहीं होता कि आप केवल गद्यकार ही हैं। यहाँ काव्यगत सूक्ष्म संवेदनाओं और अनुभूतियों की अत्यंत मार्मिक गहरी सघन अभिव्यंजना की गई है, जो पाठक को भीतर तक झकझोर देती है।

यों यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि इन समीक्षाओं में कला, समाज, संस्कृति, परिवेश का सांगोपांग विश्लेषण सहज और सरलता से पाठक को मिल जाता है। कृतियों का मूल्यांकन निष्पक्षता से समीक्षित कृतियों की संवेदना और उसके सामाजिक सरोकारों से लक्षित है। समीक्षाओं में कहीं भी इन्होंने अपनी विचारधारा को पाठक पर आरोपित करने का प्रयास नहीं किया है, जो इनकी असाधारण विदग्धता का परिचायक है। समीक्षक के भाषा व्यवहार का सौष्ठव भी समूची पुस्तक में विशेष आकर्षण का केंद्र है। भाषा का सामाजिक जीवन से अंतःसंबंध कितनी गहराई से होता है, इनकी समीक्षाएँ पढ़कर स्वतः ही समझ में आ जाता है। कथ्य में भाषा का मानक रूप हो या प्रादेशिक बोलियाँ, आश्चर्यजनक रूप से उसको उसी रंग में सजीवता और प्रांजलता से पाठकों को परोसा गया है, जो उनकी भाषागत घनत्व व गवेषणात्मक शोधपरक दृष्टि के साथ-साथ लोक भाषाओं में इनकी पकड़ का साक्ष्य है। और यह इन समीक्षाओं में सायास नहीं बल्कि सहज अनुभूतिजन्य सा प्रतीत होता है। इसी कारण ये समीक्षाएँ नितांत नीरसता के दोष से बचकर अपनी भावात्मक ऊर्जा और वैचारिक तेजस और रचनाकेंद्रित भाव-भाषा के कारण सजीव और जीवंत रचना के सदृश बन गई हैं। 

बी.एल. आच्छा एक विख्यात साहित्यकार हैं। देश के प्रमुख साहित्यकारों की सूची में इनका नाम शीर्ष पर विराजित है। मूलतः ये व्यंग्यकार हैं, लेकिन साहित्य की सभी विधाओं में, कविता को छोड़कर, इनकी क़लम चली है। इन्होंने कई पुस्तकों का संपादन किया है। कई पुरस्कारों और सम्मानों से सुसज्जित आच्छा जी की दीर्घ रचनात्मक यात्रा का समेकित प्रतिरूप है ‘सृजन का अंतर्पाठ'; जो उनके प्राध्यापकीय जीवन, साहित्यिक अनुभवों से संपूरित समाजशास्त्रीय दृष्टि और विश्लेषण क्षमता को तत्वान्वेषी दृष्टि से व्याख्यायित करती है। हिंदी आलोचना और समीक्षा के कई प्रतिमान हैं, मानदण्ड है, कसौटियाँ है। लेकिन आच्छा जी ने इन रचनाओं के अआभ्यांतर विश्लेषण में शास्त्राधारित पद्धति में कृति और कृति की भाषा केंद्रित दृष्टि का संधान किया है, जिसे इन्होंने प्राक्कथन में ‘अवधानता पूर्वक काव्यपाठ’ के नाम से स्वीकारा है। भारतीय काव्यशास्त्रीय चिंतन में  रचना केंद्रित काव्यपाठ पद्धति के आधार पर कृति का विश्लेषण किया जाता है। अंतर्पाठ की रचना यात्रा से गुज़र कर पाठक को अनुभव होता है जैसे वह हर रचना का साक्षात्कार कर रहा है। इस पुस्तक में समीक्षाओं के साथ-साथ आच्छा जी द्वारा लिया गया एक साक्षात्कार भी उपलब्ध है, जहाँ इन्होंने विक्रम विश्वविद्यालय के आचार्य एवं जायसी सहित सूफ़ी काव्य के मर्मज्ञ डॉ. शिवसहाय पाठक से उनकी लेखकीय यात्रा के सम्बंध में विस्तृत चर्चा की है। इतना ही नहीं प्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी से इनकी अंतरंग बातचीत और आत्मीयता से भरा इनका संस्मरण पाठकों को अभिभूत कर देता है।

लेखक का भाषा पर असाधारण अधिकार, प्रवाहमयी आकर्षक शैली और कथ्य संप्रेषण की अद्भुत प्रतिभा इन लेखकीय समीक्षाओं को एक उन्नत फलक पर आरूढ़ कर देती है। यही इस पुस्तक की विशेषता भी है और विशिष्टता भी। निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि यह रचनात्मक समीक्षाएँ हर साहित्य के प्रेमी के लिए संग्रहणीय हैं। केंद्रीय हिंदी निदेशालय, दिल्ली द्वारा वित्तीय सहायता के कारण दो सौ से अधिक पृष्ठों वाली इस सजिल्द पुस्तक का मूल्य भी न्यूनतम है।

समीक्षक: डॉ. पद्मावती
सहायक आचार्य-हिंदी
आसन महाविद्यालय
चेन्नई (तमिलनाडु)

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टिप्पणियाँ

डॉ सुरभि दत्त 2021/11/11 08:37 AM

प्रसिद्ध साहित्यकार व्यंग्यकार आच्छा जी की विलक्षण कृति काव्य सृजन का अंतर्पाठ'की डा पद्मावती जी आपने सुंदर शब्दों से गठित उत्कृष्ट समीक्षा द्वारा हमारे समक्ष संपूर्ण समीक्षाओं की व्याख्या रख दी है। आप के माध्यम से आच्छा जी के साहित्यिक योगदान के दर्शन हुए । कृति को पढ़ने की उत्सुकता बढ़ गई है। सुंदर सविस्तार समीक्षा के लिए आप को हृदय से बधाई।

डॉ वी गीता मालिनी 2021/11/08 09:46 PM

उपर्युक्त टिप्पणी में 'सृजन का अंतर्पाठ’ सही है, typo error के लिए क्षमा करें।

डॉ वी गीता मालिनी 2021/11/08 09:41 PM

अद्भुत अतिउत्तम समीक्षात्मक लेख मैम। आच्छा जी कृत काव्य सृजन का अंतर्पाठ' का सार हमारे समक्ष प्रस्तुत कर आपने लेखक के साहित्य सृजन की व्यापक और महत्वपूर्ण योगदान से अवगत कराया है। उनका साहित्य नवलेखकों के लिए प्रेरणादायक है और आपकी समीक्षा ने इसी तथ्य को सिद्ध किया है। ये मेरा सौभाग्य है कि मुझे आपके द्वारा आच्छा जी की पुस्तक को जानने और समझने का अवसर मिला। बढ़िया बेहतरीन समीक्षा के लिए आपको ढेर सारी शुभकामनाएं और हृदय से आभार मैम ।

Dr. Sushila Navik 2021/11/08 07:29 PM

बहुत ही बढ़िया व उच्च कोटि समीक्षा है,साहित्य के हर विधा क्रमवार उत्कृष्ट समीक्षा, अति उत्तम मैडम

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