चौर्यकला
काव्य साहित्य | कविता मुकेश कुमार ऋषि वर्मा15 Dec 2025 (अंक: 290, द्वितीय, 2025 में प्रकाशित)
आजकल चौर्यकला भी प्रतिष्ठा का प्रतीक है
वैसे तो आदिकाल से यह कला जीवंत है
परन्तु पहले इसे वह सम्मान प्राप्त नहीं था
जो इसे आज प्राप्त हो रहा है।
अब देखिए—
विद्यालय से विद्या ग़ायब है
संसद भवन से सांसद ग़ायब है
विधानसभा से विधायक ग़ायब है
मतलब चौर्यकला अपने उफान पर है।
साहित्य से साहित्यकार ग़ायब है
पुलिस थाने से थानेदार ग़ायब है
प्रधानमंत्री कार्यालय से प्रधानमंत्री ग़ायब है
राष्ट्रसेवा से सेवा ग़ायब।
समाजसेवा से सेवा ग़ायब है
हर दिशा में चौर्यकला प्रगति की राह पर है।
अस्पताल से डॉक्टर ग़ायब है
गाँवों से ग्रामीण ग़ायब।
जंगलों से पेड़ ग़ायब।
अपने भारत में चौर्यकला इतनी फल-फूल कैसे रही है
यह बात किसी की समझ में नहीं आ रही है
स्वदेशी से देसी ग़ायब।
मंदिर से महंत ग़ायब।
सब बस ग़ायब-ग़ायब
शेष चौर्यकला ही बची है।
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