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कोटि-कोटि के कवि

 

“कोई ऐ शाद पूछे या न पूछे इससे क्या मतलब, 
ख़ुद अपनी क़द्र करनी चाहिये साहब कमालों को।” 

किसी गुमनाम शायर की इन मशहूर पंक्तियों को हमारे हिंदी-उर्दू के कवियों और शायरों ने अपने दिल पे ले लिया है शायद। वैसे तो हिंदी–उर्दू वाले अपनी भाषाई शुद्धता पर गुमान करते हुए ख़ुद को दूसरे से श्रेष्ठ बताते हैं और एक दूसरे पर तंज़ कसते रहते हैं। मगर जैसे ही कोई ऐसे मुशायरे या कवि सम्मेलन की घोषणा होती है तो दोनों प्रजातियों के लोग एक दूसरे के गिले-शिकवों को परे रखकर तुरंत गंगा-जमुनी तहज़ीब की बात करने लगते हैं। वैसे तो हमारी हिंदी में कवियों का स्थान बहुत ऊँचा माना जाता है। उनके सम्मान में तो यहाँ तक कहा जाता है कि: 

“जहाँ न पहुँचे रवि, 
वहाँ पहुँचे कवि।” 

कवि की महत्ता इतनी थी कि शिवाजी के दरबार में भूषण और पृथ्वीराज चौहान के दरबार में चंदबरदाई को बहुत ही ऊँचा दर्जा प्राप्त था। मगर दरबार में इतना राजे-महाराजों के बराबर बैठने वाले कवि आहिस्ता-आहिस्ता कब दरबारी कवि में बदल गए, यह पता ही नहीं चल सका। कवि ऋषि गोपालदास नीरज ने तो कहा है कि:

“मानव होना भाग्य है, 
कवि होना सौभाग्य।” 

पर सेटिंग-गेटिंग और नेटवर्किंग के युग में कवियों की कुछ विशेष प्रजातियाँ विकसित हुई हैं। उनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण निम्नवत हैं। 

समकालीन कवि: जो वरिष्ठता की सीमा को पार कर चुके हों पर मार्गदर्शक मंडल में जाने के बजाय कविता में डटे रहते हैं। 

आशु कवि: यह प्रजाति ग्रेस पीरियड पर सदैव कार्यरत रहती है। वरिष्ठों को स्टेशन से रिसीव करने और उन्हें स्टेशन पर पहुँचाने के एवज़ में इस प्रजाति को आशु कवि घोषित करके मंच पर एक दो तुकबंदी सुनाकर मानदेय वाला लिफ़ाफ़ा दिलवा दिया जाता है। 

स्थानीय कवि: इन्हें दफ़्तरी कवि भी कहा जाता है क्योंकि यह ज़िले की सीमा में संपर्कों से पैदा हुए अवसर पर ही कविता सुनाते हैं। ज़िले से तबादले के बाद इनकी कविता का प्रभाव भी उस ज़िले से कपूर की टिकिया की तरह उड़ जाता है। 

राष्ट्रीय कवि: यह बेहद कॉमन प्रजाति है जो कवि सम्मेलन के लिये हमेशा अपना बैग-सूटकेस तैयार रखती है। 

अंतरराष्ट्रीय कवि: इनकी तो बानगी ही अलहदा है ये सस्ते जैकेट ख़रीदने अगर नेपाल भी चले जाएँ तो अपने को किसी न किसी तरह से अंतरराष्ट्रीय कवि घोषित करवा ही लेते हैं। 

प्रादेशिक कवि: दूरदर्शन केंद्रों और आकाशवाणी के आसपास रहने वाले कवि जो हर महत्त्वपूर्ण अवसर पर सर्वसुलभ रहते हैं जो बुलाने पर तुरंत पहुँच जाते हैं चाहे भुगतान का उम्मीद हो या न हो। 

प्रवासी कवि: ये जब भारत आते हैं तो जितने दिन देश में रहते हैं उतने दिन सुबह-शाम कविता की गंगा ही बहाते रहते हैं। 

अप्रवासी कवि: ये प्रजाति गूगल मीट और फ़ेसबुक लाइव पर ही अपनी दमदार उपस्थिति देती है। इनकी समझ से भारत में कविता को सिर्फ़ डिग्री कॉलेज के हिंदी विभाग के लोग ही थामे हुए हैं वरना हिंदी कविता पाताल लोक में समाहित हो जाये। 

इसके अलावा मंचों, मुशायरों में कुछ और भी क़िस्म के वीर कवि और वीरांगनाएँ कवयित्रियाँ सक्रिय हैं जिनकी प्रमुख कोटि है:

विश्व कवि, 
दिव्य कवि, 
गीत कवि, 
हास्य कवि, 
पैरोडी कवि, 
सिद्ध कवि, 
प्रसिद्ध कवि, 

और इन सबमें जो सबसे दुर्लभतम श्रेणी है वह है—गिद्ध कवि की। 

गिद्ध कवि: जो अन्य कवियों के मानदेय के लिफ़ाफ़े रख लेते हैं यह कहकर कि उन्हें बाद में दे देंगे और फिर कभी नहीं देते।

एक दूसरी प्रजाति है जो कही जाती है युग कवि। 

इसी युग कवि में से एक आला केटेगरी होती है चुग कवि की। 

चुग कवि: ये ऐसे कवि हैं जो दूर दराज़ के कवि सम्मेलनों में किसी नए कवि द्वारा सुनाई गई कविता को टीपते रहते हैं और उसे प्रमुख कवि सम्मलेनों में अपने नाम से सुनाते हैं। 

सेवानिवृत्त कवि: यह प्रजाति कविताई के हिसाब से सबसे ख़तरनाक मानी गई क्योंकि यह दिन रात न सिर्फ़ कविता करते हैं बल्कि लोगों को पकड़-पकड़ कर कविता सुनाती है। जनहित में चेतावनी शाया हुई है कि ऐसे ख़तरनाक कवियों की प्रजाति से मार्निंग वाक में दूरी बनाकर चलना चाहिए। 

उन्मादी कवि: ऐसे कवि जो अपनी कविता के ज़रिये पाकिस्तान और चीन का भूगोल बदलने की चेतावनी देते रहते हैं। 

प्रगतिशील कवि: इसमें उस कोटि के कवि आते हैं जिनकी कविता न तो अव्वल किसी को समझ आती है और कवि भी किसी के समझ में नहीं आता। 

मुखर कवि: अपने चीखने-चिल्लाने को ये हज़रात कविता घोषित कर देते हैं। 

प्रखर कवि: ये आम तौर पर चुप ही रहते हैं सही अवसर के ताक में रहते हैं और कवि सम्मेलन का मानदेय प्राप्त होते ही मुखरता से आयोजक की ही आलोचना करने लगते हैं।। 

इनसे इतर कुछ और नाम कविता में छूटे हुए लगते हैं। इन सबसे इतर हिंदी के तमाम प्लेटफार्म्स पर कुछ और कवियों की प्रजातियाँ देखी-पाई जा रही हैं। उनमें से प्रमुख निम्न हैं:

छपास कवि, 
रचनाचोर कवि, 
चितचोर कवि, 
तथाकथित कवि, 
अकविता के कवि, 
छवि के कवि, 
मंचीय कवि, 
उखाड़ू कवि, 
गद्य कवि, 
फाड़ू कवि, 

और इन पर भारी पड़ने वाली है कबूतर बाज़ कवि। 

कबूतरबाज़ कवि:

(वैसे तो कवियों की अनेक क्लासिक प्रजातियों का विश्लेषण विद्वान आलोचकों द्वारा किया जा चुका है परन्तु आधुनिक कवियों की एक विशेष प्रजाति ‘कबूतरबाज कवि’ भी आजकल सामने आकर धमाल मचा रही है।) 

“कबूतरबाज़ कवि वह है जो कई कवियों को अपने गुट में रखता है और सबका रेट बताकर सम्मेलन में उनका आमन्त्रण फ़िक्स करता है और बदले में उस कबूतर कवि के मंच पर स्वयं आमंत्रित होकर लिफ़ाफ़ा ग्रहण करता है। यह वरिष्ठ होता है और ग़ज़ब का सम्मेलन लपेटू होता है।”

कवियों की बाक़ी प्रजातियों पर शोध-संग्रहण गतिमान है। आप और कितने कोटि के कवियों को जानते हैं?

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