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तल-घर

 

“पुत्तू को लौटाना पड़ेगा,” उस दोपहर डॉ. बृजलाल बिस्तर पर ऊँघने जा रहे थे जब उनकी पत्नी, कमला ने आन घोषणा की, “उसके हाथ में आज सुबह मैंने अपनी अलमारी की चाभी देखी . . .”

उसने पति को बताया नहीं, उसने पुत्तू को अलमारी की तिजोरी में रखी अपनी डायरी के साथ उसे रँगे हाथों पकड़ा था। पति से ज़्यादा बात करने में उसे संकोच रहता। 

“चाभी सँभालने की ज़िम्मेदारी किसकी है?” डॉ. बृजलाल ले पत्नी को घेरा। 

“ज़िम्मेदारी तो मेरी ही है,” कमला ने तुरंत अपना दोष स्वीकार कर लिया। हमेशा की तरह। 

“फिर उसके हाथ में चाभी कैसी चली गई?” पति झल्लाए। 

“सुबह मैं अभी नहाकर लिकली ही थी कि पुत्तू ने आन बताया, बग़ल वाली कविता बैठक में देर से बैठी है, सो उसे मिलने की जल्दी में मैं चाभी अपनी साड़ी में टाँगना भूल गई . . .”

उस चाभी को लेकर कमला सचमुच ही सतर्क रहती थी। अव्वल तो अलमारी जब भी खोलती अकेले में खोलती और फिर प्रयोजन ख़त्म होते ही उसे तत्काल बंद कर देती। उसे कभी खुली नहीं छोड़ती। 

“अलमारी से कुछ गया तो नहीं?” डॉ. बृजलाल सशंकित हो गए। 

कमला के कई आभूषण उस अलमारी की तिजोरी में बंद थे। 

“नहीं, गया तो कुछ नहीं, मगर पुत्तू के हाथ में चाभी का रहना ठीक बात नहीं। उसे तो लौटाना ही पड़ेगा। आप बाबूजी को फोन मिला दीजिए . . .”

पुत्तू को कमला के पिता अपने गाँव से इधर लाए थे। नौ वर्ष पूर्व। एक जर्सी गाय के साथ—‘यह लड़का है तो अभी तेरह ही बरस का लेकिन वह इस जर्सी को अच्छा सँभाल लेगा। साथ ही घर के काम-काज में हमारी कम्मो का हाथ भी बँटा दिया करेगा . . .’ अवसर था, कमला और डॉ. बृजलाल को पुत्र-प्राप्ति संतान के लिए की गई समूचे परिवार की बारह वर्षों की अथक प्रार्थनाओं के फलस्वरूप। 

“और उसके बाप ने जो हमसे उधार ले रखा है?” डॉ. बृजलाल खीज गए। 

कमला ने पुत्तू के पिता को पिछले वर्ष उनसे पंद्रह हज़ार रुपया एडवांस के रूप में दिलाया था। बचपन में ब्याह दिए गए पुत्तू की ब्याहता के गौने की तैयारी हेतु उसके पिता उधर गाँव के अपने घर में एक नई कोठरी बनवाना चाह रहे थे। 

“उसमें से अब तीन हज़ार ही बचा रह गया है . . .”

“उसे भी पूरा हो जाने दो,” डॉ. बृजलाल ने जम्हाई ली। 

“और अगर मैं बाबूजी से बोलूँ पुत्तू के उधार का बकाया उधर उसके पिता से वसूल लाएँ?” कमला ने चिरौरी की। पुत्तू से वह छुटकारा पाना चाहती थी। तत्काल। 

“इस समय मैं सोऊँगा,” डॉ. बृजलाल ने दूसरी जम्हाई ली। दोपहर के भोजन के बाद वे डेढ़ घंटा ज़रूर आराम किया करते। शाम की चाय के बाद पाँच बजे उन्हें अपने निजी क्लीनिक पर फिर जाना होता। 

“और बाबूजी को फोन कब करेंगे?”

“चाय के समय . . . ”

“ठीक है,” कमला अपने पिता से दोपहर के इस एकांत में बात करना चाहती थी किन्तु पति के दबाव डालने से वह हिचकिचा गई। अपना रोष अंदर दबाती हुई। यह अनुशासन उसने अपनी माँ से सीखा था। जो कहा करतीं, पति के सामने अपना रोष अपने भीतर तल में दबाकर रखना चाहिए। यह बात अलग है कि अपने अंतिम वर्षों में वे अवसाद की शिकार हो गई थीं। और फिर चौंतीस वर्ष की अल्पायु में स्वर्ग भी सिधार गई थीं। कमला उस समय कुल जमा सोलह वर्ष की थी किन्तु उसे याद है उनकी मृत्यु पर उसके पिता फूट-फूटकर रोए थे, “धरती से ज़्यादा धीरज यदि किसी में देखा तो इस देवी में देखा।” उनके प्रति उसके पिता की श्रद्धा देखते ही बनती थी। अकेली पड़ गई, इकलौती उनकी कमला का वास्ता देकर उनके सगे-सम्बन्धियों ने उनका दूसरा विवाह करवाने के लाख प्रयास किए थे किन्तु वे नहीं माने थे। कमला को, ज़रूर, उन्होंने अगले ही वर्ष ब्याह दिया था और वह इधर चली आई थी। 

♦ ♦

“अब फोन करें?” चार बजे जब पति चाय के लिए घर की लॉबी में आए तो कमला ने चर्चा चलाई। 

“मेरे जूते लाओ, पुत्तू,” पत्नी की बात अनसुनी कर डॉ. बृजलाल ने पुत्तू को आवाज़ दी। 

दुर्भेद्य उसके पति कई बार कमला की इच्छा के विरुद्ध जाकर ठीक विपरीत व्यवहार करने लग जाते। 

“जी, मालिक,” रोज़ की तरह उस दिन भी पुत्तू ने डॉ. बृजलाल के जूते चमका रखे थे, पुत्तू कभी भूलता नहीं, वे जब भी सिरे से अपने जूते पहनते तो हमेशा उन्हें नई, ताज़ी चमक के साथ देखना चाहते। 

“तुम्हारी जीजी, तुम्हारी शिकायत कर रही है,” डॉ. बृजलाल ने अपने चाय के प्याले के साथ पुत्तू से पूछा, “क्या बात है?”

खिसियाकर कमला वहाँ से खिसक ली। पुत्तू के सामने वह अपनी अलमारी का प्रकरण उघाड़ना नहीं चाहती थी। 

“हमारी बदक़िस्मती है, साहब!” पुत्तू हाथ जोड़ने लगा, “जीजी से हम दस बार माफ़ी माँग चुके हैं, बीस बार कान पकड़ चुके हैं लेकिन वे अब भी हमारे साथ नाराज़ हैं . . .”

“हम तो नहीं चाहते, तुमसे वे नाराज़ रहें। हम तुम्हें यहाँ से भेजें। हमारे लिए तो तुम हमारे आलोक के दोस्त हो, हमारे टफ के दोस्त हो . . .”

बेशक वह जर्सी गाय अपनी टिकान के पाँचवें वर्ष बीमार पड़ गई थी और कमला के पिता उसे वापस अपने गाँव लिवा ले गए थे किन्तु पुत्तू को उन्होंने यहीं छोड़ दिया था। पुत्री और दामाद के आग्रह पर। उन पिछले पाँच वर्षों में पुत्तू ने रसोई ही का काम नहीं सीखा था और उनके नाती आलोक को स्कूल पहुँचाने-लिवाने का काम भी उसी को सौंप दिया गया था। और उत्तरवर्ती चार वर्षों में तो पुत्तू ने अपनी उपयोगिता का एक नया कीर्तिमान भी स्थापित किया था। परिवार के कुत्ते ‘टफ’ के सम्बन्ध में, डॉ. बृजलाल अपने बेटे आलोक के छठे जन्मदिन पर उसके लिए ‘मैस्टिफ’ नस्ल का एक पिल्ला लाए थे जो पुत्तू के ही हाथों पला-बढ़ा था और इन तीन वर्षों में ढाई फ़ुट ऊँचाई और चौरासी किलो वज़न प्राप्त कर चुका था वह। ‘टफ’ नाम के उस मैस्टिफ को रोज़ाना ब्रश लगाने, खिलाने और टहलाने का ज़िम्मा तो पुत्तू का रहता ही, हर सप्ताह उसे नहलाने का कार्यभार भी उसने अपने कंधों पर ले रखा था। जो खिलवाड़ नहीं था। 

“हम भी तो यहीं पड़े रहना चाहते हैं, मालिक, कहीं नहीं जाना चाहते हैं,” पुत्तू ने डॉ. बृजलाल के पैर पकड़ लिए। 

“फिर अपनी जीजी का अलमारी पर क्या करने गए थे? तुम्हें और रुपयों की ज़रूरत थी तो हमसे माँग लेते . . .”

“नहीं मालिक,” उनके पैर छोड़कर पुत्तू ने अपने कान पकड़ लिए, “हमें और रुपए की ज़रूरत नहीं मालिक। हम तो सिर्फ़ जीजी की डायरी देखना चाह रहे थे . . .”

“क्या तुम्हें उनके हिसाब पर यक़ीन नहीं? जो अपने उधार का बकाया उसमें देखने चल पड़े?”

घर के हिसाब-किताब का ज़िम्मा कमला के पास रहा करता और इस मामले में उससे कभी भूल न होती। जितना घर ख़र्च वह पति से पाती उसके पैसे-पैसे का हिसाब वह अपनी डायरी में दर्ज करती। रोज़ की रोज़। फिर हर माह के अंत में वह डायरी पति के सामने जा रखती, “आप भी देख लीजिए। मेरे जोड़ और मनफ़ी सब सही हैं या नहीं?” और वे हमेशा सही ही निकलते। 

“नहीं, मालिक। हम जीजी की हिसाब की डायरी की बात नहीं कर रहे। हम उनकी दूसरी डायरी की बात कर रहे हैं . . .”

“दूसरी डायरी?” डॉ. बृजलाल की भृकुटि तन गई, “तुम्हारी जीजी कहीं दूसरी जगह भी घर का हिसाब रखती हैं?”

“नहीं, मालिक। उस डायरी में वे कुछ और ही लिखा करती हैं . . .”

“और क्या?”

“हम नहीं जानते, मालिक। बस, आज पहली बार देखने चले गए थे कि पकड़े गए . . .”

“ठीक है, तुम अंदर से जीजी को मेरे पास भेजो। मैं उससे बात करूँगा . . .”

पत्नी की डायरी डॉ. बृजलाल तुरंत बाँच लेना चाहते थे। 

♦ ♦

“आओ, अपनी अलमारी की चाभी इधर लाओ,” पत्नी को सामने पाते ही वे लॉबी की कुर्सी से से उठ खड़े हुए। 

“अपने क्लीनिक लेकर जाएँगे?” कमला ने हँसकर उन्हें टाल देना चाहा। 

“यहाँ तुम्हारी अलमारी की बात हो रही है। मेरे क्लीनिक की नहीं,” डॉ. बृजलाल कठोर हो लिए। 

“लीजिए,” भयाकुल अवस्था में कमला ने साड़ी टाँगी वह चाभी पति की ओर बढ़ा दी। पति की आज्ञा वह कभी टालती नहीं। वरना कई बार उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते। कुछ प्रत्यक्ष, कुछ अप्रत्यक्ष। 

डॉ. बृजलाल चाभी पर झपटे और अपने कमरे की ओर लपक लिए। 

कमला उनके पीछे-पीछे चली आई। डरती-काँपती। 

एक झटके के साथ डॉ. बृजलाल ने पत्नी की अलमारी खोली और उसका सामान नीचे पटकने लगे। 

“मुझे बताइए?” अपने कपड़ों की दुर्गति कमला से देखी नहीं गई, “आप क्या ढूँढ़ रहे हैं?”

“वह डायरी जो तुम छिपकर लिखती हो और छिपाकर रखती हो . . .”

“किसने कहा आपसे?”

“पुत्तू ने . . .”

“लेकिन उसमें तो कुछ भी नहीं . . .”

“वही तो मुझे देखना है। कहाँ है वह?”

“मेरी तिजोरी में रखी है . . .”

“उसे अपने ज़ेवर के साथ रखती हो? इतनी क़ीमती है वह?”

हचकेदार एक झोंके के साथ डॉ. बृजलाल ने अलमारी की तिजोरी का दरवाज़ा खोला। 

कमला के आभूषणों के डिब्बों की आड़ में जिल्दबंद एक डायरी रखी थी। 

अपने एक किनारे पर बने परिवेध में एक पेंसिल लिए। 

डॉ. बृजलाल ने उसे तिजोरी से निकाला और अलमारी की चाभी कमला की ओर फेंक दी। 

चाभी ज़मीन पर गिर गई किन्तु कमला ने चाभी पर तनिक ध्यान नहीं दिया और पति की ओर बढ़ आई। 

“इसे देखकर क्या करेंगे? इसमें ऐसा कुछ नहीं . . .”

“पढ़कर देखता हूँ क्या करता हूँ? क्या करूँगा?”

डॉ. बृजलाल ने डायरी के पृष्ट एक बार पलटे, दो बार पलटे, तीन बार पलटे और उनकी हैरानी बढ़ती चली गई। 

एक-चौथाई ख़ाली उस डायरी में शब्दों के स्थान पर लकीरें ही लकीरें बिछी थीं . . .

पृष्ठ दर पृष्ठ . . . 

कुछ समस्तर। कुछ अनुलंब। 

कुछ दुहरी। कुछ तिहरी। तो कुछ पाँच-तही, कुछ दस-तही। 

“तुम्हारा दिमाग़ फिर गया है,” डॉ. बृजलाल ताव खा गए, “तुम्हारे बाबूजी को अब मैं फोन लगाता हूँ। यहाँ बुलाता हूँ। यह डायरी दिखाता हूँ। बोलता हूँ, आपकी बेटी पागल है, इसे यहाँ से ले जाइए . . .”

“ऐसा मत करिएगा,” कमला पति के पैरों पर गिर पड़ी, “बाबूजी को यह हरगिज़ न दिखाइएगा। कुछ मत बताइएगा। वे घबरा जाएँगे . . .”

फिर समझाओ मुझे! इस घालमेल का क्या मतलब निकलता है? क्या मतलब निकल सकता है? यही न कि तुम पागल हो . . .”

“यह एक खेल है जो मैं अपनी माँ के साथ खेला करती थी . . .”

“कैसा खेल?”

“तल-घर का खेल। मेरी पेंसिल से माँ मेरी कॉपी में तरतीबदार कभी आठ खाने बनातीं तो कभी सोलह। कहतीं, ये हमारे तल-घर के कमरे हैं। फिर हर कमरे की दो दीवारों पर छाया कर देतीं और दो दीवारें ख़ाली रखतीं। फिर कहतीं, सभी कमरों में हमें इस पेंसिल के सहारे इस तरकीब से डोलना-फिरना है कि किसी भी कमरे में हमें दोबारा न जाना पडे़ . . .”

पति के सामने कमला ने आलोक की ‘प्ले बुक’ में दी गई एक मेज़ (भूलभुलैया के खेल) को चक्कर खिलाकर आगे बढ़ा दिया। 

“मगर मुझे तो यहाँ कोई खाना नज़र नहीं आ रहा,” पत्नी की घुमावदार इस व्याख्या ने उनके क्रोधावेश में वृद्धि कर दी, “सिर्फ लकीरें ही लकीरें हैं और वह भी बेतरतीब, अललटप्पू, अटकल-पच्चू, अंड-बंड . . .”

“माँ के साथ खेलती थी तो इन लकीरों में तरतीब रहा करती थी,” कमला आँसू टपकाने लगी। पति का दिल पसीजने के प्रयास में। 

“यह उम्र है तुम्हारी ऐसे ऊल-जलूल खेल खेलने की?” डॉ. बृजलाल ने वह डायरी ज़मीन पर पटक दी, “तेईस-पच्चीस साल पहले मरी अपनी माँ को रोने की?”

“आप ठीक कहते हैं,” पति के पैरों से अलग होकर कमला हाथ जोड़कर अपनी दूसरी युक्ति प्रयोग में ले आई, “मुझे माँ के ये खेल भूल जाने चाहिएँ। आप मुझे इस बार माफ़ कर दीजिए। अब मैं यह सब नहीं बनाऊँगी। कभी नहीं बनाऊँगी . . .”

वह जानती थी उसके भीतर तल के मार्गाधिकार उसके पास सुरक्षित थे और पति उसके मार्गपट्ट तक से अनभिज्ञ थे। 

“मैं तो हमेशा ही ठीक होता हूँ,” डॉ. बृजलाल थोड़ा नरम पड़ गए, “ठीक सोचता हूँ।”

“तो मुझे माफ़ कर दीजिए . . . मैं तो मूर्ख हूँ . . . महामूर्ख . . . जो हर समय ग़लत सोचा करती हूँ . . .”

“ग़लत तो तुम हमेशा सोचती ही हो . . . ग़लत तो तुम हमेशा होती ही हो . . .” डॉ. बृजलाल अब भिन्न दिशा में चल पड़े थे। 

“पुत्तू के बारे में भी आप ठीक कहते हैं,” वातावरण को सामान्य स्थिति में लाने के लिए कमला ने जोड़ा, “हमें उसे अभी अपने पास रहने देना चाहिए। बल्कि अभी क्या? तीन-चार साल और उसे अपने पास टिकाए ही रखें। अब तो वह किराने की दुकान से घर का पूरा सामान भी लाना सीख गया है। और फिर आलोक के साथ खेलता-कूदता है। उसका बाल-मित्र है। बचपन से उसे देखे-भाले हैं। आप बाबूजी को फोन न ही करें तो अच्छा। और अपनी चाभी का मैं पूरा ध्यान तो अब रखूँगी ही . . .”

“ठीक है,” डॉ. बृजलाल कमरे से बाहर निकल गए। 

लॉन की दिशा में। 

जहाँ आलोक और टफ फुटबॉल खेल रहे थे। 

पुत्तू की संगत में। 

♦ ♦

“देखो, हमारे मालिक आ रहे हैं,” लॉन में उन्हें आते देखकर पुत्तू ने टफ से कहा। 

टफ उनकी ओर लपक लिया। 

अपनी ज़ुबान लपलपाता, अपनी दुम हिलाता . . . विद्युत-गति से . . . 

अपने भूरे स्थूल सिर और काले थूथन के साथ . . . 

उसके छोटे कान नीचे की ओर लटक रहे थे। 

“आप भी हमारे साथ खेलिए,” आलोक ने पिता को निमंत्रण दिया। 

“बस, एक-दो गेंद ही खेल पाऊँगा,” डॉ. बृजलाल कुछ सहज हो लिए, “मुझे अपने क्लीनिक भी तो पहुँचना है। पौने पाँच बजने ही को हैं . . .”

“गाड़ी की चाभी लाएँ, साहब?” पुत्तू ने पूछा। 

अपनी कार्यक्षमता एवं स्फूर्ति का उदाहरण देने को कोई भी अवसर पुत्तू हाथ से जाने नहीं देता। 

“हाँ, ले आओ . . .”

जब तक पुत्तू गाड़ी की चाभी लेकर लौटा, आलोक ने, टफ ने, फुटबॉल ने उन्हें पूर्णतया प्रकृतिस्थ कर दिया था और वे अपने क्लीनिक की ओर चल दिए। 
प्रसन्न मुद्रा में। 

♦ ♦

उधर कमला भी अपनी हड़बड़ाहट से बाहर निकल रही थी। ज़मीन पर गिरा अलमारी का सामान उसे समेटना था। 

ज़मीन से सबसे पहले उसने अपनी निजी डायरी उठाई। अपनी तिजोरी में उसे बहाल करने हेतु। 

अगले दिन उसके अहाते में पुनः बिचलने-बिचरने के लिए . . .

उस तल-घर में . . . 

जिसकी तहों में उसने कई विस्फोटक शस्त्र छिपा रखे थे . . . 

और जिन्हें वहीं रोके रखने के लिए उसे नई तहें बनानी पड़ती थीं। 

कुछ दुहरी, कुछ तिहरी . . .

कुछ पाँच-तही, कुछ दस-तही . . .

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