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कितने प्यारे थे वो दिन

 

कितने प्यारे थे वो दिन,
धमा-चौकड़ी हम करते।
चोटी में सजा फूल हम,
इतराते-इठलाते चलते॥
 
तेरी एक डाँट में, ओ माँ,
घर में दुबके-दुबके फिरते।
पापा के घर आ जाने पर,
चिड़ियों जैसे खूब चहकते॥
 
कुछ ग़लती हो जाने पर,
धीरे-धीरे फुसफुस करते।
पता चला नहीं हमको, माँ,
हँसते-खेलते पराए हो चले॥
 
जब भी मन करता अब,
फिर दोनों से मिल आएँ।
आँसू आँखों से आ जाते,
तस्वीरों में ही सही, तुमसे
शिकवे-शिकायत कर पाते॥
 
घर-आँगन के पत्थर पर
बैठ मायके का सुख पाते।
धुँधली-धुँधली यादों को
फिर हरा-भरा ताज़ा पाते॥
 
कानों में फिर वही मधुर
आवाज़ें हम सुन पाते।
बादल  बन विचरण कर,
सुख-दुःख सब कह आते॥
 
मां के हाथ बनी रोटी का।
स्वाद जीभ में भर लाते।
आँगन की  सौंधी खुशबू
साँसों में क़ैद कर लाते॥
 
स्मृति सागर में डूब कर,
स्नेह आशीर्वाद ले आते।
मन के सूने कोनों में फिर
स्नेह-दीप नव जल जाते॥

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