प्री-वेडिंग का पहरा
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी डॉ. प्रीति सुरेंद्र सिंह परमार15 Jul 2026 (अंक: 301, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
आजकल शादी दो लोगों की कम, सुरक्षा व्यवस्था की ज़्यादा लगती है। पहले रिश्ते भगवान के भरोसे बनते थे, अब बाउंसर और डिटेक्टिव एजेंसी के भरोसे।
सरिता जी के बेटे नीरव की शादी तय हुई। लड़का देखने में स्मार्ट था, नौकरी भी ठीक-ठाक थी और सोशल मीडिया पर मुस्कुराने का वर्षों का अनुभव भी था। लड़की भी सुंदर, पढ़ी-लिखी और इंस्टाग्राम पर “फ़ैमिली वैल्यूज़” लिखने वाली निकली। दोनों परिवारों ने चैन की साँस ली कि चलो, रिश्ता पक्का हो गया।
लेकिन तभी किसी शुभचिंतक ने कान में फुसफुसा दिया—“आजकल प्री-वेडिंग शूट का ज़माना है . . . ज़रा संभलकर।”
बस, सरिता जी की रातों की नींद उड़ गई।
उन्हें डर था कि कहीं प्री-वेडिंग शूट करते-करते फोटो फ़्रेम पर माला चढ़ाने वाली तस्वीर न बन जाए। आजकल रील बनाने के चक्कर में लोग पहाड़ से लटक रहे हैं, नदी में कूद रहे हैं, ट्रेन के सामने मुस्कुरा रहे हैं और ड्रोन से ज़िंदगी नाप रहे हैं।
सो, पाच लाख रुपये में एक बाउंसर नियुक्त कर लिया गया।
बाउंसर का काम बड़ा पवित्र था। चौबीस घंटे होने वाले दूल्हा-दुल्हन के साथ रहना। अगर दोनों किसी पहाड़ की चोटी पर रोमांटिक पोज़ देने जाएँ तो बाउंसर पहले रस्सी बाँधे। अगर रेल की पटरी पर फोटो खिंचवाने की इच्छा हो तो बाउंसर उन्हें याद दिलाए कि शादी का कार्ड अभी छपा है, श्रद्धांजलि का नहीं।
धीरे-धीरे हालत यह हो गई कि हर फोटो में दूल्हा-दुल्हन से ज़्यादा बाउंसर दिखाई देने लगा। एल्बम देखने वाले पूछते—“ये तीसरे महाशय कौन हैं?”
सरिता जी गर्व से कहतीं—“बेटा, यही तो हमारे रिश्ते के असली गार्जियन हैं।”
उधर, सरिता के पति दीनदयाल जी भी कम दूरदर्शी नहीं थे। उन्होंने एक नामी डिटेक्टिव एजेंसी को ठेका दे दिया।
आदेश स्पष्ट था—“शादी एक साल बाद होगी। तब तक दोनों परिवारों की ऐसी जाँच करो कि आधार कार्ड भी शर्मा जाए।”
एजेंसी ने भी कमाल कर दिया।
सुबह रिपोर्ट आती—“लड़की ने आज चाय में दो चम्मच चीनी डाली।”
शाम को दूसरी रिपोर्ट—“लड़का रात 11:17 बजे तक मोबाइल चला रहा था।”
तीसरे दिन—“लड़की की सहेली ने फ़ेसबुक पर ‘हैप्पी बर्थडे डियर’ लिखा है। मामला संदिग्ध हो सकता है।”
चौथे दिन—“लड़के ने ऑनलाइन दो टी-शर्ट ख़रीदी हैं। आर्थिक स्थिति स्थिर प्रतीत होती है।” पाँचवें दिन कन्या किस होटल से निकली और कितनी देर वहाँ रुकी किसके साथ गई किसके साथ लौटी।”
अब रिश्ता कम और जासूसी धारावाहिक ज़्यादा लगने लगा था।
सुनने में आया है कि डिटेक्टिव एजेंसियों के अच्छे दिन फिर लौट आए हैं। पहले उनका काम पति-पत्नी पर नज़र रखना था, अब मंगेतरों पर नज़र रखना है। शादी से पहले प्रेम कम और ‘बैकग्राउंड वेरिफिकेशन’ ज़्यादा हो रहा है।
सूत्रों का कहना है कि भविष्य में विवाह निमंत्रण पत्र पर यह भी लिखा जाएँगा—
“यह रिश्ता तीन निजी जाँच एजेंसियों, दो साइबर विशेषज्ञों, एक चार्टर्ड अकाउंटेंट और एक बाउंसर द्वारा प्रमाणित है।”
इतना ही नहीं, अगला दौर शायद ऐसा आएँ कि फेरे लेने से पहले पंडित जी पूछें—
“कन्या पक्ष बताएँ, क्या डिटेक्टिव रिपोर्ट क्लियर है?”
“वर पक्ष बताएँ, क्या बाउंसर ने सुरक्षा प्रमाणपत्र जारी कर दिया?”
तब जाकर अग्नि देव भी निश्चिंत होकर साक्षी बनेंगे।
समय बदल गया है। पहले शादी सात फेरों से मज़बूत होती थीं, अब सात पासवर्ड, चार सीसीटीवी कैमरे, एक डिटेक्टिव एजेंसी और एक बाउंसर मिलकर रिश्ता सुरक्षित बनाते हैं।
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