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यात्रा शून्य की

हो प्रज्ज्वलित
मेरे अन्तर्मन में
दिव्य ज्ञान ज्योति
कर कोई ऐसा जतन
ओ मेरे भगवन,

होने दे वह ज्योति
तीव्र व प्रखर
जिससे ज्ञान की किरणें
निरन्तर फूटती रहें
मेरे मन आँगन 
ओ मेरे भगवन, 

होने दे प्रस्फुटित
उस पौधे को
जिसे ज्ञान रूपी
फल लग सके
होने दे वो घटना घटित
जिसके घटने से
घट घट में
ज्ञान फैल सके
ज्ञान जो सफर है
लफ़्ज़ों से ख़ामोशी तक का
चालाकी से मासूमियत तक का
शैतानियत से इन्सानियत तक का

यह यात्रा है वापसी की
एक शातिर दिमाग़ से
नेक और पाक दिल तक की
मस्तिष्क के कारख़ाने से
हृदय के उपवन तक की
समस्त सूझबूझ से शून्य तक की
यह यात्रा है वापसी की

नहीं मालूम मुझे अभी तक
क्या शून्य की तरफ
चलना ही ज्ञान है
क्या फैलाव को छोड़
बिन्दु की प्राप्ति ही ध्यान है
कौन हूँ, क्या हूँ, क्यों हूँ
यह भी तो नही जानता मैं
कदाचित्‌...

इस प्रखर प्रकाश पुँज के आलोक में
स्वयं को पहचान सकूँ
अपने आस्तित्व के
उद्देश्य को पा सकूँ
समस्त विस्तार को त्याग
बिन्दु की तरफ जा सकूँ
शून्य की तरफ जा सकूँ
निर्वाण की तरफ जा सकूँ...........
 

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