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यातायात व्यवस्था नहीं, यातना का सरकारी प्रबंधन

 

टीकमगढ़ की सड़कों पर इन दिनों एक बड़ा दार्शनिक प्रश्न खड़ा है—क्या यहाँ यातायात व्यवस्था है भी, या जनता को यातना देने का कोई सुव्यवस्थित सरकारी प्रबंधन चल रहा है?

शहर की सड़कें देखकर लगता है कि हर वाहन को पूरी स्वतंत्रता प्राप्त है। बाइक जहाँ मन आए खड़ी हो सकती है, दुकान जहाँ तक मन करे सड़क तक फैल सकती है और अतिक्रमण को ऐसा स्थायी अधिकार प्राप्त है, जैसे सड़क उसी के नाम दर्ज हो। आम आदमी को बस इतनी स्वतंत्रता है कि वह इन सबके बीच से अपना रास्ता खोजता रहे।

फिर आता है 15 अगस्त। अचानक प्रशासन को याद आता है कि सड़क नाम की भी कोई चीज़ होती है और उस पर यातायात नाम की कोई व्यवस्था भी होनी चाहिए। ख़ाकी वर्दियाँ दिखाई देने लगती हैं, सरकारी वाहन सक्रिय हो जाते हैं और कुछ घंटों के लिए शहर ऐसा लगने लगता है जैसे व्यवस्था किसी दूसरे ज़िले से उधार लेकर आई गई हो।

देश स्वतंत्र हुए दशकों बीत गए, मगर लगता है टीकमगढ़ की यातायात व्यवस्था अभी भी केवल 15 अगस्त को स्वतंत्र होती है। बाक़ी 364 दिन वह किसकी ग़ुलामी में रहती है, यह शोध का विषय है।

कभी-कभी लगता है यातायात विभाग की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवा देनी चाहिए—हुलिया: ख़ाकी वर्दी। अंतिम बार 15 अगस्त को दिखाई दिया था। उसके बाद से कोई पता नहीं।

हालाँकि कभी शहर के बाहर किसी होटल के आसपास सरकारी वाहन दिखाई दे जाता है, तब विश्वास होता है कि व्यवस्था पूरी तरह ग़ायब नहीं हुई है। बस जनता की पहुँच से थोड़ी दूर है।

शहर में सड़क किनारे खड़ी बाइकें इतनी निश्चिंत दिखाई देती हैं, जैसे उन्हें सड़क पर स्थायी पार्किंग का सरकारी पट्टा मिला हो। सड़क स्वयं शायद किसी दिन प्रशासन को आवेदन दे—“महोदय, मुझे सड़क के पद से मुक्त कर पार्किंग स्थल घोषित करने की कृपा करें।”

सोनोग्राफी सेंटरों और अन्य संस्थानों के सामने तो पार्किंग व्यवस्था का अद्भुत मॉडल देखने को मिलता है। एक मरीज़ आया—एक बाइक। दूसरा आया—दूसरी बाइक। तीसरा आया—तीसरी बाइक। थोड़ी देर बाद सड़क का एक हिस्सा जनता के लिए नहीं, बाइकों के लिए आरक्षित हो जाता है।

यहाँ पार्किंग की समस्या नहीं है। समस्या यह है कि पार्किंग को सड़क और सड़क को पार्किंग समझ लिया गया है।

अब कोई दोपहिया चालक उस सँकरी जगह से निकलने की कोशिश करता है। निकल गया तो कुशल चालक, फिसल गया तो अस्पताल का मरीज़। और दुर्घटना हो गई तो व्यवस्था के पास सदाबहार समाधान है—“जाँच कराई जाएगी।” 
“जाँच कराई जाएगी” हमारे यहाँ वह जादुई वाक्य है, जो हर असफल व्यवस्था को कुछ समय के लिए सफल घोषित कर देता है। दुर्घटना से पहले व्यवस्था दिखाई नहीं देती, दुर्घटना के बाद जाँच दिखाई देने लगती है। शायद हमारी व्यवस्था का सिद्धांत ही है—पहले दुर्घटना होने दीजिए, फिर उसके कारण खोजिए।

प्रशासनिक वाहन भी इन्हीं सड़कों से गुज़रते हैं। अतिक्रमण सामने है, ग़लत पार्किंग सामने है, यातायात बाधित है—फिर भी सरकारी वाहन निकल जाता है। तब लगता है कि सरकारी वाहनों में कोई विशेष “प्रशासनिक दृष्टि” लगी होती है, जिसमें अतिक्रमण अदृश्य है, ग़लत पार्किंग अदृश्य है और जनता की परेशानी तो शायद अति-सूक्ष्म कण है।

यही धृतराष्ट्र याद आते हैं। धृतराष्ट्र के पास आँखें नहीं थीं, इसलिए वे देख नहीं पाते थे। हमारे पास आँखें भी हैं और सड़क भी सामने है, फिर भी अतिक्रमण दिखाई नहीं देता। लगता है समस्या आँखों की नहीं, दृष्टि की प्राथमिकता की है।

लेकिन 15 अगस्त आते ही चमत्कार हो जाता है। सड़क दिखाई देती है। पुलिस दिखाई देती है। अतिक्रमण दिखाई देता है। व्यवस्था दिखाई देती है। जनता भी दिखाई देती है। और जनता आश्चर्य से सोचती है—“अरे! तो यह विभाग काम भी कर सकता है!”

फिर 15 अगस्त बीत जाता है और व्यवस्था भी।

ऐसा लगता है जैसे 15 अगस्त कोई राष्ट्रीय पर्व नहीं, यातायात विभाग का वार्षिक जागरण कार्यक्रम हो। एक दिन के लिए विभाग जागता है और अगले ही दिन फिर उसी गहरी निद्रा में चला जाता है।

दुर्घटना होने पर अस्पताल जागता है, डॉक्टर जागते हैं, परिवार जागता है, पुलिस जागती है और जाँच भी जाग जाती है। बस दुर्घटना रोकने वाली व्यवस्था शायद अगली दुर्घटना तक सोती रहती है।

हमारे यहाँ व्यवस्था का भी बड़ा सुंदर चक्र है—पहले समस्या पैदा होती है, फिर दुर्घटना होती है, फिर जाँच होती है और फिर अगली दुर्घटना के लिए रास्ता खुला छोड़ दिया जाता है।

जनता को 15 अगस्त की कुछ घंटों वाली यातायात व्यवस्था नहीं चाहिए। उसे 16 अगस्त की भी चाहिए, 17 अगस्त की भी और बाक़ी 364 दिनों की भी।

क्योंकि दुर्घटना कैलेंडर देखकर नहीं होती। बाइकें भी राष्ट्रीय पर्व देखकर सड़क पर नहीं खड़ी होतीं। अतिक्रमण को भी स्वतंत्रता दिवस का इंतज़ार नहीं रहता।

तो फिर व्यवस्था को ही क्यों रहता है?

अंततः सवाल बहुत छोटा है—क्या टीकमगढ़ में यातायात व्यवस्था जनता के लिए है, या जनता यातायात व्यवस्था के प्रयोग के लिए?

यदि व्यवस्था केवल 15 अगस्त को जागती है, तो उसे यातायात व्यवस्था कहने में भी संकोच होना चाहिए।

ईमानदारी से उसका नाम रख देना चाहिएँ—“यातना का सरकारी प्रबंधन।”

कम-से-कम नाम तो वास्तविकता के क़रीब होगा।

और 15 अगस्त को जब सड़कें कुछ घंटों के लिए व्यवस्थित दिखाई दें, तो जनता को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि व्यवस्था सुधर गई है।

वह केवल जागी है।

सुधरेगी तब, जब उसे जगाने के लिए 15 अगस्त की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। 

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