वे किसान
काव्य साहित्य | कविता जयचन्द प्रजापति ‘जय’1 Sep 2026 (अंक: 301, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
किसानों की बस्ती है
ईमानदारी का
मेहनत का
किसी का हिस्सा नहीं खाते हैं
मेहनत करके
उगाते फ़सल हैं
लहलहाती फ़सलों को देखकर
ख़ुश होते हैं वे किसान
जब खेतों में जाते हैं
सिर्फ़ अपनी भूख
नहीं नज़र आती है
बल्कि उन शहरों में
जो रहते हैं लोग
उनकी भूख मिटाने के लिए
अपना तन जलाते हैं
अपनी उम्मीद बेचकर
वे किसान
किसी की उम्मीद बनते हैं
अपनी टूटी तक़दीर से
दुनिया का पेट भरते हैं
वे सच्चे किसान
टूटी बस्ती में रहते हैं
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