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दूल्हा चाहिए . . . पर बेटा नहीं!

 

समाज प्रगति कर रहा है। इतना प्रगति कर रहा है कि अब विवाह सात फेरों से नहीं, सात शर्तों से होने लगा है।

लड़की वालों ने दूल्हे के लिए नया विज्ञापन निकाला है—

“एक सुशिक्षित, सुयोग्य, उच्च वेतनभोगी युवक चाहिए।”

योग्यता—

झाड़ू लगाना अनिवार्य।

पोंछा लगाना अनिवार्य।

बरतन माँजना अनिवार्य।

खाना बनाना अनिवार्य।

कपड़े धोना अनिवार्य।

पत्नी के पैर दबाना वांछनीय।

पूरी तनख़्वाह पत्नी के खाते में जमा करना अनिवार्य।

माता-पिता से दूरी बनाए रखना अत्यंत आवश्यक।

बहनों से सीमित बातचीत।

अपने घर से अधिक लगाव पाया गया तो आवेदन स्वतः निरस्त माना जाएगा।

लड़का हिम्मत करके पूछ बैठा—

“और मेरे माता-पिता?”

उत्तर आया—

“विवाह मुझसे करना है या उनसे?”

बेचारा चुप हो गया।

बचपन में माँ की उँगली पकड़कर चलना सीखा था। पिता के कंधे पर बैठकर मेले देखे थे। पहली तनख़्वाह पर सबसे पहले मिठाई माँ-बाप को खिलाई थी। लेकिन विवाह के बाद उसे समझाया गया कि अच्छा पति बनने की पहली शर्त है—अच्छा बेटा होना भूल जाओ।

अब वह सुबह दफ़्तर जाता है। दिन भर लक्ष्य पूरे करता है। शाम को घर लौटकर झाड़ू लगाता है, पोंछा करता है, बरतन माँजता है, खाना बनाता है। यह सब करने में कोई बुराई नहीं, क्योंकि घर दोनों का है। लेकिन यदि इसके साथ हर दिन अपमान मिले, रिश्तों से काटा जाए, माँ-बाप से मिलने पर ताने मिलें, अपनी कमाई पर भी अधिकार न रहे और हर समय किसी मुक़द्दमे का भय सिर पर लटका रहे, तब प्रश्न केवल काम का नहीं, मानसिक संतुलन का बन जाता है।

पिछले कुछ वर्षों में देश ने कई दर्दनाक घटनाएँ देखी हैं। कहीं किसी सॉफ़्टवेयर इंजीनियर ने अपनी व्यथा रिकॉर्ड कर जीवन समाप्त कर लिया। कहीं किसी युवक ने लंबा पत्र लिखकर अपनी मानसिक पीड़ा व्यक्त की। हाल में फ़रीदाबाद के राहुल की मृत्यु की घटना ने भी अनेक लोगों को सोचने पर विवश किया। इन सभी मामलों के तथ्य अलग-अलग हैं और उनका अंतिम निष्कर्ष जाँच एवं न्यायिक प्रक्रिया से ही निकलना चाहिए। पर एक प्रश्न हर घटना छोड़ जाती है—क्या पुरुष की चुप्पी को समाज कभी सुनता भी है?

पुरुष रोता नहीं, ऐसा किसने कह दिया?

वह रोता है, बस आँसू भीतर गिरते हैं।

वह टूटता है, लेकिन आवाज़ बाहर नहीं आती।

उससे कहा जाता है—“मर्द बनो।”

वह मर्द बनता रहता है . . . और कई बार इंसान रह ही नहीं पाता।

यह व्यंग्य महिलाओं के विरुद्ध नहीं है। इस देश की करोड़ों बेटियाँ अपने मायके और ससुराल दोनों को प्रेम से जोड़ती हैं। वे परिवार बनाती हैं, तोड़ती नहीं। लेकिन यदि कहीं अधिकारों का दुरुपयोग होता है, यदि कहीं झूठे आरोप लगते हैं, यदि कहीं मानसिक प्रताड़ना किसी भी पक्ष के साथ होती है, तो उसे भी उतनी ही गंभीरता से सुना जाना चाहिए।

क़ानून आवश्यक है। महिलाओं की सुरक्षा भी आवश्यक है। लेकिन क़ानून का उद्देश्य न्याय होना चाहिए, प्रतिशोध नहीं। यदि निर्दोष भय में जीने लगे, तो क़ानून की आत्मा भी आहत होती है।

आज वृद्धाश्रम बढ़ रहे हैं। क्या केवल इमारतें बढ़ी हैं? नहीं। उनके साथ बढ़ी हैं उन माता-पिता की अधूरी प्रतीक्षाएँ, जो हर शाम दरवाज़े की ओर देखते हैं कि शायद बेटा आएगा। बेटा आना भी चाहता है, पर कई बार परिस्थितियाँ, रिश्तों का तनाव या पारिवारिक संघर्ष उसे रोक देते हैं। हर कहानी एक जैसी नहीं होती, लेकिन हर वृद्धाश्रम समाज से एक प्रश्न अवश्य पूछता है।

कभी बेटी से कहा जाता था—“अब वही तुम्हारा घर है।”

आज कई बेटों से कहा जा रहा है—“अब यह तुम्हारा घर नहीं है।”

अंततः हार किसकी होती है?

न बेटे की, न बहू की।

हार उस माँ की होती है जिसने बेटे को चलना सिखाया।

हार उस पिता की होती है जिसने अपना सब कुछ बेटे पर न्योछावर कर दिया।

हार उस पत्नी की भी होती है, जो एक ख़ुशहाल परिवार की जगह तनाव से भरा घर पाती है।

और सबसे बड़ी हार समाज की होती है, जिसने अधिकार और कर्त्तव्य के बीच संतुलन खो दिया।

आइए, एक नया विवाह अनुबंध लिखें—

पति पत्नी का सम्मान करेगा।

पत्नी पति का सम्मान करेगी।

दोनों एक-दूसरे के माता-पिता का आदर करेंगे।

क़ानून सत्य के साथ खड़ा होगा, किसी एक पक्ष के साथ नहीं।

क्योंकि विवाह में किसी एक की जीत नहीं होती। विवाह तभी सफल होता है, जब दोनों परिवार सम्मान के साथ-साथ चलें।

वरना वह दिन दूर नहीं जब निमंत्रण-पत्रों के साथ एक “सार्वजनिक सूचना” भी छपने लगे—

सार्वजनिक सूचना

मेरा नाम रिंकू है। मैं उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ। मेरे पिता का नाम कालूराम है। मेरा विवाह लालूराम जी की सुपुत्री रौनक से होने जा रहा है।

यदि रौनक जी का कोई प्रेमी, बॉयफ़्रेंड, आशिक़, चाहने वाला, गुप्त प्रशंसक या भविष्य का दावेदार हो, तो कृपया विवाह से पहले ही मुझसे संपर्क कर लें।

मेरा मोबाइल नंबर नीचे अंकित है।

मैं किसी नीले ड्रम में नहीं जाना चाहता।

मैं किसी सूटकेस में बंद होकर बरामद नहीं होना चाहता।

मैं किसी पहाड़ी से धक्का नहीं खाना चाहता।

न ही किसी दिन समाचार चैनलों की 'ब्रेकिंग न्यूज़' बनना चाहता हूँ।

यदि वास्तविक हक़दार कोई और है, तो मैं पूरे सम्मान के साथ रास्ते से हट जाऊँगा।

बाद में न अदालतों का समय बर्बाद होगा, न पुलिस का, न दोनों परिवारों की ज़िंदगी तबाह होगी।

कृपया सत्य को विवाह से पहले ही आमंत्रित करें, ताकि बाद में शोकसभा आयोजित न करनी पड़े।

यहीं है आधुनिक विवाह का नया युग—

पहले लोग कुंडली मिलाते थे,

अब मोबाइल की चैट मिलाते हैं।

पहले परिवार पूछे जाते थे,

अब पासवर्ड पूछे जाते हैं।

पहले सात जन्मों का साथ माँगा जाता था,

अब पहले ही दिन लोकेशन, ओटीपी और बैंक बैलेंस माँगा जाता है।

लगता है अगली पीढ़ी के विवाह कार्ड पर सबसे ऊपर यहीं छपेगा—

“दूल्हा चाहिए . . . पर बेटा नहीं!”

और सबसे नीचे छोटे अक्षरों में—

“शर्तें लागू। नियम एवं शर्तें समय-समय पर बिना पूर्व सूचना के बदली जा सकती हैं।”

एक और बात का डर लगता है, देश में इतने कुँवारी कुँवारे घूम रहे हैं, वे बैचलर पार्टी न बना लें।

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