अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

हाय

मोबाइल फोन पर हरेलाल गिड़गिड़ाये जा रहे थे। उनकी आँखों में आये आँसू और मुरझाये चेहरे, सूखे होठों से साफ़ पता चल रहा था कि हरेलाल पर दिन दहाड़े बिजली गिरी है। चौके में बैठी हरेलाल की धर्मपत्नी शरबती देवी को भी आभास हो गया, उनके घर में किसी बहुत बड़ी विपत्ति ने दस्तक दे दी है।

फोन कट चुका था, हरेलाल जहाँ खड़े थे वहीं ज़मीन पर धड़ाम हो गये। भागकर शरबती देवी अपने पति के पास आ गई। उन्हें सहारा देकर बिठा दिया।

“क्या हुआ ? क्या बात है... मुझे भी तो बताओ?” रोते हुए शरबती देवी ने हरेलाल से पूछा।

अटकते हुए बैठे गले से, बड़ी मुश्किल से धीमी आवाज़ निकली - “लड़के वालों ने रिस्ता तोड़ दिया है, लड़के का नम्बर पुलिस में आ गया है। बोलते हैं दस लाख की व्यवस्था हो तो बात करना। वर्ना कोई दूसरा लड़का ढूँढ़ लो अपनी लड़की के लिए। अपनी बराबरी का”...

थोड़ी दूर खड़ी घर के कोने में मधु सारी बातें सुन रही थी। साहस जुटाकर हरेलाल व शरबती देवी के पास आकर बोली - “आप काहे रोत हो बाबू जी... हमाई किस्मत में वो घर नाहीं हतो, तुम कौऊ दूसरो घर देखि लो... का वो ही एक कुंवर बचो है जा धरती पे।”

तीन दिन बाद पता चला कि लड़के के बाप का भयंकर एक्सीडेंट हो गया है। दोनों पैर रहे नहीं, सिर में गम्भीर चोटें हैं। ज़िंदगी और मौत से जूझ रहे हैं। दस लाख से अधिक डाक्टरों की जेब में जा चुके हैं और अभी कितने जायेंगे ये तो आने वाला समय ही बतायेगा।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अँधेरा
|

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची…

अंजुम जी
|

अवसाद कब किसे, क्यों, किस वज़ह से अपना शिकार…

अंडा
|

मिश्रा जी अभी तक'ब्राह्मणत्व' का…

अंधविश्वास
|

प्रत्येक दिन किसी न किसी व्यक्ति की मौत…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

पुस्तक चर्चा

लघुकथा

बाल साहित्य कविता

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं