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जल विभाग का राष्ट्रीय शिक्षा अभियान: ‘जल ही जीवन है’

 

यह वाक्य अब पुराना हो गया है। हमारे नगर के जल विभाग ने इसमें आवश्यक संशोधन कर दिया है। अब इसका सरकारी संस्करण है—“जल ही जीवन है, और यदि जीवन बच गया तो कल फिर जल मिलेगा।”

बचपन में मास्टर साहब पढ़ाते थे कि पानी रंगहीन, गंधहीन और स्वादहीन होता है। उस समय विज्ञान पढ़ाया जाता था। अब लगता है विज्ञान की जगह जल विभाग ने पाठ्यक्रम बना दिया है।

हमारे महल्ले में नल खोलना पानी भरना नहीं, प्रातःकालीन सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता है। पहला प्रश्न—आज पानी किस रंग का है?

यदि पीला निकला तो समझिए आज हल्दी दिवस है। हरा निकला तो पर्यावरण संरक्षण सप्ताह चल रहा है। कत्थई आया तो इतिहास की धूल पाइपलाइन में उतर आई है। और यदि मटमैला आया तो समझ लीजिए लोकतंत्र की तरह सब कुछ मिल-जुलकर बह रहा है।

अब मुझे पूरा विश्वास हो गया है कि जल विभाग ने शिक्षा विभाग का अतिरिक्त प्रभार भी सँभाल लिया है।

बच्चों को रंग पहचानने के लिए अब किताबों की ज़रूरत नहीं रही। माँ आवाज़ देती है—“बेटा! ज़रा बाल्टी लेकर आओ, आज हरा रंग आया है। कल पीला था, दोनों का अंतर याद कर लो।”

बच्चा स्कूल जाकर पूरे आत्मविश्वास से कहता है—“सर! पानी रंगहीन नहीं होता। आप कभी हमारे महल्ले में आइए।”

मुझे उस दिन विज्ञान की किताबों पर बड़ा तरस आया। बेचारे लेखक वर्षों से ग़लतफ़हमी में जी रहे हैं।

जल विभाग केवल रंगों तक सीमित नहीं है। उसने सुगंध और दुर्गंध का पाठ्यक्रम भी शुरू कर दिया है।

कभी नल खोलते ही ऐसी सुगंध आती है कि लगता है सीवर लाइन ने पानी की पाइपलाइन को गले लगाकर राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया है। विभाग इसे “लीकेज” कहता है। मैं इसे “सामाजिक समरसता” कहता हूँ। आख़िर भेदभाव कब तक रहेगा? सीवर भी तो समाज का हिस्सा है।

हमारे नगर में अब लोग पानी पीने से पहले भगवान का नाम कम और नाक ज़्यादा बंद करते हैं।

पहले मेहमान आते थे तो पूछा जाता था—“चाय लेंगे या ठंडा?”

अब पहला प्रश्न होता है—“आज नल में कौन-सा पानी आया है?”

यदि पीला है तो चाय स्थगित।

हरा है तो अतिथि से क्षमा-याचना।

और यदि बिल्कुल साफ़ निकल आया तो पूरा परिवार एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराने लगता है, जैसे किसी ने घर में सरकारी नौकरी पा ली हो।

जल विभाग जनता को आश्चर्यचकित रखने में विश्वास करता है।

हर सुबह एक नया सरप्राइज़।

लोग कहते हैं जीवन में रोमांच होना चाहिएँ।

जल विभाग ने इस सिद्धांत को पूरी गंभीरता से लागू किया है। 
अब कोई यह नहीं कह सकता कि सरकारी विभागों में नवाचार नहीं होता।

मुझे तो कभी-कभी लगता है कि नगर का जल विभाग पर्यटन विभाग से भी आगे निकल गया है।

पर्यटन विभाग साल में एक मेला लगाता है।

जल विभाग रोज़ रंगों का मेला लगा देता है।

होली का त्योहार एक दिन आता है, लेकिन हमारे यहाँ नलों में रंगोत्सव बारहों महीने चलता है। 
जलकर भी बड़ा अद्भुत शब्द है।

कर पूरा दीजिए।

पानी आधा लीजिए।

गंदगी पूरी लीजिए।

और शिकायत कीजिए तो उत्तर मिलता है—“लाइन फ़्लश हो रही है।”

यह “फ़्लश” शब्द बड़ा रहस्यमय है।

मैं पिछले पाँच वर्षों से सुन रही हूँ कि लाइन फ़्लश हो रही है।

इतने वर्षों में तो गंगा भी साफ़ हो जाती, लेकिन हमारी पाइपलाइन अभी तक स्नान कर रही है।

शिकायत करना भी एक कला है।

पहले आवेदन दीजिए।

फिर फोटो भेजिए।

फिर वीडियो भेजिए।

फिर पानी की बोतल भरकर कार्यालय ले जाइए।

अधिकारी बोतल को ऐसे देखते हैं जैसे किसी पुरातत्व विभाग को हड़प्पा की खुदाई से नया बरतन मिला हो।

फिर कहते हैं—“ऐसा तो पहली बार हुआ है।”

यह वाक्य सुनकर मुझे बड़ा संतोष मिलता है।

क्योंकि यही वाक्य मैं पिछले दस वर्षों से सुन रहा हूँ।

जल विभाग ने स्वास्थ्य विभाग का भी काफ़ी बोझ हल्का कर दिया है।

पीलिया, टायफाइड, पेट दर्द, उल्टी-दस्त—इन सबकी प्रारंभिक जानकारी अब घर बैठे मिल जाती है।

डॉक्टर भी बड़े प्रसन्न रहते होंगे।

उन्हें शायद मौसम विभाग की रिपोर्ट से ज़्यादा जल विभाग की पाइपलाइन पर भरोसा होगा।

फ़िल्टर बनाने वाली कंपनियाँ भी जल विभाग की ऋणी होगी।

यदि पानी सचमुच साफ़ आने लगे तो न जाने कितने प्यूरीफ़ायर कारख़ानों में ताले लग जाएँ।

देश की अर्थव्यवस्था में जल विभाग का योगदान कम नहीं है।

वह डॉक्टरों को काम देता है।

दवा कंपनियों को ग्राहक देता है।

फ़िल्टर कंपनियों को बाज़ार देता है।

और जनता को आश्वासन देता है।

बस पानी ही नहीं देता।

मुझे लगता है कि अगले वर्ष जल विभाग को शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और संस्कृति—चारों विभागों का संयुक्त पुरस्कार मिलना चाहिए।

इतने सारे विभागों का काम अकेला जल विभाग कर रहा है।

सच पूछिए तो अब नल खोलते समय पानी भरने की उत्सुकता नहीं रहती।

उत्सुकता इस बात की रहती है कि आज सरकार हमें कौन-सा नया अनुभव देने वाली है। 

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