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हुगली के आर-पार

 

यायावरी गुण है या दोष, ये तो ईश्वर जाने। इस रोग से ग्रसित हम इस बार निकल पड़े पूरब में बसे महानगर की ओर—कलकत्ता। मई का महीना और इस बार यात्रा भी निर्णीत थी और सुनियोजित भी। लीक से बिलकुल हट कर। दिन सीमित भी थे और योजनाबद्ध भी। और यह भी न था कि हम पहली बार कलकत्ता आ रहे हो। आख़िर दीदी का घर है यहाँ, तो आना लगा रहता था लेकिन हाँ, इस बार की यात्रा पर लिखने का मन बन गया। यूँ कहें तो परम्परा और इतिहास की धरोहर कलकत्ता महानगर के कुछ गिने-चुने स्थलों का शाब्दिक दर्शन। वैसे तो हमारी यात्राएँ प्राकृतिक दृश्यों का आस्वादन लेते हुए सड़क द्वारा ही तय की जाती हैं लेकिन इस बार हवाई यात्रा की गई बादलों के हिंडोले पर बैठ कर। कहने को तो ढाई घंटे का सफ़र था लेकिन पूरा आधा दिन खा गया यह ‘ढाई घंटे का सफ़र’ और ऊपर से शरीर की जकड़न भी दे गया। चलो फिर भी सही सलामत पहुँच गए घन आबादी से पटे हुए महानगर ‘कलकत्ता’। आधा दिन तो विमानी यात्रा को भोग लगा और बाक़ी आधा दिन शारीरिक थकान को। तो घूमने का कार्यक्रम अगले दिन तक स्थगित हुआ। कलकत्ता की गर्मियों की एक विशेषता हमने यह भी पाई कि कभी-कभार अचानक दोपहर को ही बेमौसम आसमान में बादल घिर जाते हैं, शाम से पहले रात हो जाती है। और फिर शुरू होता है बादलों का घमासान गर्जन और तड़तड़ाती बिजली का टूट कर कर्णभेदी आवाज़ से धरती को हिला देना। फिर मूसलाधार बारिश से जल थल का एक हो जाना और फिर अगले दिन सब सामान्य। यह प्रक्रिया अधिकतर उन्हीं प्रदेशों में देखी जा सकती है जो समुद्री तट के काफ़ी क़रीब होते हैं। रात जमकर बरसात हुई और बिजली की गड़गडाहट से वातावरण थर्रा उठा। 

अगली सुबह दिन बहुत जल्दी निकल आया। आँख खुली तो पाया रात का बादामी अँधेरा तो कब का कूच कर गया है और सूरज की गुलाबी लालिमा भी गहरा कर अपना रंग छोड़ रही है। सोचा छह बज गए होंगे और आज बिस्तर नहीं छूटा अब तक पर घड़ी को देखा तो विश्वास नहीं आया। अभी चार ही बज रहे थे। फिर ध्यान आया कि अरे हाँ! हम तो पूरब में है और गर्मी के मौसम तो सूर्य भगवान और भी सक्रिय हो कर समय से पहले ही अपनी धमक दिखाने लगते है। ऊषा काल की प्रदीप्ति के दर्शन करने हों तो यहाँ चार बजे ही उठना होगा। हम यह दृश्य खोना नहीं चाहते थे तो झटपट तैयार होकर निकल पड़े वॉक पर और पड़ाव था–सॉल्ट लेक सेंट्रल पार्क—‘बन-बितान’ (वन-वितान) सार्वजनिक उद्यान। ये तो कल रात देर तक गिरती बारिश का ही चमत्कार था जो आज सुबह मौसम काफ़ी ख़ुशनुमा सा हो गया था भले कुछ घंटों के लिए ही सही क्योंकि रात बारिश की वीभत्सता के कारण सूर्य का रथ पूरी रफ़्तार से अभी आगे न बढ़ा था और उसके तांडव में अभी देरी थी। आज पार्क का प्रवेश भी मुफ़्त था यानी टिकट नहीं थी वरना छुट्टी के दिनों में यहाँ अंदर जाने के लिए टिकट लगती है। ताज़ी हवा फेफड़ों में भरते तारकोल की लम्बी पगडंडी से हम पार्क के भीतर चले। 

अंदर जहाँ तक दृष्टि जाती वहाँ तक हरियाली बिखरी हुई थी। इंद्रधनुषी रंगों की छटा देखते ही बनती थी। प्रकृति के सारे रंग आज एक साथ देखने को मिल गए थे। नीचे दूर तक पसरी हरितमा और ऊपर आकाश की गुलाबी लालिमा में उड़ते सफ़ेद सारस की लंबी क़तारें, गीले गले पत्तों से पटी हुई पगडंडियाँ, पार्क के बीचों-बीच विशाल परिसर में फैली झीलों की नीली गुलाबी आभा में तैरती सफ़ेद लाल बतखों के झुंड, डालियों पर रंग-बिरंगे पंछियों का कोलाहल-काफ़ी लुभावना माहौल था। विशाल घने पत्तों के आवरण में छिपे पंछियों का चहचहा कर स्वागत करना हमें आह्लादित कर गया। हरे-हरे पत्तों पर ठहरी ओस की पारदर्शी बूँदों पर उगते सूर्य की रक्तिम किरणों की रश्मियाँ जुगनुओं की भाँति चमक रही थी जैसे पत्तों पर किसी ने मोती सजा दिए हों और हल्की सी भी हवा चलने पर बड़ी नज़ाकत से वे झुक कर धीमे से उन्हें नीचे ढकेल दे रहे थे मानो उनका भार न ढो पा रहे हों। पत्तों के कोरों से गिरती पानी की लड़ियाँ मिट्टी को गमका रही थी। गीली मिट्टी की सौंधी महक से नथुने झनझना उठे। सोने पे सुहागा मंद पवन के हल्के-हल्के झोंकें रात भर की अलसाहट को दूर कर मन और शरीर को तरो-ताज़ा ही नहीं बल्कि सुबह-सवेरे की मीठी नींद को खो देने के अपराध-बोध को भी मिटा देने में कारगर साबित हो रहे थे। यहाँ हर वृक्ष पर चिपकियाँ लगी हुई हैं जिस पर उस वृक्ष की प्रजाति का नाम और विवरण लिखा हुआ है। चारों तरफ़ हरियाली और कई जल निकायों से आवृत यह उद्यान सुबह की सैर और प्रकृति प्रेमियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। उद्यान काफ़ी विशाल है और कई छोटी-छोटी झीलों और पक्षियों से आवृत भी। कुछ देर इन मन्त्र मुग्ध दृश्यों का आनंद लेते हुए टहलने पर आप पाएँगे एक और अप्रतिम नज़ारा—रोज़ गार्डेन। 

झील के पार गुलाब के पौधों का घना आवरण। हर तरफ़ गुलाब ही गुलाब–हर रंग के गुलाब, हर क़िस्म के गुलाब, चटकीले और शोख़ रंगों की बहार। इतने रंग कि रंगों की गिनती ही भूल जाएँ। चारों ओर मदमाती गुलाबों की सुगंध। इन अनगिनत क़िस्म के गुलाब की प्रजातियों को प्रबंधन ने कुशल प्रशिक्षित हाथों द्वारा संरक्षित करवा कर उद्यान की गरिमा को बनाए रखा है। अद्वितीय नज़ारा। आगे चलकर मिला एक और आकर्षण—रंग-बिरंगी तितलियों का—बट्टरफ्लाई गार्डेन। खिले गुलाबों पर उड़ती रंग-बिरंगी तितलियाँ। इस चुम्बकीय दृश्य के आनंद को तो वही अनुभूत कर सकता है जिसमें सुबह सवेरे की नींद के मोह को त्यागने का आत्मिक बल हो। बड़ी संकल्प शक्ति चाहिए सवेरे जागने के लिए। ठंड के मौसम में तो इस बल की अग्नि परीक्षा होती है। ख़ैर . . . प्रकृति के इस अनुपम सौंदर्य का आँखों से रसास्वादन कर हमने गाड़ी मँगवाई और निकल पड़े अगले गंतव्य की ओर-

बेलूर मठ-रामकृष्ण मिशन का मुख्यालय:

हुगली नदी के पश्चिमी तट पर स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित यह भव्य ऐतिहासिक इमारत कलकत्ता का प्रमुख पर्यटक स्थल ही नहीं बल्कि सर्व धर्म सम भाव से आप्लावित हमारी सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है। चालीस एकड़ का विशाल प्रांगण, मुख्य द्वार का मुखौटा बौद्ध स्थापत्य कला पर आधारित है जो आपको अनायास ही अजंता और एल्लौरा की गुफाओं का स्मरण करा देगा। अंदर प्रवेश होते ही मठ की राजसी आभिजात्य इमारत देख कर आप मंत्रमुग्ध हो जाएँगे जहाँ मुग़लकालीन वैभव और आलीशान राजपूताना ठाठ का सम्मिश्रण आपको चकित कर देगा। विविध स्थापत्य कलाओं के संगम का अद्भुत नमूना माना जाता है बेलूर मठ जिसे स्वामी विवेकानंद ने देश-विदेश के शिल्प को निगमित कर एक विलक्षण रूप दिया है। व्यवस्थित और सुनियोजित फूल-पौधों की क़तारें, चारों ओर हरे घास के विशाल मैदान और उसके बीचों-बीच खड़े आलीशान भव्य भवन का दृश्य आपको स्तंभित कर देगा। वैसे तो उस विशाल प्रांगण में कई भवन है लेकिन मठ की इमारत शोभायमान और विशेष आकर्षण का केंद्र है। फूलों से सुसज्जित पगडंडियों से चलकर सर्वप्रथम आप उस द्विमंजिला संग्रहालय तक पहुँचेगे जहाँ रामकृष्ण परमहंस की जीवनी की अनुकृति को जीवंत तरीक़े से सहेज कर रखा गया है। अंदर आप उनके जीवन का प्रत्यक्ष साक्षात्कार कर लेंगे। उनके जीवन से सम्बंधित कई चीज़ों को साक्षात्‌ देख पाएँगे। उन ऐतिहासिक पुरावशेषों में रामकृष्ण परमहंस का प्रस्तर पात्र जिसमें वे पायस ग्रहण किया करते थे, अपने प्रिय शिष्य विवेकानंद पर शक्तिपात करने का दृश्य, उनका घर, उनका कमरा जहाँ उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दिन व्यतीत किए थे, उनका शयन कक्ष, उनका बिस्तर, उनका तकिया, पंचवटी में निर्मित उनका ध्यान मंदिर इत्यादि उनके जीवन से जुड़ी अनेक स्मृतियों की अनुकृतियाँ इतनी जीवंत रूप में दिखाई देती है कि हम कालातीत अनुभूति में डूब जाते है। एक अनिर्वचनीय अनुभूति। मनो मस्तिष्क को स्पंदित करने वाली ऊर्जा। ज्ञान भक्ति और दर्शन की संश्लिष्ट चेतना के शक्ति पुंज की आध्यात्मिक ऊर्जा का साक्षात्‌ अनुभव करने की इच्छा हो तो निश्चित रूप से इस स्थल का दर्शन एक समाधान है। 

मठ के बीचों-बीच अपनी दिव्य छटा बिखेरता दर्शन देगा मध्य युगीन स्थापत्य शैलियों से समाविष्ट सार्वभौमिक आस्था को दर्शाता वह भव्य शिल्प मंदिर जहाँ भगवान रामकृष्ण परमहंस के मृत शरीर के अवशेषों को प्रतिष्ठापित किया गया है। यही बेलूर मठ का मूल भवन है जहाँ सहस्र कमल दलों पर उनकी संगमरमर से बनी प्रतिमा स्थापित की गई है। 

भवन की उदात्त बुलंद गुबंदाकार छत, कक्ष की नक़्क़ाशीदार खिड़कियाँ, शांत स्निग्ध परिसर, क़रीने से बिछी दरियों पर बैठे ध्यानमग्न लोग, जलती धूपबत्ती से निकलने वाली दिव्य सुगंध, उनकी प्रतिमा से निकलते अलौकिक तेज का चुम्बकीय आकर्षण दर्शक को अनायास ही सम्मोहित कर देता है। ऐसा लगता है यह प्रदेश आज भी साँस ले रहा है। उस अखंड प्रभा की तरंगों से आच्छादित यह कक्ष उनकी जीवंतता का साक्षात्‌ अनुभव करा रहा था। उस दायरे में प्रवेश व्यक्ति की चेतना स्वतः ही ऊर्जस्वित हो जाती है। जीवन की आपा-धापी से कुछ क्षण अगर मुक्ति पाने की इच्छा हो तो कुछ समय यहाँ ध्यानमग्न होकर बैठना एक सुखद विकल्प है क्योंकि यहाँ प्रयास की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। मन स्वतःशांत हो जाएगा। यह ध्यान मंदिर हमारी धार्मिक समरसता का प्रतीक तो है ही साथ-साथ उसकी स्थापत्य शैली की विलक्षणता हमारी सनातनी सभ्यता की अद्भुत मिसाल है। 

तो अवसर का लाभ उठाते हुए कुछ क्षण हमने भी ध्यानमग्न होकर बिताए और फिर चले उसी परिसर के पिछवाड़े में बहती गंगा मैया के दर्शन करने। 

शांत बहती गंगा का तट। सामने स्वामी विवेकानंद का मंदिर और माँ शारदा का मंदिर जहाँ उनके अवशेषों को रखा गया है। उसके सामने विल्व वृक्ष, स्वामीजी का स्वस्थान जहाँ वे घंटों ध्यान मग्न होकर बैठा करते थे। यह वही स्थान है जहाँ स्वामीजी ने अंतिम साँस ली थी। वहीं उनके कुछ शिष्यों का भी अंतिम संस्कार किया गया था। उस हर स्थान पर आज घने वृक्षों से आवृत चबूतरे बने है जहाँ प्रवेश प्रतिबंधित है। 

मठ के परिसर में कुछ दूरी पर स्वामी रामकृष्ण का विशाल भोजनालय है जहाँ हर दिन सैंकड़ों लोगों को भोग मिलता है। दोपहर हो गई थी और उदर में स्थित भगवान विचलित हो रहे थे। तो फिर चले छोटी सी बैटरी चालित रेलगाड़ी में भोजन स्थल पर। हमें ध्यान मंदिर में दर्शन के बाद रास्ते में ही भोजन के टिकट दे दिए गए थे। विशाल भोजनालय के कक्ष में साफ़ सुथरी दीवार पर फूल मालाओं से सुसज्जित स्वामी रामकृष्ण और माँ शारदा की बड़ी सी तस्वीरें टँगी थी। 

विशाल भोजनालय 

लंबी-लंबी क़तारों में थालियाँ सजी हुई थीं। भोजन परोसा गया। गरम–गरम भात, खिचड़ी साथ में टमाटर की चटनी। घी की महक से भोजनालय गमक रहा था। खिचड़ी इतनी गरम कि उँगलियाँ जल जाए और इतनी स्वादिष्ट तो पहले कभी न चखी थी। फिर आई गोविंद भोग के चावलों से बनी खीर की ट्रॉली। दरअसल बड़े-बड़े भगोनों को ट्रॉली की सहायता से लाकर परोसा जा रहा था। न भूतो न भविष्यति। खीर खाकर लगा अमृत भी शायद ऐसा ही होता होगा। सच में, आनंद आ गया। चारों ओर दृष्टि दौड़ाई। सैंकड़ों लोग भोग लगा रहे थे। यह दृश्य देखते ही अनायास स्वामी विवेकानंद जी की जीवनी ‘ऑन हिमसेल्फ़’ का स्मरण हो आया। स्वामीजी के जीवन की अद्भुत और प्रामाणिक जानकारियों का दस्तावेज़ है यह पुस्तक।

‘ऑन हिमसेल्फ’ का एक उद्धरण यहाँ देना आवश्यक भी लग रहा है जिसमें स्वामीजी अपने संन्यास के आरंभिक दिनों का वर्णन करते लिखते हैं, “There have been days when Math was without a grain of food, if some rice was collected by begging, there was no salt to take it with! Boiled bimba leaves, rice and salt-this was the menu for a month at a stretch. Oh, those wonderful days” (पृष्ट संख्या-74-ऑन हिमसेल्फ़) 

(पाठकों से अनुरोध है कि अगर इस महान संत के बारे में जानने की जिज्ञासा हो यह पुस्तक अवश्य पढ़े) 

और यह मठ आज हर दिन हर पहर हज़ारों श्रद्धालुओं को भरपेट भोजन उपलब्ध करवा रहा है। वेदांत के अद्वितीय प्रचारक, भारतीय संस्कृति के विशिष्ट उद्घोषक मानवता के महान पोषक एक युग पुरुष की अपने गुरु वाक्य को सत्य सिद्ध करने की संकल्प शक्ति का यह एक अप्रतिम उदाहरण है। इसीलिए कहा जा सकता है कि प्रतिभा जिनकी धरोहर होती है, आदर्श, ज्ञान, विवेक और सयंम जिनके अनुगामी बन जाते है, ऐसा विनयशील व्यक्तित्व ही संत कहलाता है। और ऐसे ही योग्य शिष्य थे परिव्राजक संत स्वामी विवेकानंद। 

इन महान विभूतियों को एक बार फिर प्रणाम कर भर पेट भोजन ग्रहण किया और निकल पड़े अगले गम्य स्थान की ओर–

 विक्टोरिया मेमोरियल। 

शाम हो आई थी। वातावरण शुष्क था। चाय की तलब हो उठी। सड़क के किनारे छोटी सी चाय की डिबरी पर रुके और फिर अदरक की मसालेदार चाय सुड़की तो जान में जान आई। शाम हो और चाय का साथ न हो तो कुछ अधूरा लगता है। फिर चले इस ऐतिहासिक भवन का सौंदर्य देखने के लिए। अंदर जाने के लिए टिकट लगती है। देर हो जाने के कारण मुख्य इमारत के अंदर न जा पाए थे लेकिन चारों ओर घूम कर दौरा किया। ढलते सूरज की हल्की लालिमा में इस भवन का सौंदर्य चार गुणा बढ़ गया था। ऊपर नीला आकाश, नीचे हरे रंग में नहाई धरती और बीचों-बीच अपनी राजसी आभा बिखेरता संगमरमर का यह अद्भुत ऐतिहासिक आश्चर्य। 

महारानी विक्टोरिया के सम्मान में बनाया यह देदीप्यमान आलीशान स्मारक आज एक ऐतिहासिक संग्रहालय के रूप में काम करता है। इंडो-इस्लामिक स्थापत्य कला की विलक्षण प्रस्तर निर्मिति। प्रवेश पर ही लॉर्ड कर्ज़न, रॉबर्ट क्लाइव, चार्टर कॉर्न्वालिस, लॉर्ड डलहौज़ी की विशाल प्रस्तर प्रतिमाएँ औपनिवेशिक काल का स्मरण करा देती है। इसे भारत का सबसे बड़ा संग्रहालय कहा जा सकता है जहाँ ऐतिहासिक अवशेषों, चित्रकृतियों और शोध संबंधी दस्तावेज़ों को संरक्षित किया गया है। विशाल प्रांगण, चारों ओर जल-निकाय और हरे-भरे उद्यानों की सुंदरता चकाचौंध कर देती है। अप्रतिम सौंदर्य का नमूना है विक्टोरिया मेमोरियल! 

अँधेरा गहराया और बत्तियों की दूधिया रोशनी में नहा गया–संगममरीय स्मारक। हरे-भरे मैदान और स्वच्छ पानी के ताल कुंड से इसकी शोभा में चार चाँद लगा रहे थे। इस देदीप्यमान शानदार सौन्दर्य को अलविदा कहा और निकल पड़े ट्राम की सवारी करने। 

आधुनिकता और विरासत का अप्रतिम सामंजस्य अगर कहीं देखने को मिल सकता है तो हमारी दृष्टि में वे हैं भारत के दो महानगर–एक तो मद्रास और दूसरा कलकत्ता। दोनों महानगरों के नाम आज परिवर्तित हो गए है। दोनों बंगाल की खाड़ी के तीर पर बसे है भले ही कलकत्ता समुद्र तट के इतना निकट नहीं जितना मद्रास है लेकिन वातावरण में नमी और आर्द्रता की मात्रा में दोनों प्रदेशों का पैरामीटर उन्नीस बीस समान ही होता है। यह तो मान्य तथ्य है कि दक्षिण अपनी संपन्न सांस्कृतिक छवि, अपने रीति-रिवाज़, तीज-त्योहार, अपना पारम्परिक पहनावा, खान-पान और भाषा के मामले में बहुत अधिकाराना मनोभाव रखता है और इसने अपनी इस छवि को कभी धूमिल नहीं होने दिया जो एक गर्व का विषय है। यहाँ आने पर कलकत्ता नगर में हमने पाया कि इस प्रदेश ने भी अपनी विरासत को सँजो कर रखा है, जिसने हमें विशेष आकर्षित किया, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण है शताब्दियों पुराना इस नगर का ऐतिहासिक यातायात-ट्राम। 

अगर आपके पास समय ही समय है और कहीं जाने की जल्दी भी नहीं है तो आप चिंता मुक्त होकर आराम से इसमें बैठ जाइए और यह बसनुमा रेलगाड़ी सड़कों के बीचों बीच पटरियों पर घंटी बजाती अपनी मंथर गति से धीमी-धीमी रेंगती 360 डिग्री का संपूर्ण परिदृश्य आपको दिखा देगी। सड़क पर बिछी पटरियों का यह नज़ारा शायद ही कहीं और देखने को मिले। एक हुई यह ट्राम और दूसरी ओर एक और विलक्षण दृश्य आपको अचंभित करेगा और वह है—आदमियों द्वारा खींचा जाने वाला रिक्शा। 

साइकिल रिक्शा तो आज भी कई शहरों और गाँवों में देखने को मिल जाएगा लेकिन आदमी द्वारा खींचा जाने वाला रिक्शा? यह तो हमारी पीढ़ी ने या तो सत्यजीत रे की फ़िल्मों में देखा था या अनुरागबासु के टीवी सीरियल में। और ये दोनों यातायात के साधन यूँ कहिए धीमी गति के माध्यम केवल कलकत्ता शहर की एकांतिक विशेषता माने जा सकते है। और वहीं दूसरी ओर आपको अपनी गति से चकाचौंध कर देगी देश की सुपर फ़ास्ट भूमिगत मेट्रो जो पलक झपकते ही आपको आपके गम्य स्थान पर पहुँचा सकती है और वो भी तुलनात्मक रूप से बहुत कम दामों में। आधुनिकता और पुरातनता का संगम। विज्ञान और परंपरा का मिलन। मनुष्य द्वारा खींचे जाने वाले के रिक्शे पर बैठना तो हमारे नियम के ख़िलाफ़ था कि हम बैठे और दूसरा हमारा बोझ ढोये तो हमने दूसरा रास्ता अपनाया। चढ़ बैठे ट्राम में, टिकट कटवाई और कुछ समय बिना निर्णीत गम्य के उसकी सवारी की। लक्ष्यहीन चिंतामुक्त। कभी-कभार लक्ष्यहीन यात्रा भी बहुत आनंद देती है। जीवन में इसका मज़ा भी अवश्य चखना चाहिए। सचमुच मज़ा आ गया। रात हो आई। थक गए थे तो कैब मँगवाई और वापस घर चले। आज के लिए इतना काफ़ी था। 

अगली सुबह तरो-ताज़ा होकर चले दक्षिणेश्वर और काली घाट का दर्शन करने। दिन समाप्ति पर थे और अभी गरियाहाट की शॉपिंग भी बाक़ी थी। कलकत्ता आए और बंगाल कॉटन की साड़ी न ख़रीदी तो क्या ख़रीदा? आने का प्रयोजन सिद्ध करने के लिए भी यह ज़रूरी था। तो कैब मँगवाई और निकल पड़े हुगली के पूर्वी तट पर-दक्षिणेश्वर मंदिर। 

दक्षिणेश्वर मंदिर 

उन्नीसवीं शती में रानी राशमनी द्वारा निर्मित यह मंदिर रामकृष्ण परमहंस की तपोस्थली कहा जा सकता है जहाँ वे पुजारी के पद पर नियमानुसार माँ काली की नित्य नैमित्यिक सेवा किया करते थे। यह वही स्थल है जहाँ वे माँ के दर्शनों की उत्कट अभिलाषा में तन मन की सुधि भूलकर समाधिस्थ हो जाया करते थे। यह भूमि उनकी साधना की फलश्रुति की भूमि है। अत्यंत महिमांवित इस मंदिर के परिसर में रामकृष्ण परमहंस का एक कक्ष भी है जहाँ उन्होंने अपने जीवन के चौदह वर्ष काली माँ की सेवा में व्यतीत किए थे। बंगाली स्थापत्य कला में नवरत्न शैली पर निर्मित यह मंदिर तीन मंज़िला दक्षिणाभिमुखी मंदिर है जिसके नौ शिखर दो मंज़िलों में विभक्त है। मंदिर के गर्भ गृह में माँ काली भवतारिणी के रूप में रजत मंडित सहस्र कमल दल पर महादेव की छाती के ऊपर खड़ी हुई हैं। मुख मंडल पर अलौकिक तेज, नेत्रों में दिव्य करुणा की दीप्ति, दर्शन मात्र से मनोभिलाषा पूर्ण करने वाली पूर्ण कामिनी के दर्शन सौभाग्य से प्राप्त होते है॥मंदिर के पश्चिमी भाग में हुगली के पूर्वी तट पर बारह पूर्वाभिमुखी शिवलिंग अलग-अलग छोटे-छोटे मंदिरों में स्थापित किए गए है। वहीं परिसर में ही पंचवटी का दर्शन अवश्य करना चाहिए जहाँ श्री रामकृष्ण जी ने बारह वर्षों तक कठोर साधना की थी। वहीं सीढ़ियों से होता हुआ लंबा बरामदा मंदिर के आंतरिक भाग से होता हुआ भगवान कृष्ण और राधा जी के मंदिर तक जाता है। मंदिर में उस दिन भीड़ अधिक न थी। दर्शन आसानी से हो गए। माँ के दर्शन कर आशीर्वाद और प्रसाद प्राप्त किया और चल पड़े अपने अगली मंज़िल की ओर लेकिन इससे पहले एक और आवश्यक पूजा शेष थी और वह थी पेट-पूजा। बंगाली लूची का, आलूदम और चने की दाल के साथ आनंद लेना। 

मंदिर के बाहर परिसर में आपको कई छोटे-छोटे भोजनालय मिल जाएँगे जहाँ विशुद्ध बंगाली भोजन को आप चख सकते है और वो भी बहुत ही कम दामों में। मैदा की पूरी को यहाँ लूची कहते है जो चने की दाल और आलू के साथ परोसी जाती है। भूख भी ज़ोरों की और जब सामने गरम-गरम पूरियाँ आई तो बस गिनती कौन करे? मज़ा आ गया। कभी आइए कलकत्ता तो बंगाली लूची खाना न भूलिए। वैसे तो बहुत कुछ है लेकिन हम ठहरे घास-फूस खाने वाले तो आपको शाकाहारी खाने का स्वाद चखाएंगे। और हाँ, अरे फिर बारी आई कलकत्ते के पान की। यहाँ आकर पान न खाया? गाढ़ा हरा पत्ता, आकार में भी बड़ा पर मुँह में रखो तो ऐसा पिघले जैसे मुलायम बर्फ़। और उस पर गुलकंद, सुपारी और क्या कुछ नहीं। इसका तो अपना ही अलग स्वाद है और वो ही जानता जिसने खाया है। 

जिह्वा के सब अनुष्ठान पूरे कर निकल पड़े आगे अगली मंज़िल—गंगा के दूसरी ओर पर बसा काली घाट

तांत्रिक साधना में दश महा विद्याओं को साधा जाता है जिसमें माँ काली की उपासना अत्यंत फलदायी मानी जाती है। 51 शक्ति पीठों में काली घाट की गिनती की जाती है जहाँ माता सती के दाहिने पैर का अँगूठा गिरा था। माँ यहाँ अत्यंत रौद्र रूप में स्थापित है। काला रंग, जाज्वल्यमान तीन नेत्र, सोने की गोल नथनी, सुवर्ण जिह्वा से टपकती लहू की धार—बुरी शक्तियों के मन में भय पैदा कर देती है। दुष्ट दलन और शिष्ट रक्षण-असुर शक्तियों का वध कर भक्तों को अभय दान देती प्रतीत होती है माँ काली। प्रतीकात्मक रूप से मन के विकारों को भस्म कर ज्ञान प्रज्ञा को जागृत कर चेतना को ऊर्ध्व चक्र में स्थापित करना ही शाक्तोपासना है जिसका प्रतिरूप है माँ काली का यह प्रचंड रूप। 

माँ के दर्शन किए और मेट्रो से निकल पड़े धर्मतल्ला-ख़रीदारी के लिए। धर्मतल्ला आएँ तो गुड़ का संदेश कैसे भूल सकते है। 

इसका स्वाद तो बस खाओ तो जानो। मुँह में डालते ही ग़ायब जाता है। अनिर्वचनीय। फिर आई बारी बंगाल के रसगुल्ले की। वज़न की ओर ध्यान न देकर हमने भरपेट पेट पूजा की, मनपसंद मिठाइयाँ बिना किसी अपराध बोध के गटकने के बाद चले गरियाहाट-तात की साड़ियाँ ख़रीदने। 

गरियाहाट पहुँचते शाम गहरा गई और बाज़ार अपने पूरे सुरूर पर पहुँच गया। लोगों का मजमा चला जा रहा था। भीड़ ऐसी कि पूछिए मत। दुकानें जगमगा रही थी। सड़कों पर बिछी ख़रीदारी की तो बात ही अलग। सब कुछ आपको यहाँ मिल जाएगा। तात, ढाकाई, और बंगाल कॉटन। एक से एक ख़ूबसूरत, एक से एक महीन हथकरघे पर बनी साड़ियाँ जो पूरे विश्व में विख्यात हैं। महीन काम और ख़ूबसूरत डिज़ाइन। हमने भी कुछ ख़रीदारी की और फिर निकल पड़े ऐयरपोर्ट की ओर। दिन कैसे निकल गए भान ही न हुआ। भरे मन से वापसी हुई अभी तो बहुत कुछ बाक़ी था देखने को लेकिन जितना देखा स्मृतियों में अंकित हो गया। बाक़ी फिर कभी। 

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