अशिष्टों की औक़ात
काव्य साहित्य | कविता जयचन्द प्रजापति ‘जय’1 Sep 2026 (अंक: 301, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
उनकी अशिष्ट भाषा ने
तुमको चोट पहुँचायी है
तुम्हें धैर्य नहीं खोना है
एक विशाल वृक्ष की तरह
डगमगाना नहीं
उन्होंने तुम्हें गाली दी है
वीर पुरुष की तरह
उनकी इस मूर्खता पर
अफ़सोस भी नहीं जताना है
क्योंकि क्रोध की अग्नि
उनको धीरे-धीरे जला रही है
एक दिन जब तुम
विशालता को प्राप्त करोगे
तब उनकी आत्मा
सड़ी लकड़ी की तरह
एकदम से टूटी होगी
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
कविता
- अशिष्टों की औक़ात
- आदिवासी बच्चियाँ
- उनका हिस्सा
- उषा का आगमन
- एक थे अटल
- एक नाबालिग़ लड़की
- कोहरा
- कोहरे में
- देश के नेताओ
- निष्ठुर समय
- पर्वत, जो मूक खड़े हैं
- पीढ़ियाँ
- पूस की रात
- बसंत
- मत सताना
- मेरी कवितायें
- मेरी दृष्टि
- मैंने भागकर शादी कर ली
- वह मज़दूर
- वे किसान
- सर्दी में एक स्त्री
- सुकून चाहता हूँ
- हम वेश्या हैं
- हँसने दो
- हारे लोग
- हे नवांकुरो
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
बाल साहित्य कविता
चिन्तन
बाल साहित्य कहानी
किशोर साहित्य कहानी
हास्य-व्यंग्य कविता
कहानी
लघुकथा
ललित निबन्ध
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं