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मानसून का गधा

 

मेरा मोहल्ला पढ़ा-लिखा होने के बाद भी पढ़ा-लिखा टोटका-प्रधान मोहल्ला है। पहुँचने वाले चाँद पर पहुँच गए हों तो पहुँच गए हों, इससे हमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

मेरे मोहल्ले वाले टोटकाजनियों, टोटकागुनियों के पास किसी भी साध्य से लेकर असाध्य बीमारी को जड़ से ख़त्म करने का एक-से-एक अचूक टोटका है। जब वे अपने टोटकों का प्रयोग किसी बीमारी पर करते हैं, तो कई बार बीमारी तो बीमारी, बीमार तक सदा के लिए ठीक हो जाते हैं। जिन रोगियों को अस्पताल के डॉक्टर यह कहकर छोड़ देते हैं कि अब घर में जितनी रोगी की हो सके, सेवा करो, उसके बाद वे रोगी का अपने टोटकों से ऐसा-ऐसा इलाज करते हैं कि बीमार परेशान हो या न, पर उसको लगी बीमारी टोटकाधीशों के टोटकों के उपचार से लाचार हो जाती है।

इधर अपने मोहल्ले में इस हफ़्ते अख़बार वाला रोज़ आया, अख़बारों की रद्दी ख़रीदने वाला रोज़ आया, कारपेट बेचने वाला रोज़ आया, घरों की टंकियों में पानी रोज़ आया, गोलगप्पे बेचने वाला रोज़ आया, पापड़ बेचने वाला रोज़ आया, भगवान के नाम पर किसी न किसी बहाने चंदा माँगने वाला रोज़ आया, कंघी वाले झड़े बाल ख़रीदने वाला रोज़ आया, पुराने मोबाइल फोन ख़रीदने वाला रोज़ आया। पर सारे शहर में हर दिन झूम-झूमकर बरसने वाला मानसून नहीं आया तो नहीं आया। वह मोहल्ले की सीमा रेखा से परे-परे ही बरसता रहा। तो हमारे मोहल्ले के राजनीति में गहरी पैठ रखने वाले श्लेषक ने मानसून की अपने मोहल्ले को लेकर बेरुख़ी पर शंका जताते कहा कि शहर की म्युनिसिपल कमेटी के मेंबर के चुनाव में जो हमारा सदस्य हारा है, यही सब उसका नतीजा है। म्युनिसिपल कमेटी का प्रधान हमारे मोहल्ले को छोड़ शेष पूरे शहर में मानसून बरसा रहा है। हमारे मोहल्ले से म्युनिसिपल कमेटी के प्रधान की विरोधी पार्टी का मेंबर जीता होने के चलते उसने हमारे मोहल्ले के मानसून पर इंद्र से मिलकर पाबंदी लगवा दी है। जब आदमी कुछ और नहीं बता सकता, तो दूसरों को शंकाओं से घेरने के लिए कम से कम शंका तो जता ही सकता है।

मानसून के मोहल्ले में न आने पर मोहल्ले के वरिष्ठ टोटकाजनियों में से एक ने मानसून की आत्मा से अपनी आत्मा को जोड़ने के बाद कहा, “हे मोहल्ले वालो! टोटकाशास्त्र में साफ़ विधान-प्रमाण है कि . . . अगर तुम चाहते हो कि मानसून के पानी से तुम्हारे मोहल्ले की सड़कों के सालों से न भरे गड्ढे लबालब भरें और तुम उनमें मछली पालन कर अपनी इनकम बढ़ाना चाहो, तो मेरी अंतरात्मा कह रही है कि जो किसी हाइब्रिड गधे को गर्म-गर्म गुलाब जामुन खिलाए जाएँ, तो तुम्हारे मोहल्ले में मानसून आ सकता है। इधर गधे के मुँह में रसगुल्ले गए और उधर मानसून की कृपा तुम्हारे मोहल्ले पर बरसी।”

अंधविश्वासी समाज में किसी के भी दिन फिरते देर नहीं लगती। वहाँ किसी भी वक़्त किसी के भी दिन फिर सकते हैं। जब डाकुओं के दिन फिरते हैं तो कल तक जो पुलिस क़ानून के डर से बीहड़ों में छिपे रहते थे, चुनाव जीतने के बाद पुलिस उनको प्रोटेक्शन दे सलाम ठोकने को अपनी ड्यूटी मानने लगती हैं।

अंधविश्वासी समाज में जब उल्लुओं के दिन फिरते हैं तो दिन को कुछ भी न देखने वाले वे मज़े से जनता के विकास की फ़ाइलों को जाँचने लगते हैं।

अंधविश्वासी समाज में जब सियारों के दिन फिरते हैं तो वे अपनी चमड़ी को देशभक्ति के रंग से रँगवा बड़ी-बड़ी सभा सोसाइटियों को देशभक्ति के लेक्चर दे समाज को धन्य करने लगते हैं।

बस, फिर क्या था! इधर महल्ले के जाने माने वरिष्ठ टोटकाजनी ने मानूसन को महल्ले में लाने के टोटके की सीना ठोक घोषणा की कि उधर महल्ले के मिठाईख़ोर बाज़ार से गर्म-गर्म गुलाब जामुन लाने निकल पड़े तो इधर पढ़े-लिखे अपनी अपनी स्कूटियों पर गधे को ढूँढ़ कर लाने। पढ़े लिखों को पता था कि गधे कहा कहा आसानी से मिल सकते हैं।

घंटे बाद ही महल्ले के कुम्युनिटी हॉल के बाहर पूरा महल्ला, गधा और गर्म-गर्म गुलाब जामुनों के डिब्बे हाज़िर। किसीको भी उम्मीद नहीं थीं कि शहर पूर्ण साक्षर घोषित हो जाने के बावजूद शहर में गधा इतनी जल्दी मिल जाएगा। टोटकों में आस्था रखने वालों ने ज्यों ही गधे को देखा तो उनकी आँखें नम हो गईं। उस वक़्त वे गधे को देख इतने भावविह्वल थे जितना कोई अपने आराध्य को साक्षात् देख भावविभोर होता हैं।

उधर गधा परेशान कि पूर्ण साक्षर शहर के महल्ले में आख़िर ये सब चल क्या रहा है? एक ओर साक्षरों नव-साक्षरों द्वारा उसके आगे शीश-नवायों के बीच खड़े होने पर उसे ख़ुद पर बड़ी शर्म आ रही थी तो दूसरी ओर बड़े-बड़े साक्षर उसके सीने के साथ खड़े होकर सेल्फ़ी लेते अपने को गौरवान्वित महसूस कर रहे थे।

कुछ देर बाद महल्ले के प्रधान ने सपत्नीक गधे की आरती उतारी। उसके बाद पूरे महल्ले ने गधे के गले में फूल मलाएँ डालीं तो धीरे-धीरे गधा ग़लतफ़हमियों में डूबने लगा।

अचानक महल्ले के वरिष्ठ टोटकाजनी ने रस टपकता एक गुलाब जामुन हाथ में ले, अपने मुँह के पानी को ज़बरदस्ती रोकते, गधे के चरण सादर स्पर्श कर, उसमें मानसून के साक्षात् दर्शन करते गधे के मुँह में गर्म-गर्म गुलाब जामुन डाला तो उससे अपना मुँह जलने से बचते-बचते बचने पर वह बिदकते-बिदकते बचा। उसके बाद वरिष्ठ टोटकाजनी ने गधे के कान में प्रार्थना की, “हे गधे जी महाराज! हे मानसून के साक्षात् अवतार! धरती की हर दिशा में है युगों से जिनका एक छत्र राज! पढ़े लिखों पर जिनका रहेगा हर काल में राज! अब मेरे महल्ले वालों के हाथों गर्म-गर्म गुलाब जामुनों का प्रसाद ग्रहण करो और अपनी शुगर से मत डरो। अब हमारे महल्ले में तुम मानूसन बन पग धरो! . . . अब मेरा सब टोटका-भरोसियों से निवेदन रहेगा कि वे गधे जी महाराज से महल्ले में मानसून लाने का निवेदन करते मानूसन के वाहन जी महाराज को बारी-बारी पूरी आस्था से शांत चित्त हो गर्म-गर्म गुलाब जामुन का भोग लगाएँ, और कृपया मानूसन जी के साक्षात् अवतार का मुँह जलने से बचाएँ,” और उसके बाद जो हुआ, बहुत बुरा हुआ। मानसून के वाहन को गर्म-गर्म गुलाब जामुनों का भोग एक दूसरे से पहले लगाने के चक्कर में कम्युनिटी हॉल में वो भगदड़ मची . . . वो भगदड़ मची कि मेरा दिमाग़ उस भगदड़ में ऐसा कुचला कि . . . ऐसा कुचला कि . . .

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