बग़ावती
कथा साहित्य | कहानी दीपक शर्मा15 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
“मैं सिनेमा जा रही हूँ,” गली के नुक्कड़ पर उस बुद्धवार जैसे ही माँ अपने झोलों के साथ प्रकट हुईं, अपनी साइकिल पर सवार हो कर अगले ही पल मैं उनके पास पहुँच ली।
हर बुद्धवार को मेरा सिनेमा देखना लगभग तय रहता।
हमारे कस्बापुर के तीनों हाल उस दिन अपने मैटिनी शो को लेडीज़ शो के रूप में आयोजित करते और टिकट भी आधे दाम पर रखते।
इधर माँ लखनऊ से कस्बापुर पहुँचती, उधर मैं अपनी फ़िल्म देखने निकल पड़ती।
पिछले वर्ष से माँ ने अपनी नर्सिंग में मिली तरक़्क़ी के अंतर्गत कस्बापुर छोड़ कर लखनऊ के अस्पताल में काम शुरू कर रखा था।
यहाँ से पचासी किलोमीटर दूर।
सप्ताह में बृहस्पतिवार की जो एक छुट्टी मिलती तो वह बुद्धवार की अपनी छह से डेढ़ तक की अपनी मार्निंग ड्यूटी ख़त्म करने के बाद लखनऊ के लिए चल देतीं और तीन साढ़े तीन बजे तक घर पहुँच जातीं।
पिछले चौदह महीनों से माँ के इस नियम में कभी विघ्न नहीं पड़ा था।
न बारिश में, न ओले में, न सर्दी में, न गर्मी में, न खाँसी में, न बुख़ार में।
“पहले घर चल,” माँ ने अपने हाथ का बड़ा झोला मेरे साइकिल के कैरियर पर लगा दिया, “तेरा हरा स्वैटर तैयार कर लाई हूँ।”
लखनऊ से माँ हमेशा भरी बाँहों के साथ लौटतीं।
लखनऊ के अपने ख़ाली घंटों में अपने हाथ से तैयार की गई घर की सज्जा-सामग्री अथवा हमारे पहनने के लिए हमारे ‘हैंडमेड रेडी-टु-वियर’ तो लाती ही, साथ में लखनऊ के विभिन्न बाज़ारों से भी विशिष्ट खाद्य पदार्थ अवश्य लिवातीं।
कभी रेवड़ी व गुड़ की गच्चक तो कभी ढोकला और छोटे समोसे।
अपनी तनख़्वाह वाले पहले बुद्धवार को लाल पेड़े लाना तो उनके लिए अनिवार्य ही रहता।
“मुझे सिनेमा जाना है,” मैंने कहा। हालाँकि अपने उस स्वैटर को तैयार अवस्था में देखने और पहनने की मैं उत्सुक रही थी। उस स्वैटर की डबल निट की ऊन और डिज़ाइन मेरी ही फ़रमाइश पर पिछले सप्ताह माँ इधर कस्बापुर से ले कर गईं थीं।
“अभी तो नहीं। मैं लौट कर देखती हूँ। उधर उमा और रेणु मेरी टिकट लेकर सिनेमाहाल के बाहर मेरी राह देख रही होंगी। वे तभी अंदर जाएँगी जब मैं वहाँ पहुँचूँगी . . . ”
“हर हफ़्ते तेरा फ़िल्म देखना ज़रूरी है क्या?” माँ ने त्यौरी चढ़ाई।
“यह फ़िल्म तो मुझे ज़रूर देखनी है,” मैंने कहा।
स्कूल की मेरी नवमीं कक्षा की सभी लड़कियाँ इसकी दोनों नायिकाओं के परिधान और केश-विन्यास की बात करती अघातीं न थीं और उन की बात में शरीक होने की मुझे जल्दी थी।
“आज उसका आख़िरी दिन है,” मैं अड़ गई, “मुझे जाना है।”
हमारे कस्बापुर में फ़िल्में बृहस्पतिवार के दिन बदली जातीं थीं।
“नहीं,” माँ अपने चेहरे पर वह बिगाड़ ले आयीं जो अपनी ढिठाई दिखाते समय वह लाया करतीं, “आज तू नहीं जाएगी।”
जी में आया माँ का कहा उसी समय बेकहा कर दूँ। उन का झोला वही गली में पटक दूँ। और अपनी साइकिल मोड़ कर सिनेमाहाल की सड़क पकड़ लूँ, लेकिन माँ का ग़ुस्सा अकेले झेल पाना मेरे लिए बहुत मुश्किल था। वह ग़ुस्सा तानतीं तो उसका फैलाव पूरे घर पर प्रतिपादित करतीं। कई-कई दिन।
“मैं बाबूजी से पूछ कर चली जाऊँगी,” माँ को वहीं गली में छोड़ कर मैं साइकिल पर सवार हो ली।
♦ ♦
“बाबूूजी,” अपनी साइकिल रसोई की दीवार से टिका कर मैं सीधी सीढ़ियों की ओर लपक ली।
कस्बापुर के इस नए बस-अड्डे वाले इस इलाक़े में बाबूजी ने अपना यह मकान पाँच साल पहले बनवाया था। नीचे दो कमरों के साथ एक रसोई और ऊपर खुली छत पर अपना कमरा।
पैंतीस वर्ष की आयु में सूबेदार मेजर के पद से बाबूूजी ने स्वैच्छिक सेवा-निवृत्ति उसी वर्ष ली थी। और अब उनका अधिकांश समय वही अपने कमरे में बीतता था। केवल उन्हीं दिनों वह नीचे बैठक में सोने आते जिन दिनों माँ लखनऊ में रहतीं।
पिछले दो वर्ष से वह अपने उपन्यास पर काम कर रहे थे।
“माँ मुझे आज सिनेमा नहीं जाने दे रही,” बाबूजी की मेज़ पर पहुँचते ही मैं रो पड़ी।
“बुलाओ उसे,” बाबूजी ने अपना रजिस्टर बंद कर दिया और अपने हाथ की क़लम, क़लम-दान में टिका दी।
“माँ,” मैं चिल्लाई, “बाबूजी तुम्हें ऊपर बुला रहे हैं।”
“मैं चाय बना रही हूँ अभी,” घर में दाख़िल होते ही माँ रसोई में घुस जातीं।
“मेरी फ़िल्म चार बजे शुरू हो जाएगी,” मैं अधीर हो उठी, “और तीन चालीस हो गया है . . . ”
“पद्मा,” बाबूजी ने माँ को आवाज़ दी।
“आ रही हूँ,” लाल पेड़ों की एक तश्तरी के साथ माँ ऊपर आ गईं।
“इसे फ़िल्म देख लेने दो, पद्मा,” बाबूजी ने एक पेड़ा ले कर तश्तरी मेरी ओर बढ़ा दी, “पहले यह तो ले लो।”
मिठाई में हम पिता-पुत्री को लाल पेड़े सर्वाधिक पसंद थे।
“मैं लौट कर खाऊँगी। अभी मुझे अपनी फ़िल्म देखनी है,” रोंआसी हो कर उनके हाथ की तश्तरी मैंने उन की मेज़ पर धर दी।
“क्यों?” माँ ने पूछा।
“क्योंकि हफ़्ते में छह दिन मैं आठों पहर आप के काम करती हूँ। और सातवें दिन छुट्टी मनाना चाहती हूँ,” मैंने जवाब दिया। उनकी चुनौती के जवाब में।
“पद्मा के सारे काम?” माँ की ओर देख कर बाबूजी हँसे।
“और नहीं तो क्या?” मैं चिढ़ गई, “मैं ही जानती हूँ मेरे दिन कैसे कटते हैं। आप ख़ुद तो मनीष और सतीश की आधी बात नहीं पूछते। उल्टे उनके होम-वर्क और उनके टिफ़िन के समय अपनी चाय या नींबू-शर्बत का ऑर्डर देने लगते हैं . . . ”
“बड़ी नहीं तू?” माँ चीखीं, “लड़की नहीं तू? क्या चाहती है तू? तेरे बाबूजी रसोई करें? या चौदह साल का मनीष रसोई करे? या फिर बारह साल का सतीश?”
“बड़ी तो मैं हूँ ही,” माँ के अंदाज़ में मैंने अपना माथा पीटा—माँ जब भी ग़ुस्से में होतीं, आवेश में अपना माथा पीटा करतीं—“अकेेली बड़ी हूँ? मेरे साथ की वे लड़कियाँ बड़ी नहीं हैं? जो दिन भर घूमती हैं? नए-नए कपड़े बनवाती हैं? एक ही फ़िल्म तीन-तीन बार देखती हैं?”
“मुन्नी,” बाबूजी ने मेरे हाथ दबोच लिए। बाबूजी का क़द मुझ से डयोढ़ा बड़ा है और उनकी काठी मुझ से दुगुनी तगड़ी।
“कैसे अबड़-धबड़ बोलती है,” माँ ने मेरा कंधा झिंझोड़ा, “यह नहीं सोचती अगले ही साल इस का दसवीं के बोर्ड का इम्तिहान है और इसे घर बैठ कर पढ़ाई करनी चाहिए . . . ”
“आप को मुझे पढ़ाई ही करानी होती तो आप कस्बापुर छोड़ कर लखनऊ नहीं चली जातीं। आपके कस्बापुर छोड़ने के हक़ में तो बाबूजी भी न थे!. . . ”
“लखनऊ मैं अपना वक़्त बर्बाद करने गई हूँ क्या?” माँ ने अपने हाथ नचाए, “या इस घर के लिए ढाई हज़ार की अतिरिक्त वसूली करने?”
“छोड़ो उस पुरानी बहस को, पद्मा,” बाबूजी ने मेरे हाथ मुक्त कर दिए, “मुन्नी को फ़िल्म के लिए जाने दो।”
“ठीक है, जाए,” माँ ने हथियार डाल दिए।
मैंने उन्हें ठीक घेरा था।
हँस कर मैंने अपने आँसू पोंछे और सीढ़ियों की ओर बढ़ ली।
“लड़की की ज़ुबान बहुत चलती है,” माँ ने कहा।
“तुम्हारी तरह?” बाबूजी का उत्तर सीढ़ियों पर मेरे साथ उतरा, “लखनऊ जाने के लिए तुम ने क्या कम ज़ुबान चलाई थी? कम माथा पीटा था? आज़ादी और ग़ुलामी की कम व्याख्याएँ दी थीं?”
“अब जा रही हो?” दरवाज़े पर मुझे मनीष और सतीश मिले। उनका स्कूल दो बजे छूटता था, किन्तु अपनी ट्यूशनों की वजह से वे घर पौने चार बजे के आसपास ही पहुँचते थे।
“हाँ” मैं दोबारा हँसी और अपनी साइकिल सिनेमाहाल की दिशा में भगाने लगी।
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