मत पूछो
काव्य साहित्य | कविता मुकेश कुमार ऋषि वर्मा15 May 2026 (अंक: 297, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
कैसे-कैसे कटे हैं दिन
मत पूछो
मेरे अंतर के प्रश्नों का उत्तर
मत पूछो
काली-घनी अमावस देखी
और अपनों से ही छला गया
ऐसा अभिशाप है झेला
ना दिखा सका
ना बता सका
अधरों पर झूठी मुस्कान लिए
जीवन थका-थका
जीता रहा
उपहासों का विष पीता रहा
कैसे-कैसे कटे हैं दिन
मत पूछो
मेरे हृदय की पीड़ा
मृत्यु तुल्य
तुम क्या देखोगे
तुम क्या समझोगे
तुम क्या महसूस करोगे . . .
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