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चेन्नई से हिमाद्रि तक ‘सड़क से’ 

बात 2017 की है, मई का अंतिम सप्ताह। यह वर्ष हमारी स्मृतियों में चिरस्मरणीय काल खण्ड के रूप में अंकित हो गया जब हमने केदार और बद्री की यात्रा संपन्न की थी। नई गाड़ी ली थी एम एल 350! इसकी प्रशंसा के क़िस्से तो काफ़ी सुन रखे थे लेकिन मन में यह निश्चय कर लिया था कि हम इसका सामर्थ्य तभी स्वीकार करेंगे जब यह हमें लेशमात्र भी थकान का अनुभव कराए बिना चेन्नई से हिमालय तक की सुखद यात्रा करा देगी। और यह हुआ भी!

हिमालय देखने की लालसा तो बचपन से ही थी लेकिन साकार हुई 2017 में जब हमने शिमला जाने की योजना बनाई। सोचा, पहले प्रयोगात्मक तौर पर शिमला कुल्लू मनाली चलेंगे और फिर अगर सब अनुकूल रहा तो अगले बरस श्री केदार बद्री भी घूम आयेंगे। तो चेन्नई से शिमला, सड़क मार्ग से लगभग 2600 कि.मी की दूरी थी, हर दिन अगर आठ सौ कि.मी. का सफ़र करें तो तीन दिन में पहुँचा जा सकता है। योजना बनाई गई कि केवल दिन में ही सफ़र रहेगा और अँधेरा होते ही जो भी शहर मिले, वहाँ रात बसर करेंगे। तो सभी आवश्यक सावधानियों का ध्यान रखते हुए हम निकल पड़े। मन में किंचित भय और आशंका तो थी लेकिन यात्रा का रोमांच भय पर हावी हो गया था। एकादशी के शुभ दिन हमारी यात्रा आरंभ हुई।

चेन्नई से हैदराबाद, नागपुर, नरसिंगपुर, झांसी, ग्वालियर, आगरा, दिल्ली, अंबाला, चंडीगढ़ होते हुए फिर तीसरे दिन की शाम को हम शिमला पहुँच गए। वाह सफ़र मज़ेदार रहा। शाम गहरा गई थी। वैसे पहाड़ों में दिन जल्दी ढलता है और फिर अगर बादल हों तो शाम भी काली हो जाती है। सोचा शिमला का नज़ारा तो अब कल ही मिलेगा फ़िलहाल आराम फ़रमा लेते हैं। रहने की व्यवस्था तो पहले ही कर ली गई थी तो किसी प्रकार की कोई असुविधा नहीं हुई।

अगले दिन सूरज की मखमली रोशनी में शिमला की वादियाँ चमक उठी थीं। चारों ओर दूर-दूर तक हरियाली, चाँदी जैसे चमकती पर्वत श्रेणियाँ, फिसलती हुई ढलाने, नर्म सर्द हवाएँ, हरितिमा की चादर ओढ़े मनमोहक नज़ारे, सचमुच ख़ूबसूरती की मिसाल था शिमला। मीठे आड़ू और सेबों का नाश्ता कर हम निकले माँ तारा देवी के दर्शनार्थ। 

ऊँची पर्वत की चोटी पर बना माँ तारा देवी का विशाल मंदिर बेहद सुंदर और शांत था। कभी कभार मंदिर में बजने वाली घंटियाँ वातावरण को और भी पवित्र बना रही थी। दर्शन के पश्चात मध्याह्न भोजनोपरांत कुफरी जाने की योजना बनाई गई। पथरीला ऊबड़-खबाड़ कंकरीला रास्ता, गहरी घनी घाटियाँ, घोड़े की पीठ पर सवार, प्राणों को हथेली पर रखकर, कभी घोड़ा आगे झुक जाता तो जान सूख जाती और घोड़ेवान हमें पीछे हो जाने की हिदायत देता, कीचड़ से सने फिसड्डी रास्ते पर घोड़े के पाँव भी लड़खड़ा रहे थे, एक चूक यानि सीधा गहरी घाटी में समाधि, दम साधे किसी तरह रास्ता पार किया और कुफरी पहुँचे। वहाँ का नज़ारा रास्ते की थकावट को भुला देने वाला था। असमय की बरसात के कारण आगे का रास्ता बंद था तो सेबों के उद्यान तो न जा पाये लेकिन जो भी देखा वह वर्णनातीत था। चमकती हुई हिमालय की चोटियों को देखकर ऐसा भान हो रहा था जैसे बादलों की सफ़ेद चादर उन पर बिछी हो। अद्भुत! पास ही में शिवजी का मंदिर था, वहाँ कुछ सैलानी खड़े होकर नज़ारे का आनंद ले रहे थे। यात्रा की अपनी ही एक संहिता होती है, पर्यटक आपस में बहुत जल्दी एक दूसरे से हिल-मिल जाते है। अचानक एक व्यक्ति ने उँगली उठाई और कहा, ‘वो देखिए केदार नाथ की चोटी’! हम विस्मित नज़रों से उन्हें घूरने लगे। पूछने पर उन्होंने बताया कि यहाँ से एक कच्चा रास्ता है, ख़तरा तो है, लेकिन छोटा रास्ता है जो केदार तक जाता है। दर्शनार्थी जान की परवाह किए बिना इस रास्ते से जाते हैं। आए दिन दुर्घटनाएँ होती रहतीं हैं लेकिन जोखिम लिया जा सकता है। हिमालय की वादियों में पता नहीं क्या आकर्षण था, अकस्मात मिली जानकारी से हमारी पूर्व निर्धारित पूरी योजना चरमरा गई और तत्काल निर्णय लिया गया – कुल्लू मनाली स्थगित, केदार बद्री की ओर प्रस्थान!

यहाँ से आरंभ हुआ हमारा अनजान सफ़र। साहसिक हिमालयन एडवेंचर लक्ष्य तो निर्धारित हो गया था, लेकिन मार्ग की कोई जानकारी नहीं। आगे की कोई व्यवस्था भी नहीं थी। 

हमने कच्चा रास्ता नहीं चुना। राजमार्ग से हम शिमला से पाओंटा साहब होते हुए देहरादून पहुँचे। भला हो तकनीकी का, गूगल मेप हमारा मार्ग दर्शन कर रहे थे। ऋषिकेश पहुँचते रात हो गई थी और मेहनत मशक़्क़त के बाद रात गुज़ारने के लिए एक होटल मिल गया। अगले दिन सुबह नाश्ते के पश्चात बाहर निकलकर हमने पहरेदार से पूछा, ‘भैया, गंगा मैया कितनी दूरी पर है?’ वह बोला, ‘पिछवाड़े चले जाओ, गंगा मैया वहीं मिलेगी’। 

हम भौंचक्के से होटल के पीछे की तरफ चले। देखा तो आँखों पर विश्वास नहीं आया। अवाक देखते ही रह गए। अश्रु धारा बहने लगी, सामने हिमालय की बर्फ़ीली चोटियाँ, नीचे स्वच्छ निर्मल चाँदी की तरह पारदर्शी जल जो पूरी घाटी को आईने की तरह प्रतिबिम्बित कर रहा था। गंगा जी का तेज़ चंचल प्रवाह, कुछ दूरी पर लक्ष्मण झूला, किनारे पर बने आश्रमों से वातावरण को गुंजायमान करती हुई घंटियों की ध्वनियाँ, पूरा दृश्य मानो एक सजीव कलाकृति का आभास दे रहा था। गंगा मैया को प्रणाम कर, माथे से लगा, फिर माँ से आज्ञा लेकर जब पाँव गंगा में डुबोये, पूरे शरीर में जैसे तरो-ताज़गी की सिरहन दौड़ गई। ऐसा प्रतीत हुआ मानो मन और आत्मा दोनों पवित्र हो गए हों। कुछ पल चेतना शून्य होकर बिताने के पश्चात इस मनोहारी दृश्य को अपनी स्मृति में अंकित कर हम अगले पड़ाव की ओर बढ़ चले – श्री बद्रीनाथ। 

श्री बद्रीनाथ

उत्तराखण्ड राज्य में हिमालय की तलहटी पर स्थित ऋषिकेश शिवालिक पर्वत शृंखलाओं का प्रवेश द्वार माना जाता है। वैसे तो ऋषिकेश, ऋषियों की तपस्थली,अपने आध्यात्मिक आश्रमों के लिए जाना जाता है, यह स्थान कई जल-क्रीड़ाओं के लिए भी पर्यटकों का प्रिय स्थल है। देश विदेश से वॉटर राफ़्टिंग करने के लिए सैलानी यहाँ आते हैं।

अब यहाँ से हमारी हिमालय की चढ़ाई शुरू हुई। 

गगनस्पर्शी पर्वत शिखाओं का आलय – हिमालय चारों ओर सर्वोच्च शिखरों का वलयाकार आवरण। जहाँ तक दृष्टि जाए, वहाँ तक ऊँची-ऊँची पर्वत की चोटियाँ, अंतहीन और सीमारहित विशाल विस्तृत भूभाग में फैली हुई पर्वत श्रेणियाँ, अनिर्वचनीय सौंदर्य, मंत्र मुग्ध कर देने वाली निस्तब्धता!

घने चीड़ और देवदार के वृक्ष, ढलानों में कहीं बहती हुई पानी की धाराओं का महीन स्वर, असीम शांति, सचमुच धरती का ’स्वर्ग’ हिमालय का वर्णन करना असंभव है। इसे केवल देखकर ही अनुभूत किया जा सकता है। इन पर्वत श्रेणियों को देखकर तृप्त ही नहीं हो रहा था मन। इनके विस्तार को देखकर मनुष्य के अस्तित्व की नगण्यता का अनुभव होने लगा था।

पर्वतों की विशेषता होती है कि यहाँ गाड़ी की गति अत्यंत धीमी हो जाती है। आगे होटल की व्यवस्था तो थी नहीं, तो सोचा गूगल देख कर ही होटल बुक किया जाए। एक होटल के प्रबंधक से हमारी बात हुई। हमने बताया कि हम अभी ऋषिकेश से निकले है और केवल तीन सौ कि. मी. की ही दूरी है तो शाम तक पहुँच जाएँगे। प्रबंधक मिश्रा जी हँसे और कहा, ‘नहीं! आपको आते दो दिन लगेंगे।’ उनकी बात पर विश्वास नहीं आया। कुछ दूर चढ़ने पर पता चला कि मिश्रा जी की बात कितनी सही थी। 

हर एक मोड़ पैना नुकीला और अप्रत्याशित, संकरी सड़कें, रोंगटे खड़े कर देने वाली गहरी घाटियाँ, आने वाले वाहनों का दबाव, बच-बच कर चलाने की बाध्यता, नीचे पृथ्वी एक बिंदु के समान दृष्टिगोचर हो रही थी। लग रहा था हम आसमान में हैं और धरती हमारे नीचे। पहाड़ों की ऊँचाई समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रही थी, हम जितना ऊपर चढ़ रहे थे, वहाँ से उतनी ही ऊँची पहाड़ियाँ और दिख जाती थीं। हर मोड़ पर हिमालय का रंग बदल रहा था। हर दृश्य अपने में विलक्षण था। उँचाई होने के कारण वातावरण प्रदूषण रहित था और हर चीज़ पारे के समान साफ़, स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही थी। 

पाँच घंटे की इस रोमांचक यात्रा के बाद हम पहुँचे देव प्रयाग।

अलकनंदा और भागीरथी का संगम! 

 दो दिशाओं से दो रंगों की जलधाराओं को यहाँ मिलते देखा जा सकता है। प्राकृतिक सौंदर्य की अनुपम छटा। पर्वत श्रेणियों के बीच दो धाराओं का संगम स्थल। इस संगम स्थल के पश्चात ही इस नदी को पहली बार गंगा के नाम से जाना जाता है। इसे पार कर रुद्र प्रयाग से होते हुए कर्ण प्रयाग तक की दूरी में शाम हो गई।

गढ़वाल मण्डल में स्थित अलकनंदा और पिण्डार नदियों का संगम स्थल कर्ण प्रयाग

 रात यहीं बसेरा किया। अगले दिन छोटी सी शिला पर स्थित उमा शंकर के मंदिर पर माथा टेककर हम आगे बढ़े जोशी मठ की ओर। यह वह स्थान है जहाँ श्री बद्री जी की चल मूर्ति को सर्दियों में छः महीनों के लिए विराजमान किया जाता है। जोशी मठ से पचास कि.मी. की दूरी पर है श्री बद्रीनाथ धाम। अहा भाग्य ! आख़िर हम पहुँच ही गए। वैसे तो ऋषिकेश से बद्री का रास्ता केवल 294 कि.मी. का ही है लेकिन पहाड़ों में हमें डेढ़ दिन लगे पार करने में। 

अब हम समुद्री तल से 11000 फ़ीट की उँचाई पर पहुँच गए थे। हिमालय पर अब बर्फ़ दिखनी शुरू हो गई थी। तापमान में भारी गिरावट के कारण और आक्सीजन की कमी से साँस लेने में कुछ असुविधा भी हो रही थी। मध्याह्न भोजन के बाद कुछ देर पहाड़ों का मुआयना करने के पश्चात संध्या समय हम दर्शन को चले। उत्तराखण्ड चमोली जनपद अलकनंदा के तीर पर स्थित श्री बद्रीनाथ धाम। स्मरण मात्र से ही मुक्ति देने वाला तीर्थ स्थल, नर-नारायण की तपोस्थली, दूधिया बर्फ़ की जमी धाराओं से घिरी हुई पर्वत शृंखलाओं के बीच में बसी पुण्य भूमि ‘श्री बद्री विशाल’

‘श्री बद्री विशाल’

‘श्री बद्री विशाल’

क्षेत्रफल की दृष्टि से मंदिर विशाल तो नहीं लेकिन अपनी विलक्षण मनोहारी बनावट के कारण अत्यंत आकर्षक बन पड़ा था। मंदिर के ठीक सामने एक गर्म पानी का चश्मा था जिससे निरंतर निकलती भाप एक दिव्य दृश्य उपस्थित कर रही थी। संध्या आरती हो रही थी। मंदिर में अंदर एक विशाल कक्ष था जिसमें लगभग 50-60 भक्त श्रद्धालुओं की सीमित भीड़ थी। फिर भी धक्क्म-धक्की हो रही थी। दरअसल सोलह घंटे की कष्टतर दुर्गम यात्रा करने के बाद मंदिर के प्रांगण में पहुँचकर भक्त इतने असहिष्णु हो जाते हैं कि सबको धक्का मारने की होड़ लग जाती है लेकिन इसे असहिष्णुता न मानकर ईश्वर के दर्शन की उत्कट लालसा कहना समुचित होगा। हम भी धक्के मारते और खाते पता नहीं कब उस दिव्य मूर्ति के सामने आ गए। आह गर्भ गृह में सालिग्राम की चतुर्भुज मूर्ति असीम तेजोमय प्रतीत हो रही थी। भगवान पूरे परिवार समेत विराजमान थे। बद्रीश्वर के सामने कुछ पल विचारशून्य स्थिति में व्यतीत हुए। चेत तब हुए जब पुजारी भीड़ को चिल्ला-चिल्ला बाहर जाने का आदेश दे रहा था। कपाट बंद होने का समय हो गया था। 

हमें मिश्री की गोलियों का प्रसाद मिला था। बाहर प्रांगण में चबूतरे पर बैठ गए तो देखा कुछ भक्त झाड़ू से मंदिर बुहार रहे हैं। वास्तव में ठंड के कारण पाँव के तलवे जम गए थे और मंदिर में भगवान का प्रसाद चारों ओर फैला हुआ था जो पाँवों में बुरी तरह से चुभ रहा था। बद्री धाम में प्रांगण बुहारना श्री जी की विशिष्ट सेवा माना जाता है। हमने भी इस सुनहरे अवसर का लाभ उठाकर बड़ी अनुनय विनय कर एक भक्त से झाड़ू लिया और कुछ देर मंदिर में सेवा की। मंदिर के चारों ओर महालक्ष्मी, कुबेर, नर नारायण और हनुमान जी की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित की गईं थीं। माना जाता है कि नर नारायण ने कई हज़ार वर्ष यहाँ कठोर तपस्या की थी। ऐसी पवित्र यज्ञ स्थली, योगसिद्ध धाम के दर्शन सेवा कर हम अपने जन्म को धन्य मानने लगे। बचपन की इच्छा फलीभूत हुई। ‘ जय बद्री विशाल’!

आगे की यात्रा केदार धाम 

बद्री नाथ से एक जंगली रास्ता चौपाता से निकल कर ऊखी मठ तक पहुँचता है। हम उस रास्ते पर निकल पड़े। यह राज्य मार्ग तो था पर इस मार्ग पर आवागमन बहुत कम दिखाई दिया जिस कारण यह रास्ता अत्यंत एकांत और निर्जन लगने लगा। अचानक देखा हमारे मोबाइल फोन के नेटवर्क की लकीरें पूरी तरह से लुप्त हो गई थीं। जिसका रहस्य बाद में पता चला कि इस पूरे क्षेत्र में केवल बी एस एन एल ही काम करता है जो हमारे किसी भी फोन में नहीं था। अब तो भोले बाबा का ही सहारा था। सडक के किनारे लगे साइन बोर्ड ही हमारा मार्ग प्रशस्त कर रहे थे। जंगल इतना गहरा था कि वृक्षों की सघनता के कारण दोपहर में भी शाम का अहसास हो रहा था। दूर-दूर तक कोई भी गाड़ी दिखाई नहीं दे रही थी। दोनों ओर घने वृक्ष। सुनसान मार्ग, केवल निशब्दता, दूर कहीं पानी के बहने का स्वर, हवा भी थम गई थी, गाड़ी अपनी हेडलाइट्स जलाकर धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।

चार घंटे की इस रोमांचक यात्रा के बाद अँधेरा छटा और चौपाता शुरू हो गया, हरे-हरे मैदानी समतल, बर्फ़ से ढकी नोक वाली पहाड़ियों के बीच तुंग नाथ के निकट प्रदेश चौपाता एक ख़ूबसूरत पर्यटक स्थल है जो कैम्पिंग के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ सैलानी टेंट लगाकर कैम्पिंग करते हैं। सुरम्य मनमोहक नज़ारों की खान है चौपाता। 

अचानक एक ढलान पर छोटी सी चाय की दुकान को देखकर ऊर्जा वापस आ गई। दरअसल चिमनी से निकलते हुए लकीरनुमा धुएँ को देखकर अनुमान लगा लिया था कि हो न हो चाय अवश्य मिलेगी। चाय पीने की ललक लग पड़ी। अंदर गए तो देखा एक सैलानी परिवार बैठा गर्म चाय की चुस्कियाँ ले रहा था। मुस्कराते हुए हमारा स्वागत हुआ। उनकी निगाहें हमारी गाड़ी की नम्बर प्लेट पर टिकी हुईं थी जैसे पूछ रही हो, ‘क्या तमिलनाडु से?’ हमने उनके बारे में पूछा तो पता चला कि वे भी हमारी तरह हिमालय के प्रेमी है और हर वर्ष बेंगलूर से हवाई यात्रा कर देहरादून पहुँचते हैं, वहाँ से फिर प्राइवेट कार से तुंग नाथ पर कैंम्पिंग करते हैं। सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ। चाय ख़त्म कर उन्हें अलविदा कहकर हम अगले पड़ाव की ओर चल पड़े। 

चौपाता को पार कर आगे पहुँचे ऊखी मठ। यहाँ से केदार जाने के लिए हेलीकॉप्टर की व्यवस्था उपलब्ध है। ऊखी मठ पहुँचते रात हो गई और रात का बसेरा यहीं किया। अगले दिन सुबह हम हेलीकॉप्टर की टिकट ख़रीदकर केदार जाने की प्रतीक्षा करने लगे।  

चारों ओर धुँध छाई हुई थी। पहाड़ों में बरसात का कोई नियम नहीं होता। पल में बारिश पल में धूप आँख मिचौनी खेल रहे थे। हमें बादलों के बरसने की प्रतीक्षा थी क्योंकि तभी हेलीकॉप्टर उड़ सकता था। हमें हेलीकॉप्टर में बिठाया गया और हम अब उड़ चले अपनी मंज़िल की ओर पंद्रह मिनट का रास्ता था, अद्भुत, अचंभित करने वाला दृश्य... अब हमारे नीचे विशाल पर्वत की चोटियाँ दिख रहीं थी, पृथ्वी तो पूरी तरह से अगोचर हो गई थी, हम पर्वतों के ऊपर थे, बादल नीचे दिख रहे थे, साँसें थम जाने वाला नज़ारा था, चारों ओर घनी घाटियों के मध्य पानी की दूधिया लकीरें दिख रही थीं, जिस तरफ़ भी नज़र जाती, असंख्य पर्वत श्रेणियाँ, अचानक सर उठा कर देखा तो देखते रह गये, बर्फ़ से ढकी पर्वतों की चोटियाँ आसमान को छू रही थीं … साथी यात्री ने इशारे से बताया वह रहा ‘केदारनाथ’!

अब हम 11875 फीट की उँचाई पर पहुँच गए थे गद्‌गद्‌ कंठ से भोले बाबा स्मरण कर हेलीकॉप्टर के उतरने की प्रतीक्षा करने लगे। अंततः वह क्षण आ ही गया और हम केदारनाथ पहुँच गए। पर्वत राज हिमालय पर केदार शृंग पर अवस्थित धाम है केदारनाथ’! आनंदातिरेक से आँसू बह रहे थे, झुककर पावन मिट्टी को माथे से लगाया और दर्शन के लिए निकल पड़े। अगले ही क्षण बरसात होने लगी। कड़ाके की ठंड, भीतर का लहू जम रहा था, कंपकंपी छूट रही थी, पाँव साथ छोड़ रहे थे, पुजारी ने पाँव धोकर अंदर आने को कहा तो साँस रुक गई, लगा बर्फ़ से पैर धो रहे हैं। जैसे-तैसे पाँव धोए और ज्योतिर्लिंग केदारेश्वर का दर्शन किया। छोटा सा मन्दिर का प्रांगण, अंदर लिंग की आकृति बैल के पीठ के आकार में थी। जैसे ही माथे ने शिवलिंग का स्पर्श किया, लगा पूरा शरीर जैसे चेतना शून्य हो गया हो। भास हुआ जैसे आत्मा और परमात्मा की दूरी स्वतः ही बिना प्रयास के मिट गई हो। कुछ पल इसी अलौकिक आनंद की अनुभूति में डूबे रहे। अवर्णनीय आनंद का वह क्षण जीवन पर्यंत स्मरण रहेगा। 

बाहर आकर उस शिला खण्ड का भी दर्शन किया जिसने 2015 की बाढ़ आपदा में मंदिर की रक्षा की थी। मन ही मन उन सभी श्रद्धालुओं को नमन किया जो उस आपदा में शिव धाम प्राप्त कर अमर हो गए थे। वहीं पास की चोटी पर स्थित भैरव बाबा के भी दर्शन किए । रात्रि को वहीं आराम कर अगले दिन फिर हेलीकॉप्टर पर वापस ऊखी मठ पहुँच गए। कुछ देर आराम कर हम हिमालय की वादियों को अलविदा कह भारी मन से चेन्नई की ओर प्रस्थान किया। यहाँ समाप्त हुई हमारी साहसिक हिमालय की यात्रा। 

आज भी कभी उन पलों का स्मरण आता है तो मन रोमांचित हो उठता है। इस पूरे सफ़र में आद्योपांत गाड़ी के चालक थे पति देव श्रीमान रमणा जी। गाड़ी को भी धन्यवाद दिया जिसने अपना नाम सार्थक कर हमारी वर्षों की तमन्ना पूर्ण की थी। आज कह सकतेे हैं कि अगर इस भू-मण्डल पर कहीं स्वर्ग है तो वह निश्चय ही हिमालय की गोद में है!! 

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