अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

जन्मदिवस विशेष

 

आज श्रीमती डॉ. प्रियंका सौरभ का जन्मदिवस है। जन्मदिवस की मंगलकामनाओं सहित, तुम्हारे लिए लिखे गए मेरे ये प्रिय दोहे—तुम्हें समर्पित हैं। 
 
घर-आँगन ख़ुश्बू बसी, महका मेरा प्यार, 
पाकर तुझको है परी, सपना हुआ साकार। 
 
मंज़िल कोसों दूर थी, मैं राही अनजान, 
पता राह का दे गई, तेरी इक मुस्कान। 
 
मैं प्यासा राही रहा, तुम हो बहती धार, 
अंजुली भर बस बाँट दो, मुझको प्रिये प्यार। 
 
मेरी आदत में रमे, दो ही तो बस काम, 
एक हाथ में लेखनी, दूजा तेरा नाम। 
 
ख़त वो तेरे प्यार का, देखूँ जितनी बार, 
महका-महका सा लगे, यादों का संसार। 
 
पंछी बनकर उड़ चले, मेरे सब अरमान, 
देख बिखेरी प्यार से, जब तुमने मुस्कान। 
 
आँखों में बस तुम बसे, दिन हो चाहे रात, 
प्रिये तेरे बिन लगे, सूनी हर सौग़ात। 
 
सजनी आकर बैठती, जब चुपके से पास, 
ढल जाते हैं गीत में, भाव सब अनायास। 
 
आँखों में सपने सजे, मन में जागी चाह, 
पाकर तुमको है प्रिये, खुली हज़ारों राह। 
 
तुम ही मेरा सुर प्रिये, तुम ही मेरा गीत, 
तुमको पाकर हो गया, मैं जैसे संगीत। 
 
तुमसे प्रिये ज़िंदगी, तुमसे मेरे ख़्वाब, 
तुमसे मेरे प्रश्न हैं, तुमसे मेरे जवाब। 
 
बिन तेरे लगता नहीं, मन मेरा अब मीत, 
हर पल तुमको सोचता, रचता ग़ज़लें गीत। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अँधियारे उर में भरे, मन में हुए कलेश!! 
|

मन को करें प्रकाशमय, भर दें ऐसा प्यार! हर…

अंकित
|

(स्थान-5 मात्रा उच्चारण)    'राना'…

अटल बिहारी पर दोहे
|

है विशाल व्यक्तित्व जिमि, बरगद का हो वृक्ष। …

अभिमान
|

  नित्य बचें अभिमान से, धैर्य धरें…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

सामाजिक आलेख

नज़्म

कविता

दोहे

बाल साहित्य कविता

कहानी

ऐतिहासिक

हास्य-व्यंग्य कविता

लघुकथा

ललित निबन्ध

साहित्यिक आलेख

सांस्कृतिक आलेख

किशोर साहित्य कविता

काम की बात

पर्यटन

चिन्तन

स्वास्थ्य

सिनेमा चर्चा

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं

लेखक की पुस्तकें

  1. बाल-प्रज्ञान
  2. खेती किसानी और पशुधन
  3. प्रज्ञान
  4. तितली है खामोश