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देख दुखी हैं कृष्ण

भक्ति कृष्ण की है यही,
और यही है धर्म।
स्थान, ज़रूरत, काल के,
करो अनुरूप कर्म॥
 
सब पाखंडी हो गए,
जनता, राजा, संत।
देख दुखी हैं कृष्णा,
धर्म-कर्म का अंत॥
 
जो देखो वो दे रहा,
सौरभ अब उपदेश।
मिटे किसी के है नहीं,
मन के पाप क्लेश॥
 
व्यर्थ मने जन्माष्टमी,
व्यर्थ सभी कीर्तन।
नहीं कर्म में धर्म यदि,
साफ़ नहीं है मन॥
 
सभी नाथ को गा रहे,
अमल करें ना कोय।
नहीं कर्म में कृष्णा,
तो कैसे दिव्य होय॥

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