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यत्र तत्र चोर सर्वत्र

 

दिन में ऑफ़िस जाकर कुर्सी पर सोने वाले को आजकल पता नहीं क्या हो गया है कि ऑफ़िस में तो छोड़ो, रात को नींद की गोलियाँ खाने के बाद भी नींद नहीं आ रही। परेशान भी मैं हूँ नहीं। मैं तो औरों को परेशान करने वालों में से हूँ। परेशानी से मेरा दूर-दूर तक कोई नाता नहीं। ज़रूर मेरी नींद को किसी की बुरी नज़र लग गई है। आजकल हर नज़र इतनी बुरी हो गई है कि पूछो ही मत। सोच रहा हूँ, किसी झाड़-फूँक वाले इल्मी बाबा के पास जाकर उससे अपनी नींद का इलाज करवा लूँ।

कल फिर नींद की गोली लेकर सोने की कोशिश करते एक आँख लगी ही थी कि सपने में प्रभु आ धमके। ये प्रभु भी न! तंग होते हैं किसी और के कारण और तंग करते हैं किसी और को।

रे प्रभु! आपकी कोई पर्सनल लाइफ़ हो या न हो, पर मेरी तो पर्सनल लाइफ़ है। आपको नींद आती हो या न आती हो, पर मुझे तो नींद आती है। तुम जागते रहो तो जागते रहो अपने भक्तों को दर्शन देने आठ पहर चौबीस घंटे, पर मुझे तो नींद की गोली खाकर सोने दो। पता नहीं, तुम अपने लालची भक्तों के कल्याण के लिए जागते रहना चाहते भी होंगे या तुम्हारे लालची भक्त तुम्हें जबरदस्ती जगाए रखते होंगे? आस्था जब धर्म के बाज़ार में प्रॉडक्ट बन कमाई का साधन हो जाए तो हर श्रेणी के प्रभु को न चाहकर भी उनके दबाव में आकर लाख नींद आने के बाद भी चौबीसों घंटे जागे रहना ही पड़ता है, प्रभु! पर इन्हें इतना कौन समझाए! ख़ैर, प्रभु थे, सो सोने से पहले ही जागना पड़ा। कोई दूसरा होता तो मैं न सोया होने के बाद भी सोने का पूरा नाटक करता।

“भक्त! सुनो तो भक्त!” उन्होंने सहमे-सहमे कहा तो मुझे लगा कि उनकी कोई बात सुनने वाली तो ज़रूर है। जिस धर्म में प्रभु भी सहम जाएँ, सोच लेना, उस धर्म में कुछ तो ठीक नहीं।

“कहो, क्या बात है प्रभु!” अब उन्होंने जगा ही दिया तो मैंने भी सोचा चलो, उनकी बात भी सुन ली जाए और गप्प-शप्प भी हो जाए। नींद तो वैसे भी नहीं आ रही थी।

“यार भक्त! बहुत बुरी ख़बर है,” उन्होंने चौंकते कहा तो मैं भी उनके साथ चौंका, “क्या?”

“मेरे चढ़ावे की चोरी हो गई,” कह वह मुझ अधजागे का मुँह ताकने लगे तो मैंने बिना झेंपे कहा, “यार प्रभु, आप भी न! बस! इत्ती-सी बात! चोरी ही हुई है, कोई सीना-ज़ोरी तो नहीं हुई है न? चोरियाँ तो सब जगह होती रही हैं—सड़क से लेकर मनसद तक सब जगह। यहाँ पर देव तो कोई है नहीं जो चोरी को अधर्म की श्रेणी में रखे।

“झूठ कहूँ तो कीड़े पड़ें जीभ में—वह भी प्लास्टिक के। लालच बड़ों-बड़ों के दिव्य चक्षु फोड़ देता है। ऐसे में इनकी-उनकी चर्म-चक्षुओं की तो औक़ात ही क्या!

“रही बात चोरी की तो चोरी अब अधर्म नहीं, धर्म है। जो चोरी करता है, वही समाज में उत्तरोत्तर आगे बढ़ता है। चोरी तुम्हारे धर्म में ही नहीं, हर धर्म में होती आई है। सो टेक इट ऐज़ यूज़ुअल एंड बी कूल! यहाँ सब चोर ही चोर हैं।

“कोई आना चोर है तो कोई ख़ज़ाना चोर है। कोई बकरी चोर है तो कोई भैंसा चोर है। कोई आटा चोर है तो कोई डेटा चोर है। कोई रिक्शा चोर है तो कोई परीक्षा चोर है। कोई आस्था चोर है तो कोई नाश्ता चोर है। कोई नेम चोर है तो कोई फ़ेम चोर है। कोई भाषण चोर है तो कोई राशन चोर है। कोई पेंसिल चोर है तो कोई स्टेंसिल चोर है। कोई देश चोर है तो कोई भेष चोर है। कोई क्लेम चोर है तो कोई फ़्रेम चोर है। कोई मल्ल चोर है तो कोई दल चोर है। कोई समाज चोर है तो कोई मसाज चोर है। कोई नेता चोर है तो कोई पेटा चोर है। कोई पेपर चोर है तो कोई पैपर चोर है। कोई मिशन चोर है तो कोई कमीशन चोर है। कोई कुर्सी चोर है तो कोई मुरकी चोर है। कोई रचना चोर है तो कोई समीक्षा चोर है। कोई माइनर चोर है तो कोई मेजर चोर है। कोई चंदा चोर है तो कोई गंगा चोर है। कोई कहानी चोर है तो कोई पानी चोर है। कोई कविता चोर है तो कोई सविता चोर है। कोई जन-धन चोर है तो कोई जन-गण चोर है। कोई वोट चोर है तो कोई नोट चोर है। कोई पेन चोर है तो कोई नैन चोर है। कोई सीमेंट चोर है तो कोई लिंक चोर है। कोई टैक्स चोर है तो कोई सैक्स चोर है। सच कहूँ तो जो अपने को दूध का धुला कहता है, वह सबसे बड़ा चोर है। ऐसे में तुम्हारे चढ़ावे में चोरी होना मेरे हिसाब से तो कोई गंभीर बात नहीं, प्रभु!

“मेरे गाँव में तो आए दिन ये सब होता रहता था, होता रहता है। इसकी-उसकी तरह मैं भी वहाँ कई बार खट्टी-मीठी गोलियाँ खाने के लिए दान-पात्र पर हाथ साफ़ कर लिया करता था। दान पर मानवों का नहीं, दानवों का एकाधिकार होता है, प्रभु! कई बार तो चोर वहाँ से हमारे गाँव के आराध्य को भी चुरा ले जाते थे, तो हम दूसरे ले आते थे—खाने कमाने के लिए, अपना रोना सुनाने के लिए। इसलिए इस बात से परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं। क़तई ज़रूरत नहीं। जहाँ प्रभु डाल-डाल और चोर पात-पात हों, वहाँ कुछ भी हो सकता है। ख़ुशी मनाओ कि तुम्हारा चढ़ावा किसी के काम तो आया। उन्होंने उसे कहीं तो इनवेस्ट किया। वर्ना तुम्हारे पास पड़ा-पड़ा वेस्ट होता रहता। अच्छा, एक बात बताओ?”

“पूछो!”

“तुमने कभी अपने चढ़ावे से मौज की?”

“छी! कैसी नारकीय बातें करते हो। शर्म आनी चाहिए तुम्हें।”

“प्रभु! मैंने तो शर्म बहुत पहले बेच दी थी। शर्म बेचने के बाद ही जीव विकास की पटरी पर सरपट दौड़ता है—हवा से बातें करता है। तो उनको भी करने दो। इसमें बुरा क्या है? बेचारे इस बहाने वे भी समाज में प्रतिष्ठित जीवन जी लेंगे। चोरी-छिपे देसी की जगह अंग्रेज़ी पी लेंगे। क्या तुम नहीं चाहते कि तुम्हें प्रतिष्ठित करने वाले भी समाज में प्रतिष्ठित हों? ये जो तुम हर सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर सबसे कहाए फिरते हो कि तुम्हारी चरण-पादुकाएँ चोरी हो गईं, तुम्हारा हार चोरी हो गया, मेहप्रिय चोरी हो गया! सॉरी नहीं, वैरी सॉरी! बहुत बुरी बात है—बात-बात पर अपने प्रिय भक्तों को कोसना। पता है, इससे समाज में क्या मैसेज जाता है? क्या करता वह मेहप्रिय तुम्हारे पास बैठकर? उड़ने दो उसे खुले आकाश में। जीव को तुमने ही तो पंख उड़ने को दिए हैं न? एक ही जगह बैठे रहने को तो नहीं। नाचने दो उसे आसमान में बादल आने पर। झूमने दो उसे सड़क निर्माण विभाग के कर्मचारियों की तरह बरसात में। तुम्हारे पास रहकर तो वह नाचना ही भूल गया था। दान-पात्र से दान साफ़ करने वालों को देखते-देखते बेचारे की आँखें भी ख़राब हो गई होंगी। ये जो वे अपने पाँव में सेल की चप्पलें पहने “चरण-पादुकाएँ! चरण-पादुकाएँ!’ कहते अपने फ़ॉलोअर बढ़ाते रो रहे हैं न! उनको ज़रा बताओ कि तुमने कभी वे चरण-पादुकाएँ पहनीं? तुम कभी वहाँ से बाहर निकले? तुमने वह गले का हार कभी अपने गले में पहना?”

“नहीं।”

“तो उनको पहनने दो। तुमने कभी तुम्हें भेंट किए चाँदी के थाल में खाना खाया?”

“नहीं!”

“तो उनको खाने दो। जिसका हम भोग-उपभोग नहीं कर सकते, वह सब हमारे किस काम का? वे उपयोग में ला रहे हैं—अच्छी बात है। कम से कम चढ़ाया चढ़ावा उपयोग में तो आया। उसने अपने हित में कुछ न कुछ तो तथाकथितों ने बनवाया। नहीं तो पड़ा रहता तुम्हारे पास।

“याद रखो प्रभु! जिस तरह बाप की कमाई पर पहला हक़ उसके बेटों का होता है—चाहे वे लायक हों या नालायक, वे उसे फूँकें या उसका सही इस्तेमाल करें—ठीक उसी तरह हर टाइप के चढ़ावे पर पहला हक़ उसके कुकर्म-भक्तों का होता है।”

“मतलब?” प्रभु ने मुझसे घूरते हुए पूछा तो मैंने तरन्नुम में कहा—

“प्रभु संग्रह न करे, लूचे पेटों को दे।  
आगे-पीछे भक्त खड़े, आँखें मूँदे दे।”

मैं पानी विभाग का सीनियर असिस्टेंट भक्तिकाल की पता नहीं किस धारा का कवि हुआ तो उन्होंने मुझे सिर झुका, हाथ जोड़े और चुपचाप चले गए।

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