सद्भाव
काव्य साहित्य | कविता मुकेश कुमार ऋषि वर्मा15 May 2026 (अंक: 297, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
स्वार्थों को साध सका ना
कष्टों की माला पहनी
आज़ाद मन पंछी
दुनियादारी निभा सका ना।
हृदयप्रीत सदा रही भरपूर
हृदय भाव दिखा सका ना
संसार में हुआ मशहूर
अपनों से मिला अपमान सह सका ना।
तन-मन हुआ बीमार
साँस-साँस है अटकी
ए मनुज! मानवता क्यों रही हार
सब ज़िन्दगी जी रहे भटकी-भटकी।
टूटे मन को फिर से जोड़ें
चलो साथ मिलकर ढूँढ़े प्रीत
द्वेष की दीवार मिलकर तोड़ें
चलो सद्भाव की चलायें रीत।
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