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वह कौन साथ निभाएगा . . .

 

साथ तुम्हारा छोड़ेगा न, 
जीवन में मुख मोड़ेगा न। 
प्राण देह से जाने पर भी, 
अर्थी बन आ जाएगा॥
  
अग्नि की प्रचंड लपटों में, 
पहले स्वयं जल जाएगा। 
अंत समय आगे बढ़कर, 
तुमको गले लगाएगा॥
 
पूछ रहे हो तुम मुझसे, 
वह कौन साथ निभाएगा? 
दुःख-रूपी कठिन डगर में, 
जो छाया बन रह जाएगा॥
 
जिसकी गोदी में तुम झूले, 
जिसे पकड़ तुम हुए बड़े। 
जिसके नीचे हँसे-खेले, 
जिसकी छाँव में रहे खड़े॥
 
जिसने फल-फूलों से तेरे, 
जीवन को महकाया है। 
जिसकी कागज़-कलम ने, 
ज्ञान-पथ दिखलाया है॥
 
बिन माँगे सदा सभी पर, 
अपना स्नेह लुटाया है। 
घनघोर वर्षा के क्षण में, 
आश्रय तुझे दिलाया है॥
 
ठिठुरन भरी सर्द रात में, 
ईंधन बन ताप दिलाया है। 
अपने तन का अंश जला, 
जीवन तेरा बचाया है॥
 
वह है अपना प्रिय वृक्ष, 
जिसने सदा साथ निभाया है। 
देकर जीवन भर उपकार, 
बदले में कुछ न पाया है॥
 
सच पूछो तो धरती पर, 
विलक्षण साथी पाया है। 
वृक्ष बचाओ, वृक्ष लगाओ,
यही संदेश सुहाया है॥

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